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UP CM के गजब किस्से में हम आपको आज ऐसे एक ब्राह्मण मुख्यमंत्री की कहानी सुनाएंगे जो अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया. सत्ता की मलाई काटने के बजाए अपने आत्मा की आवाज सुनी. वह भी तब जब देश में कांग्रेस की तूती बोलती थी. उस नेता की ताकत इतनी कि लखनऊ से दिल्ली तक जलवा था. लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि इंदिरा गांधी से बढ़ते मतभेदों के बीच उसे मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी? क्या यह सिर्फ सत्ता की लड़ाई थी या फिर कांग्रेस के भीतर चल रही बड़ी सियासत का हिस्सा? आइए जानते हैं हेमवती नंदन बहुगुणा की दिलचस्प कहानी.

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यूपी का वो ब्राह्मण मुख्यमंत्री जिसने इंदिरा गांधी से लिया टक्कर! छोड़ा CM पदZoom

जब कुर्सी से बड़ी हो गई ‘आत्मा की आवाज’: इंदिरा गांधी के सामने नहीं झुके हेमवती नंदन बहुगुणा. फाइल फोटो.

Hemvati Nandan Bahuguna Story: साल 1975. देश का राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल चुका था. 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी लागू हो चुकी थी. विपक्ष के कई नेता जेल में थे. प्रेस पर सेंसरशिप थी और कांग्रेस के भीतर भी केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गया था. इसी दौर में उत्तर प्रदेश की कमान संभाल रहे थे हेमवती नंदन बहुगुणा. कांग्रेस के बड़े नेता, बेहतरीन संगठनकर्ता और दमदार बोलने वाले. उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका कद इतना बड़ा माना जाता था कि लखनऊ से लेकर दिल्ली तक उनकी बात सुनी जाती थी. लेकिन यही दौर उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन अध्याय भी बना. तो आइए

कौन थे हेमवती नंदन बहुगुणा?

हेमवती नंदन बहुगुणा का जन्म 25 अप्रैल 1919 को गढ़वाल (तत्कालीन संयुक्त प्रांत, अब उत्तराखंड) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. छात्र जीवन से ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में जेल भी गए. आजादी के बाद उन्होंने कांग्रेस संगठन में तेजी से अपनी पहचान बनाई. अपनी संगठन क्षमता, भाषण शैली और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत पकड़ की वजह से वे राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर में आए.

कैसे बने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री?

1973 में कांग्रेस ने कमलापति त्रिपाठी की जगह हेमवती नंदन बहुगुणा को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया. 8 नवंबर 1973 को उन्होंने शपथ ली. इसके बाद 1974 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और बहुगुणा दोबारा मुख्यमंत्री बने. उस समय उत्तर प्रदेश देश की राजनीति का सबसे अहम राज्य माना जाता था.

उस समय देश की राजनीति कैसी थी?

1971 की लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत और बांग्लादेश युद्ध के बाद इंदिरा गांधी का राजनीतिक कद बेहद ऊंचा था. लेकिन 1974-75 आते-आते महंगाई, छात्र आंदोलन, जेपी आंदोलन और राजनीतिक अस्थिरता ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया. फिर 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली चुनाव मामले में इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य ठहराया. इसके कुछ ही दिनों बाद 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई. इमरजेंसी के बाद सत्ता में एक नए तरह की रेस आ गई. राज्यों के मुख्यमंत्री भी दिल्ली के फैसलों से सीधे प्रभावित होने लगे.

कहां से शुरू हुआ विवाद?

हेमवती नंदन बहुगुणा और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के बीच धीरे-धीरे मतभेद बढ़ने लगे. उनकी जीवनी “Hemwati Nandan Bahuguna: A Political Crusader” के अनुसार, बहुगुणा लोकतांत्रिक संस्थाओं और संगठन की भूमिका को महत्व देते थे, जबकि उस दौर में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में निर्णय लेने की शैली अधिक केंद्रीकृत होती जा रही थी. इसी वजह से दोनों के रिश्तों में दूरी बढ़ी. The Indian Express के अनुसार, इमरजेंसी के दौरान बहुगुणा की संजय गांधी से भी दूरी बढ़ी और यही घटनाक्रम आगे चलकर उनके राजनीतिक भविष्य पर असर डालता गया.

फिर चली गई मुख्यमंत्री की कुर्सी

29 नवंबर 1975 को हेमवती नंदन बहुगुणा ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया. उनकी जगह नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया गया. इतिहासकार इस घटनाक्रम को कांग्रेस की उस दौर की अंदरूनी राजनीति और केंद्रीय नेतृत्व के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में देखते हैं. उपलब्ध रिकॉर्ड यह नहीं कहते कि केवल एक कारण से उन्हें हटाया गया, लेकिन इतना जरूर दर्ज है कि मतभेद गहरे हो चुके थे.

कांग्रेस से भी अलग हो गए

मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद भी बहुगुणा शांत नहीं बैठे. 1977 में जब इमरजेंसी हटने के बाद चुनाव हुए, तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और जगजीवन राम तथा नंदिनी सत्पथी के साथ Congress for Democracy का गठन किया. बाद में यह दल जनता पार्टी के साथ आ गया. उस समय स्वयं इंदिरा गांधी ने भी माना था कि उत्तर प्रदेश में बहुगुणा का प्रभाव कांग्रेस के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है.

क्यों याद किया जाता है यह किस्सा?

हेमवती नंदन बहुगुणा की कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री की विदाई की कहानी नहीं है. यह उस दौर की भी कहानी है, जब दिल्ली और राज्यों के रिश्ते बदल रहे थे, कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन बदल रहा था और भारतीय लोकतंत्र इमरजेंसी जैसे कठिन दौर से गुजर रहा था. इसीलिए आज भी जब उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे चर्चित अध्यायों की बात होती है. तो हेमवती नंदन बहुगुणा का नाम जरूर लिया जाता है. उनकी कहानी सत्ता, संगठन, मतभेद और राजनीतिक साहस इन सभी पहलुओं को एक साथ सामने लाती है. कैसे लगी ये कहानी?

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