1982 में आई ‘नदिया के पार’ और 1994 की ‘हम आपके हैं कौन’ ये दोनों फिल्मों ने दर्शकों के दिलों पर राज किया, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये दोनों केशव प्रसाद मिश्र के उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ पर आधारित थीं? दिलचस्प बात यह है कि मेकर्स ने उपन्यास की पूरी कहानी नहीं, बल्कि सिर्फ पहला हिस्सा ही पर्दे पर दिखाया. इसके बावजूद दोनों फिल्में ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुईं.
नई दिल्ली. सिनेमा की दुनिया में अकसर किसी उपन्यास पर एक फिल्म बनती है. कहानी को थोड़ा सा तोड़-मरोड़ के मेकर्स उसे पर्दे पर उतार देते हैं. लेकिन हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अनोखा संयोग भी दर्ज है, जहां एक ही उपन्यास पर दो फिल्में बनीं, दोनों अपने-अपने दौर की ब्लॉकबस्टर साबित हुईं. लेकिन सच्चाई ये है कि ये अधूरी कहानी रहीं. करोड़ों लोगों ने इन फिल्मों को कई-कई बार देखा, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस कहानी को वे पूरा समझते रहे, वह दरअसल मूल उपन्यास का सिर्फ पहला हिस्सा था.
साल 1982 में रिलीज हुई ‘नदिया के पार’ और 1994 की ब्लॉकबस्टर ‘हम आपके हैं कौन’ हिंदी सिनेमा की ऐसी ही दो फिल्में हैं, जिन्हें आज भी दर्शक उतने ही प्यार से देखते हैं. दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों फिल्में हिंदी साहित्यकार केशव प्रसाद मिश्र के चर्चित उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ पर आधारित है. लेकिन दोनों फिल्मों ने उपन्यास की पूरी कहानी नहीं दिखाई. दोनों फिल्में वहीं खत्म हो जाती हैं, जहां उपन्यास की असली परीक्षा शुरू होती है.
सबसे पहले बात 1982 में रिलीज हुई फिल्म ‘नदिया के पार’ राजश्री प्रोडक्शंस की सबसे यादगार फिल्मों में गिनी जाती है. गोविंद मूनिस के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सचिन पिलगांवकर (चंदन), साधना सिंह (गुंजा), इंदर ठाकुर (ओमकार) और मिताली (रूपा) लीड रोल में नजर आए.
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फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश के एक गांव की है. वैद्यजी की बड़ी बेटी रूपा की शादी ओमकार से होती है. वहीं रूपा की छोटी बहन गुंजा और ओमकार के छोटे भाई चंदन की शुरुआत नोकझोंक से होती है, जो धीरे-धीरे प्यार में बदल जाती है. रूपा मां बनती है और घर के कामों में मदद के लिए गुंजा को ससुराल बुलाया जाता है. इसी दौरान चंदन और गुंजा का रिश्ता और गहरा हो जाता है. लेकिन कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है, जब रूपा की एक दुर्घटना में मौत हो जाती है. परिवार छोटे बच्चे की परवरिश के लिए गुंजा की शादी उसके जीजा ओमकार से कराने का फैसला कर लेता है. चंदन और गुंजा अपने प्यार की कुर्बानी देने का निर्णय लेते हैं. शादी की रस्मों के दौरान ओमकार को चंदन और गुंजा के प्यार का सच पता चल जाता है. वह समझ जाता है कि दोनों एक-दूसरे से सच्चा प्रेम करते हैं और अपने परिवार के लिए त्याग कर रहे हैं. इसके बाद ओमकार दोनों परिवारों को पूरी सच्चाई बता देता है और गुंजा की शादी अपने छोटे भाई चंदन से कराने का फैसला करता है. अंत में पूरे परिवार की सहमति और आशीर्वाद से चंदन और गुंजा का विवाह हो जाता है और फिल्म एक सुखद अंत के साथ खत्म होती है.
