Image Slider

.

शेर से पहचाने जाने वाले मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार को ईद के दिन भोपाल में निधन हो गया। 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। परिवार में बेटा तैयब और पत्नी राहत हैं।

बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया नामक बीमारी से घिरे थे। याददाश्त जा चुकी थी। जिंदगी की आम बातों को सरल, सहज और सलीके से कहने का हुनर रखने वाले इस बुजुर्ग शायर के घर तभी से खामोशी पसरी थी।

जानकारी के मुताबिक पंजाबी, बंगाली, नेपाली और रशियन भाषा में उनकी शायरी का अनुवाद करने का निर्णय कुछ संस्थाओं ने लिया है। इसके लिए उनके परिजन ने अपनी रजामंदी दे दी है। वैसे डॉ. बद्र के हिंदी में एक दर्जन से अधिक गजल संग्रह, जबकि उर्दू में 7 गजल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

रिवायती शायरी से नाता नहीं रखा, नए प्रयोग किए

बशीर ने उर्दू गजल को नया लहजा दिया। रिवायती शायरी से कभी नाता नहीं रखा। उर्दू शायरी में नए प्रयोग भी किए। नए लफ्जों की जगह आसान शब्दों का प्रयोग करके शायरी को नई शक्ल दी। उनकी शायरी में मोहब्बत, गुरबत, जिंदगी के कई रंग दिखाई देते हैं।

अपने तरजुमे और हादसों को भी शेरों की शक्ल दी। मसलन- ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’

वहीं, जिंदगी के सफर को करीब से देखते हुए उन्होंने कहा- ‘करीब मौसमों के आने में, मौसमों के जाने में, हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं, उम्र बीत जाती है दिल को दिल बनाने में, मैं हर लम्हें में सदियां देखता हूं।’

बशीर के साथ बेटे तैयब और उनकी पत्नी राहत।

आज शाम को अंतिम संस्कार किया जा सकता है

अंतिम संस्कार का समय अभी तय नहीं हुआ है। हालांकि परिजन के अनुसार आज शाम को अंतिम संस्कार किया जा सकता है। बशीर बद्र का साहित्यिक सफर बेहद समृद्ध और प्रेरणादायक रहा है।

साल 1969 में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) से स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। इसके बाद 12 अगस्त 1974 को उन्होंने मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर ज्वाइन किया और वर्ष 1990 तक वहां अपनी सेवाएं दीं।

साल 1974 से 1990 के बीच का दौर उनके जीवन का स्वर्णिम काल माना जाता है। इस दौरान उनकी शायरी ने नई ऊंचाइयों को छुआ और वे देश-विदेश में पहचान बनाने में कामयाब रहे। उनकी गजलों की सादगी, गहराई और आम बोलचाल की भाषा ने उन्हें आम लोगों के दिलों तक पहुंचाया।

बशीर बद्र की शायरी में मोहब्बत, दर्द और ज़िंदगी के अनुभवों की झलक मिलती है। उनके कई शेर आज भी लोगों की जुबां पर हैं और मुशायरों की जान बने रहते हैं।

बता दें साल 1969 में बशीर बद्र ने एएमयू से स्नातकोत्तर की उपाधि भी ली थी। शायर बशीर बद्र ने मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में 12 अगस्त 1974 को बतौर लेक्चरर ज्वाइन कर लिया था। वे यहां वर्ष 1990 तक रहे। वर्ष 1974-1990 का दौर बशीर बद्र के लिए काफी अहम रहा। तब वे शायरी के बुलंदी को छू रहे थे।

ये खबर भी पढ़ें…

बच्चे की तरह चहक उठे बशीर बद्र

अलहदा लहजे के शायर एवं पद्मश्री बशीर बद्र को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) से 46 साल बाद पीएचडी की डिग्री मिली है। डिग्री मिलने पर किसी मासूम की तरह चहक उठे। डिग्री को सीने से लगा लिया। बशीर बद्र की सेहत इन दिनों काफी नासाज है। वे अपनी स्मरण शक्ति खो चुके है। पढ़ें पूरी खबर…

———-

🔸 स्थानीय सूचनाओं के लिए यहाँ क्लिक कर हमारा यह व्हाट्सएप चैनल जॉइन करें।

 

Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Ghaziabad365 || मूल प्रकाशक ||