ओटीटी की दुनिया में अमेजन प्राइम वीडियो पर नंबर वन ट्रेंडिंग वेब सीरीज ‘राख’ ने अपने रोंगटे खड़े कर देने वाले सस्पेंस से सबको हिलाकर रख दिया है. प्रोसित रॉय के डायरेक्शन में बनी यह 8 एपिसोड की डार्क क्राइम थ्रिलर सीरीज दर्शकों से एक आसान सा सवाल पूछती है- क्राइम के खौफ के सामने आप कितने हिम्मती या कितने डरपोक हैं? 1978 में दिल्ली के बैकग्राउंड में सेट यह कहानी आपको ऐसे रूहानी और दिमागी डर से रूबरू कराती है कि आठवें एपिसोड के क्लाइमैक्स तक आते-आते दर्शकों का पूरा शरीर डर और सदमे से खामोश हो जाता है.
नई दिल्ली. सच्ची घटनाओं पर आधारित क्राइम-थ्रिलर शो हमेशा से भारतीय दर्शकों के बीच एक पॉपुलर टॉपिक रहे हैं. लेकिन, जब कोई कहानी ऐसे इतिहास में जाती है जिसने कभी देश का लॉ एंड ऑर्डर और बच्चों की सुरक्षा पर नजरिया हमेशा के लिए बदल दिया था, तो डर का लेवल तेजी से बढ़ जाता है. अभी अमेजन प्राइम वीडियो पर ट्रेंड कर रही वेब सीरीज ‘राख’ इस कल्ट जॉनर का एक नया उदाहरण बनकर उभरी है. 8 एपिसोड वाली यह सीरीज 1978 में दिल्ली के उस डरावने दौर को दिखाती है, जहां क्राइम की क्रूरता इंसानी सोच से भी परे थी. सीरीज का प्लॉट दर्शकों के दिमाग से इस हद तक खेलता है कि आठवें एपिसोड के आखिर तक, कोई भी अंदर से सुन्न महसूस करता है.
मशहूर डायरेक्टर प्रोसित रॉय के डायरेक्शन में बनी यह सीरीज 1978 के रंगा-बिल्ला केस (जसबीर सिंह और कुलजीत सिंह केस) से थोड़ी बहुत प्रेरित है, जो भारतीय इतिहास की सबसे बदनाम और डरावनी घटनाओं में से एक है. असल जिंदगी का यह भयानक हत्याकांड, जिसमें दो भाई-बहनों गीता और संजय चोपड़ा को बेरहमी से किडनैप करके मार दिया गया था, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. सीरीज ‘राख’ इस भयानक सच को बहुत गंभीरता और सच्चाई के साथ दिखाती है, जिससे दर्शक यह सोचने लगते हैं कि असल जिंदगी के विलेन किसी भी मनगढ़ंत भूत से कहीं ज्यादा डरावने होते हैं.
कहानी 1978 में दिल्ली से शुरू होती है, जहां दो टीनएज भाई-बहन सुमन अरोड़ा (दिव्या शर्मा) और साहिल अरोड़ा (विवान शर्मा) एक रेडियो प्रोग्राम में हिस्सा लेने के लिए घर से निकलते हैं, लेकिन कभी वापस नहीं आते. दोनों के रहस्यमयी तरीके से गायब होने से पूरी दिल्ली में दहशत और हंगामा मच जाता है.
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शुरू में पुलिस इसे एक सिंपल मिसिंग पर्सन केस मानती है और नरमी बरतती है, लेकिन जल्द ही यह एक भयानक डबल मर्डर इन्वेस्टिगेशन में बदल जाती है. यह हाई-प्रोफाइल केस एक नए और कम अनुभवी पुलिस ऑफिसर, एसआई जयप्रकाश जाटव (अली फजल) को मिलता है. जयप्रकाश को न सिर्फ दोषियों को ढूंढना है, बल्कि पुलिस डिपार्टमेंट में बड़े पैमाने पर फैले करप्शन और ब्यूरोक्रेसी के कड़े विरोध का भी सामना करना पड़ता है.
इस बीच, बच्चों के माता-पिता मोना अरोड़ा (सोनाली बेंद्रे) और अशोक अरोड़ा (आमिर बशीर) एक असहनीय और अकल्पनीय ट्रॉमा से गुजर रहे हैं, जो किसी भी माता-पिता के लिए नरक जैसा है. सोनाली बेंद्रे ने अपने किरदारों के जरिए दुख और लाचारी के दर्द को जिंदा कर दिया है, जिससे दर्शकों की आंखों में आंसू आ गए.
यह थ्रिलर सिर्फ इन्वेस्टिगेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के दो सबसे बेरहम और मानसिक रूप से बीमार अपराधियों- रज्जो (रमनदीप यादव) और बाबू (आकाश मखीजा) को पकड़ने के लिए एक देशव्यापी मैनहंट में बदल जाती है. सीरीज में इन दो विलेन के काले दिमाग और क्रूरता को दिखाना कमजोर दिल वालों के लिए देखना बेहद मुश्किल है.
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, हर एपिसोड के साथ सस्पेंस और सस्पेंस बढ़ता जाता है. लेकिन दर्शकों के सब्र का असली टेस्ट आठवें एपिसोड में होता है. इस आखिरी एपिसोड में, जब हत्यारों के बेरहम चेहरे और पूरी साजिश सामने आती है, तो विजुअल्स और कहानी इतनी डरावनी और दिल दहला देने वाली होती है कि देखने वालों की सांसें थम जाती हैं.
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