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पटना. बिहार में अब तक जो जेल व्यवस्था संचालित हो रही है, वह मुख्य रूप से अंग्रेजों के जमाने के ‘प्रिजंस एक्ट, 1894’ (Prisons Act, 1894) यानी 132 साल पुराने कानून पर आधारित थी. ब्रिटिश हुकूमत ने इस कानून का निर्माण भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों और कैदियों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने और उन्हें समाज से पूरी तरह अलग-थलग रखने के उद्देश्य से किया था. उस दौर के दमनकारी कानून में कैदियों के मानवीय अधिकारों, उनके मानसिक स्वास्थ्य या उनके सामाजिक पुनर्वास के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई थी. यह कानून ब्रिटिश शासन के जेलों के प्रशासन और कैदियों पर नियंत्रण बनाए रखने के उद्देश्य से प्रेरित था. ऐसे में आजादी के बाद भी इस पुराने ढर्रे के कारण जेलें केवल सजा देने और बंदियों को बंद रखने का एक कठोर कोना बनकर रह गई थीं. बिहार की सम्राट सरकार ने राज्य की जेल व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठा लिया है.

आखिर क्यों बदला गया 132 साल पुराना कानून?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में सोमवार को आयोजित राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में ‘बिहार कारा एवं सुधारात्मक सेवा विधेयक, 2026’ को हरी झंडी दे दी गई है. इस नए कानून के प्रभावी होते ही बिहार में पिछले 132 वर्षों से चले आ रहे औपनिवेशिक काल के जेल कानून को हमेशा के लिए विदा कर दिया जाएगा. सरकार का साफ तौर पर मानना है कि समय बदलने के साथ अपराधियों के तौर-तरीके और जेल प्रशासन के सामने खड़ी चुनौतियां काफी बदल गई हैं, जिसके कारण पुराने कानून को बदलना अब बेहद जरूरी हो गया था.

केंद्र सरकार के निर्देश पर तैयार हुआ नया खाका

मिली जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार ने देश के सभी राज्यों को राष्ट्रीय स्तर पर तैयार ‘मॉडल प्रिजंस एंड करेक्शनल सर्विसेज एक्ट, 2023’ के अनुरूप अपने-अपने राज्यों के स्थानीय नियमों में बदलाव करने का निर्देश दिया था. इसी के अनुरूप बिहार गृह विभाग ने राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों और वर्तमान प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अपना नया विधेयक तैयार किया है. इस नए कानून को लागू करने का मुख्य उद्देश्य कानून व्यवस्था को आधुनिक युग के अपराधों और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सक्षम बनाना है.

यातना गृह नहीं, सुधार गृह बनेंगी अब बिहार की जेलें

विशेषज्ञ बताते हैं कि बिहार कारा एवं सुधारात्मक सेवा विधेयक, 2026 के लागू होने के बाद जेलों की पूरी परिभाषा बदल जाएगी. नए कानून में इस बात पर विशेष फोकस किया गया है कि जेलें केवल अपराधियों को बंद रखने की कालकोठरी न हों, बल्कि वे सुधार, पुनर्वास और सकारात्मक कौशल विकास का एक सुदृढ़ केंद्र बनें. इसके अंतर्गत बंदियों को समाज की मुख्यधारा से वापस जोड़ने के लिए विभिन्न प्रकार के स्किल डेवलपमेंट कोर्स कराए जाएंगे और उन्हें तकनीकी रूप से प्रशिक्षित किया जाएगा. ऐसे में सजा पूरी करने के बाद जब भी कोई बंदी बाहर निकलेगा, तो वह एक बेहतर नागरिक बनकर अपना सामान्य जीवन यापन कर सकेगा.

नए कानून में क्या-क्या बदलेगा?

नए विधेयक के तहत जेलों की भूमिका केवल बंदियों को रखने तक सीमित नहीं रहेगी. सरकार का फोकस उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाने पर होगा. प्रमुख बदलावों में ये बातें शामिल हैं-

  • जेलों को सुधार और पुनर्वास केंद्र के रूप में विकसित करना.
  • बंदियों के लिए स्किल डेवलपमेंट और व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था.
  • मानसिक स्वास्थ्य, काउंसिलिंग और पुनर्वास कार्यक्रमों को बढ़ावा.
  • जेल सुरक्षा और प्रशासन में आधुनिक तकनीक का उपयोग.
  • बंदियों के अधिकारों और गरिमा की बेहतर सुरक्षा.
  • जेल प्रबंधन को अधिक जवाबदेह और आधुनिक बनाना.

सुरक्षा व्यवस्था और कैदियों के अधिकारों को मिलेगी मजबूती

नए विधेयक में केवल कैदियों के सुधार की ही बात नहीं है, बल्कि जेलों के प्रशासनिक ढांचे और अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था को भी नए जमाने के गैजेट्स के साथ हाई-टेक करने का प्रावधान जोड़ा गया है. इसके अलावा, जेलों के भीतर बंदियों के बुनियादी मानवाधिकारों, उनके स्वास्थ्य, स्वच्छता और विधिक सहायता से जुड़े कई नए और कड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं. सरकार के इस बड़े कदम से जेल प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ेगी और जेलों के भीतर होने वाली आपराधिक व संदिग्ध गतिविधियों पर प्रभावी ढंग से लगाम लगाई जा सकेगी.

कैबिनेट से मिली मंजूरी, आएगा बड़ा बदलाव

बता दें कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक सहित कुल 10 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई. लेकिन सबसे अधिक चर्चा ‘प्रिजन्स एक्ट, 1894’ के बदले जाने की है. अपने समय के हिसाब से बनाया गया पुराना कानून अब समय के साथ अप्रासंगिक हो गया था, जबकि आज की जेल व्यवस्था की जरूरतें उससे कहीं आगे निकल चुकी हैं. ऐसे में बिहार कारा एवं सुधारात्मक सेवा विधेयक, 2026 का वर्तमान कानून अगर प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो यह बिहार की जेल व्यवस्था में पिछले एक सदी से भी बड़े बदलाव की शुरुआत साबित हो सकता है.

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