प्राचीन वेदों और प्राकृतिक चिकित्सा से प्राचीन समय में लोग हर प्रकार की मर्ज का इलाज करते थे. बीमारी कैसी भी हो वेदों और प्राकृतिक चिकित्सा से ही उसका उपचार हो जाता था. समय जैसे-जैसे बदलता गया. वैसे-वैसे प्राकृतिक चिकित्सा भी बदलती चली गई. आज अंग्रेजी दवाइयां ने देसी जड़ी बूटियां और दवाइयां का स्थान ले लिया. समय के साथ-साथ भले ही बीमारियों का इलाज करने का तरीका बदल गया हो, लेकिन आज भी देसी इलाज कारगर साबित अधिक होता है.
प्राचीन चिकित्सा विधि से करते हैं इलाज
प्राचीन वेदों और प्राकृतिक चिकित्सा से प्राचीन समय में लोग हर प्रकार की मर्ज का इलाज करते थे. बीमारी कैसी भी हो वेदों और प्राकृतिक चिकित्सा से ही उसका उपचार हो जाता था. समय जैसे-जैसे बदलता गया. वैसे-वैसे प्राकृतिक चिकित्सा भी बदलती चली गई. आज अंग्रेजी दवाइयां ने देसी जड़ी बूटियां और दवाइयां का स्थान ले लिया. समय के साथ-साथ भले ही बीमारियों का इलाज करने का तरीका बदल गया हो, लेकिन आज भी देसी इलाज कारगर साबित अधिक होता है.
विदेशी दवाएं भले ही बीमारी की असर को कम कर देती हो, लेकिन बीमारी जस के तस बनी रहती है. भाग दौड़ भरी जिंदगी में लोगों को नरे छाती और कमर की डिस्क जाने की संभावना अधिक बढ़ गई है. लोग आपको इस तरह की बीमारियों से ग्रसित मिल भी जाएंगे. मथुरा का एक ऐसा परिवार है, जो आज भी प्राचीन पद्धति के तौर तरीके को को लेकर चल रहा है.
दुआ से ठीक होती है हर बीमारी
अगर आपकी नारे, छाती गड़बड़ हो गए हो या आपकी डिस्क चली गई हो या अन्य और भी कोई बीमारी हो तो आपको यहां दवा लेने की जरूरत नहीं है. बस आपके हाथ लगाते ही दुआ पढ़ते ही आपकी हर बीमारी का उपचार पलक झपकते ही हो जाएगा. मथुरा के भरतपुर गेट स्थित पेट्रोल पंप के पास इस मार्केट में भूरा नाम के इस युवक के परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी इलाज की प्रथा चली आ रही है. पीढ़ी दर पीढ़ी यह परिवार हेयर सैलून चलाता है. लेकिन अगर किसी व्यक्ति को नरे छाती या डिस्क गड़बड़ होने की बीमारी है, तो उसका इलाज भी यह करते हैं.
तीसरी पीढ़ी से कर रहे हैं ये काम
लोकल 18 की टीम ने जब भूरा से प्राचीन पद्धति से इलाज करने के बारे में बातचीत की तो पुराने बताया कि हमारे दादा बाबा किया करते थे. दादा बाबा के बाद हमारे पिताजी ने प्राचीन पद्धति को संभाल कर रखा. आज हम लोग हाथ पकड़ कर बता देते हैं की बीमारी क्या है. लोकल 18 से बातचीत के दौरान भूरा ने यह भी बताया कि तीसरी पीढ़ी चल रही है. हम लोगों ने पिताजी से नरे छाती और डिस्क चले जाने की बीमारी का इलाज सीख लिया है. हम लोग ऊपर वाले से दुआ मांगते हैं. छोटा-मोटा हाथ से उपचार करते हैं और वह बीमारी ठीक हो जाती है. उन्होंने यह भी बताया कि मात्र ₹50 बीमारी के ठीक करने के लेते हैं. कोई भी अंग्रेजी इलाज इनके पास नहीं है. इलाज के उपरांत नाही कोई विदेशी दवा हम किसी व्यक्ति को नहीं देते हैं.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें
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