रवींद्र जैन के संगीत से सजी इस फिल्म के ‘कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया’, ‘सांची कहे तोरे आवन से’ और ‘जोगी जी धीरे-धीरे’ जैसे गीत आज भी सदाबहार माने जाते हैं. फिल्म का अंत वहीं होता है, जहां ओमकार दोनों के प्रेम को समझकर गुंजा की शादी चंदन से करा देता है. लेकिन उपन्यास की असली यात्रा इसके बाद शुरू होती है. बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म अपने सीमित बजट के मुकाबले बड़ी सफलता साबित हुई और राजश्री प्रोडक्शंस की सबसे सफल फिल्मों में शामिल हो गई. फिल्म ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई.
करीब 12 साल बाद सूरज बड़जात्या ने इसी मूल कहानी को आधुनिक संयुक्त परिवार के माहौल में ढालकर ‘हम आपके हैं कौन’ बनाई. यहां चंदन-गुंजा की जगह प्रेम (सलमान खान) और निशा (माधुरी दीक्षित) थे. बड़ी बहन पूजा की मौत के बाद निशा की शादी राजेश से तय होती है, लेकिन अंत में परिवार को प्रेम और निशा के रिश्ते का पता चलता है और दोनों का मिलन हो जाता है. फिल्म ने उपन्यास के मूल भाव-त्याग, परिवार और प्रेम को बरकरार रखा लेकिन शादी के बाद की कहानी यहां भी नहीं दिखाई गई.
1994 में रिलीज हुई यह फिल्म भारतीय सिनेमा का नया इतिहास लिख गई. लगभग 4.5 करोड़ रुपये के बजट में बनी फिल्म ने दुनिया भर में करीब 135 करोड़ रुपये का ग्रॉस कलेक्शन किया. लंबे समय तक यह भारतीय सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल रही. इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के साथ-साथ पारिवारिक फिल्मों की परिभाषा भी बदल दी.
‘राजश्री’ को दिए एक इंटरव्यू में सचिन पिलगांवकर ने इस बात की खुलासा भी किया था. उन्होंने बताया था कि राज कुमार बड़जात्या के साथ उनके रिश्ते बहुत अच्छे थे. एक दिन उन्होंने मिलने के बुलाया और बातचीत में उन्होंने कहा कि सचिन एक फिल्म प्लान करते हैं. यूपी के राइटर हैं केशव प्रसाद मिश्र उनकी कहानी है ‘कोहबर की शर्त’, जिसके राइट्स हमने खरीद लिए हैं. गोविन्द मूनिस से हमने कहा कि इसे लिखे और डायरेक्ट करें. राज कुमार बड़जात्या ने सचिन से बातचीत में कहा था कि हम पूरी कहानी नहीं लेंगे, आधी लेंगे क्योंकि उसके बाद ट्रेजेडी शुरू हो जाती है और सच्चाई ये है कि ट्रेजेडी कोई नहीं देखना चाहता. इसलिए इसकी हैप्पी एंडिंग करते हैं .
केशव प्रसाद मिश्र ने उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ में चंदन के नजरिए से गुंजा के चार रूपों का दर्दनाक वर्णन किया है कुंवारी गुंजा, सुहागिन गुंजा, विधवा गुंजा और कफ़न ओढ़े गुंजा. शादी के कुछ समय बाद ओंकार की भी असमय मृत्यु हो जाती है, जिससे गुंजा कम उम्र में ही विधवा हो जाती है. जीवन के इतने आघात सहने के बाद अंततः गुंजा की भी मौत हो जाती है और चंदन यथार्थ की कठोर धरती पर अकेला रह जाता है.
फिल्म निर्माताओं को यह भली-भांति अहसास था कि 1980 और 1990 के दशक में भारतीय सिनेमा का दर्शक थियेटर में मनोरंजन, पारिवारिक खुशियां और राहत की तलाश में आता था. अगर उपन्यास की इस दर्दनाक कहानी को जस का तस पर्दे पर उतार दिया जाता तो शायद दर्शक इसे पचा नहीं पाते और फिल्में इतनी बड़ी ब्लॉकबस्टर न बन पातीं.
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