हाल ही में महाराष्ट्र की राजनीति में उस वक्त हलचल मच गई जब चुनावी रणनीतिकार और जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर उर्फ पीके ने मुंबई में सुनेत्रा पवार और उनके बेटे पार्थ पवार से कई घंटों लंबी मुलाकात की. महाराष्ट्र की भविष्य की पॉलिटिक्स और मराठा, दलित और मुस्लिम समीकरण को साध कर कैसे आगे बढ़ा जाए इस पर चर्चा हुई. क्योंकि महाराष्ट्र में एनसीपी (शरद पवार) और शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) से जबरदस्त चुनौती मिलने वाली है. इस खतरे को भांपते हुए सुनेत्रा पवार ने अभी से ही तैयारी शुरू कर दी है. क्या सुनेत्रा पवार की तरह मायावती भी यही फॉर्मूला यूपी चुनाव 2027 से पहले अपनाएगी?
क्या 27 में मायावती करेंगी वापसी?
क्या बीएसपी भी 2027 के यूपी चुनाव के लिए प्रशांत किशोर जैसे किसी पेशेवर चुनावी रणनीतिकार की सेवाएं ले सकती है? हालांकि, अब तक प्रशांत किशोर की मायावती या बीएसपी के किसी शीर्ष नेता से औपचारिक बातचीत की कोई पुष्टि नहीं हुई है. बीएसपी का इतिहास रहा है कि मायावती किसी बाहरी चुनावी रणनीतिकार पर भरोसा करने के बजाय अपने पारंपरिक कैडर, भाईचारे कमेटियों और राज्य-स्तरीय समन्वयकों के नेटवर्क पर ही निर्भर रहती हैं. इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव प्रशांत किशोर की कंपनी रही I-PAC के मार्गदर्शन में काम कर चुके हैं.
बीएसपी का मुख्य जनाधार क्या था और क्यों खिसक गया?
उत्तर प्रदेश में बीएसपी की ताकत का मुख्य स्तंभ दलित मतदाता विशेषकर जाटव समाज और सोशल इंजीनियरिंग दलित + ब्राह्मण + मुस्लिम गठबंधन रहा है. बीएसपी का कोर वोट बैंक हमेशा से जाटव और चमार समुदाय रहा है, लेकिन पासी, धोबी, वाल्मीकि और कोरी जैसी गैर-जाटव दलित जातियों में भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में बड़ी सेंध लगाई है. दूसरी तरफ 2019 के गठबंधन के बाद और 2022-2024 के चुनावों में बीएसपी की कमजोर स्थिति को देखते हुए मुस्लिम मतदाताओं ने बीजेपी को हराने के लिए एकजुट होकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का रुख किया.
क्या कहते हैं जानकार?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता से हटते ही पार्टी और नेता धरातल पर आंदोलनों से दूरी बना लिया. यह वोट बैंक खिसकने का बड़ा कारण बना. यदि बीएसपी 2027 में अपनी खोई हुई साख वापस पाना चाहती है, तो उसे सड़कों पर उतरना होगा. केवल प्रेस नोट और सोशल मीडिया बयानों तक सीमित रहने के बजाय दलितों, पिछड़ों और युवाओं के मुद्दों जैसे पेपर लीक, महंगाई, कस्टडी डेथ पर सड़कों पर उतरना होगा. पार्टी में गैर-जाटव दलित नेताओं और अति-पिछड़ों को प्रमुख सांगठनिक जिम्मेदारियां देनी होंगी. 2024 में कांग्रेस और सपा ने संविधान बचाओ का नैरेटिव गढ़कर दलित वोटों में सेंध लगाई, बीएसपी को अपने पारंपरिक मतदाता को वापस जोड़ना होगा.
क्या मायावती या उनके भतीजे आकाश आनंद में यह ताकत है?
यूपी में आज बी मायावती दलित समाज की सर्वमान्य और सबसे बड़ी राष्ट्रीय नेता हैं. लेकिन, उनमें आक्रामकता की कमी से कैडर में मायूसी आ गई. उनकी तुलना में चंद्रशेखर आजाद कहीं ज्यादा आक्रामक बीते कुछ सालों से नजर आ रहे हैं. रही बात उनके भतीजे आकाश आनंद की तो वह फिलहाल पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक हैं. उन्हें पार्टी का भविष्य माना जा रहा है. बीते कुछ सालों से आकाश आनंद ने अपनी जनसभाओं में आक्रामक भाषण शैली और खासकर Gen-Z से संवाद स्थापित करने की कला दिखाई है. वे युवाओं के बीच रोजगार, शिक्षा और स्वाभिमान का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं.
लेकिन कहीं न कहीं आकाश आनंद पर अभी भी मायावती का पूरा कंट्रोल है. यदि मायावती आकाश आनंद को संगठन के फैसलों में पूरी छूट देती हैं और यूपी चुनाव 2027 से पहले आकाश आनंद पूरे उत्तर प्रदेश में आक्रामक पदयात्राएं निकालते हैं, तो बीएसपी के खिसके हुए जनाधार में नई ऊर्जा का संचार हो सकता है.
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