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कहानी साल 1996 के वर्ल्ड कप की है, जब भारत के वड़ोदरा (मोती बाग स्टेडियम) के मैदान पर एक ऐसी टीम उतरी जिसे दुनिया ने प्यार से “बुजुर्गों की फौज” कहा. यह कोई और नहीं बल्कि पहली बार वर्ल्ड कप खेलने उतरी नीदरलैंड्स (हॉलैंड) की टीम थी, जिसने साबित किया कि खेल का जज्बा उम्र का मोहताज नहीं होता.
1996 के वर्ल्ड कप की है, जब भारत के वड़ोदरा के मैदान पर एक ऐसी टीम उतरी जिसे दुनिया ने प्यार से “बुजुर्गों की फौज” कहा गया.
नीदरलैंड्स की यह टीम भले ही 1996 के वर्ल्ड कप में कोई बड़ा उलटफेर न कर पाई हो और पहले दौर में बाहर हो गई हो, लेकिन उन्होंने दुनिया के करोड़ों क्रिकेट फैंस का दिल जीत लिया. ये खिलाड़ी पेशेवर तौर पर सिर्फ क्रिकेटर नहीं थे, बल्कि इनमें से अधिकांश अपने देशों में साधारण नौकरियां या बिजनेस करते थे और क्रिकेट के प्रति अपने बेइंतहा प्यार के कारण इस मुकाम तक पहुंचे थे.
वड़ोदरा का ऐतिहासिक मैदान और अनोखा रिकॉर्ड
17 फरवरी 1996 को वड़ोदरा में न्यूजीलैंड के खिलाफ मैच से नीदरलैंड्स ने अपने वर्ल्ड कप अभियान की शुरुआत की थी। यह डच टीम का पहला आधिकारिक वन-डे इंटरनेशनल (ODI) मैच भी था. इस ऐतिहासिक मुकाबले में नीदरलैंड्स की तरफ से एक साथ कई खिलाड़ियों ने अपना वनडे डेब्यू किया. इस मैच की सबसे अनोखी बात यह थी कि मैदान पर उतरी इस टीम की औसत उम्र करीब 34.5 साल थी, जो कि आज तक के क्रिकेट इतिहास की सबसे उम्रदराज वर्ल्ड कप टीम मानी जाती है. इस टीम में चार खिलाड़ी 40 साल से ज्यादा की उम्र के थे और सात खिलाड़ी 35 वर्ष की आयु पार कर चुके थे.
47 की उम्र में वर्ल्ड कप डेब्यू: नोलन क्लार्क का जादुई रिकॉर्ड
इस “बुजुर्गों की फौज” के सबसे बड़े सेनापति थे बारबाडोस में जन्मे डच बल्लेबाज नोलन क्लार्क. जब नोलन क्लार्क इस मैच में न्यूजीलैंड के खिलाफ ओपनिंग करने उतरे, तो उनकी उम्र 47 साल 240 दिन थी. इस डेब्यू के साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट और वर्ल्ड कप इतिहास में सबसे उम्रदराज खिलाड़ी) बनने का ऐसा रिकॉर्ड स्थापित कर दिया, जो तीन दशक बाद आज भी अटूट है. क्लार्क ने केवल डेब्यू ही नहीं किया, बल्कि पूरे टूर्नामेंट में अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से दर्शकों का दिल जीता. इसी टूर्नामेंट के आखिरी मैच में जब वह पाकिस्तान के खिलाफ खेलने उतरे, तो वह वनडे खेलने वाले इतिहास के सबसे बुजुर्ग खिलाड़ी भी बन गए.
युवाओं और दिग्गजों का अनोखा संगम
इस डच टीम में केवल नोलन क्लार्क ही अकेले नहीं थे टीम के कप्तान स्टीवन लुबर्स खुद 42 साल और 323 दिन के थे. उनके अलावा टीम में श्रीलंका मूल के फ्लावियन अपोंसो (45 वर्ष) और तेज गेंदबाज पॉल-जान बकर (38 वर्ष) जैसे खिलाड़ी शामिल थ दिलचस्प बात यह है कि इसी टीम में जहां एक तरफ 47 साल के नोलन क्लार्क खेल रहे थे, वहीं दूसरी तरफ 18 साल और 344 दिन के युवा बल्लेबाज बास ज़ुइडेरेंट भी शामिल थे, जो उस वर्ल्ड कप के सबसे युवा खिलाड़ी थे. । एक ही टीम में 28 साल का यह उम्र का फासला क्रिकेट के मैदान पर एक अद्भुत नजारा था.
वड़ोदरा 1996 की यह दास्तान हमें सिखाती है कि यदि आपके भीतर अपने सपनों को जीने की जिद और खेल के प्रति सच्ची दीवानगी हो, तो उम्र के आंकड़े महज एक संख्या बनकर रह जाते है.। डच टीम का वह सफर आज भी क्रिकेट इतिहास के सबसे प्रेरक और सुनहरे पन्नों में गिना जाता है.
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मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें
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