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‘आंखें’ ने करीब 34 साल में तीन बिल्कुल अलग सिनेमाई रंग देखे. पहली बार जासूसी थ्रिलर, दूसरी बार जबरदस्त कॉमेडी और तीसरी बार बैंक-हाइस्ट. यानी एक ही नाम, लेकिन तीन दौर, तीन स्टारकास्ट और तीन बिल्कुल अलग कहानियां ‘आंखें’ बॉलीवुड के उन अनोखे फिल्मी टाइटल्स में शामिल है, जिन्हें अलग-अलग पीढ़ियों ने अपने-अपने अंदाज में देखा.

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नई दिल्ली. बॉलीवुड में फिल्मों के नाम दोहराए जाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन कभी-कभी एक ही टाइटल इतने अलग-अलग अंदाज में पर्दे पर आता है कि दर्शकों को यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि इन फिल्मों का नाम एक ही है. ऐसा ही कुछ ‘आंखें’ के साथ हुआ. यह फिल्म 1968, 1993 और फिर 2002 में इसी नाम से रिलीज हुई. दिलचस्प बात यह है कि तीनों फिल्मों की कहानी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी.

पहली बार धर्मेंद्र और माला सिन्हा की जासूसी फिल्म आई, दूसरी बार गोविंदा और चंकी पांडे की कॉमेडी ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचाया और तीसरी बार अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और अर्जुन रामपाल की बैंक रॉबरी वाली कहानी पर्दे पर पहुंची.

सबसे पहले 1968 में निर्देशक रामानंद सागर ‘आंखें’ लेकर आए. फिल्म में धर्मेंद्र, माला सिन्हा, महमूद और कुमकुम जैसे कलाकार थे. यह रोमांस या पारिवारिक ड्रामा नहीं, बल्कि अपने दौर की स्पाई-थ्रिलर थी. फिल्म में धर्मेंद्र ने एक इंडियन सीक्रेट एजेंट ‘सुनील’ का किरदार निभाया था, जो देश में आतंकवादी नेटवर्क फैला रहे विदेशी गद्दारों और साजिशकर्ताओं को बेनकाब करने के मिशन पर निकलता है. विदेश की लोकेशंस पर शूट हुई इस फिल्म में सस्पेंस, एक्शन और देश भक्ति का बेहतरीन तालमेल था.

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1968 की यह ‘आंखें’ उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी थी. बॉक्स ऑफिस इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक यह फिल्म ‘ब्लॉकबस्टर’ रही और इसने कई थिएटर्स में सिल्वर व गोल्डन जुबली मनाई.

धर्मेंद्र की इस फिल्म के 30 साल बाद यानी 1993 में आई ‘आंखें’ एक आउट-एंड-आउट स्लैपस्टिक कॉमेडी और ड्रामा फिल्म थी. इसमें गोविंदा और चंकी पांडे ने दो नटखट और आवारा भाइयों (बुन्नू और मुन्नू) का रोल प्ले किया था, जो अपने अमीर पिता (कादर खान) को परेशान करते रहते हैं. लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है जब एक मर्डर मिस्ट्री और हमशक्ल का कंसेप्ट सामने आता है. फिल्म में गोविंदा का डबल रोल था.

डेविड धवन के निर्देशन में बनी इस फिल्म में गोविंदा और चंकी पांडे लीड रोल में थे. साथ में रागेश्वरी, ऋतु शिवपुरी, शिल्पा शिरोडकर, कादर खान और शक्ति कपूर जैसे कलाकार नजर आए. गोविंदा के डबल रोल और डेविड धवन की कॉमेडी ने फिल्म को पूरी तरह मसाला एंटरटेनर बना दियाम.

यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचाने में कामयाब रही. लगभग 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने भारत में 25 करोड़ रुपये से ज्यादा की कुल कमाई की और वर्ल्डवाइड 35 करोड़ रुपये से ज्यादा का बिजनेस किया. यह साल 1993 की सबसे बड़ी हिट बनी. ट्रेड एनालिस्ट्स आज भी इसे ऑल-टाइम ‘ब्लॉकबस्टर’ फिल्मों में गिनते हैं, जिसने 12 से ज्यादा हफ्तों तक सिनेमाघरों को हाउसफुल रखा था. 

फिर 2002 में तीसरी ‘आंखें’ आई और इस बार कहानी ने फिर पूरी तरह यू-टर्न ले लिया. विपुल अमृतलाल शाह के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, अर्जुन रामपाल, सुष्मिता सेन और परेश रावल नजर आए. फिल्म में अमिताभ बच्चन ने विजय सिंह राजपूत का किरदार निभाया, जो बैंक से निकाले जाने के बाद बदला लेने की ठानता है. वह तीन ऐसे नेत्रहीन लोगों को चुनता है, जिनकी दृष्टिहीनता को बैंक लूट के दौरान मजबूत अलिबाई के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके. सुष्मिता सेन का किरदार उन्हें ट्रेनिंग देता है और इसके बाद शुरू होती है बैंक डकैती की कहानी.

कहानी का कॉन्सेप्ट अपने समय के हिसाब से काफी अलग था, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फिल्म वैसा कमाल नहीं कर सकी. जैसा 1968 और 1993 की ‘आंखें’ ने किया था. बॉक्स ऑफिस इंडिया के मुताबिक, फिल्म को एवरेज बताया गया. इसका बजट करीब 17 करोड़ रुपये था और भारत में नेट कलेक्शन 17.48 करोड़ रुपये रहा. इंडिया ग्रॉस 28.64 करोड़ और वर्ल्डवाइड ग्रॉस करीब 33.81 करोड़ रुपये दर्ज किया गया.

भारतीय सिनेमा का यह इतिहास दर्शाता है कि कैसे एक ही नाम की तीन फिल्मों ने अलग-अलग दशकों में दर्शकों का मनोरंजन किया, जहां दो फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़े तो वहीं तीसरी फिल्म एक यादगार थ्रिलर बनने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर नया इतिहास रचने में पीछे रह गई.

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