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Sarah Moin ISC Topper Lucknow: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की निवासी सारा मोइन न देख सकती है, न सुन सकती है और न ही बोल सकती है. लेकिन इस बच्ची के जज्बे के आगे सब फीका है. सारा मोइन ने आईएससी 12वीं में 98.7% लाकर इतिहास रच दिया. टेक्नोलॉजी के सही इस्तेमाल, परिवार के साथ और खुद के अटूट हौसले की यह कहानी असल मायने में सक्सेस स्टोरी है.

न कभी आवाज सुनी, न दुनिया देखी, तब भी 12वीं में 98.7% लाकर रचा इतिहासZoom

Sarah Moin Success Story: सारा मोइन पढ़ाई खत्म करने के बाद आईएएस अफसर बनना चाहती हैं

नई दिल्ली (Sarah Moin ISC Topper Lucknow). लखनऊ की सारा मोइन की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है. सारा न देख सकती हैं, न सुन सकती हैं और न ही बोल सकती हैं. जिस उम्र में बच्चे शोर मचाकर अपनी मां का ध्यान खींचते हैं, उस उम्र में सारा ने अपनी हथेली पर उकेरे गए शब्दों के जरिए दुनिया को समझना शुरू किया. उनकी मां उनकी हथेली पर अपनी उंगली से अक्षर बनाती थीं और सारा उन अक्षरों को जोड़कर सवाल-जवाब की नई दुनिया बुनती थीं. सारा के इसी संघर्ष का नतीजा आईएससी 12वीं की मार्कशीट पर चमक रहा है, जहां उन्होंने 98.7% अंक हासिल कर सबको हैरान कर दिया है.

सारा मोइन को उनके स्कूल और आस-पास के लोग प्यार से ‘लखनऊ की हेलेन केलर’ कहते हैं. बचपन में सारकॉइडोसिस (Sarcoidosis) नाम की एक दुर्लभ बीमारी ने उनसे सुनने और बोलने की शक्ति छीन ली थी. इसके अलावा, वे जन्म से ही दृष्टिबाधित भी थीं. लेकिन उनकी इस खामोश दुनिया में उनके माता-पिता और भाई ने कभी अंधेरा नहीं होने दिया. आज जब हम छोटी-छोटी समस्याओं से हार मान लेते हैं, तब सारा की सक्सेस स्टोरी से सबक मिलता है कि अगर इरादे फौलादी हों तो शारीरिक अक्षमताएं कभी आपके सपनों के आड़े नहीं आ सकतीं. पढ़िए टॉपर की सक्सेस स्टोरी.

स्पेशल नहीं, जनरल स्कूल से तय किया टॉपर बनने का सफर

सारा के पिता मोइन अहमद इदरीसी और मां जूली हामिद के सामने सबसे बड़ी चुनौती तब आई जब सारा के पुराने स्कूल ने उन्हें किसी ‘स्पेशल स्कूल’ में भेजने की सलाह दी. लेकिन सारा के माता-पिता अड़ गए कि उनकी बेटी मेनस्ट्रीम के बच्चों यानी सामान्य स्टूडेंट्स के साथ ही पढ़ेगी. पिता ने बेटी के भविष्य के लिए अपनी सरकारी नौकरी से वीआरएस (VRS) ले लिया. फिर लखनऊ के क्राइस्ट चर्च कॉलेज के प्रिंसिपल ने सारा की प्रतिभा को पहचाना और उसे अपने संस्थान में पढ़ने की अनुमति दी.

टेक्नोलॉजी के जादू से लिखी किस्मत

सारा की पढ़ाई सामान्य किताबों से मुमकिन नहीं थी. उनके शिक्षक सलमान अली काजी ने उन्हें ‘ऑर्बिट रीडर’ (Orbit Reader) नाम के डिवाइस से पढ़ाना शुरू किया. यह डिवाइस ब्रेल कीबोर्ड की तरह काम करता है. इसे लैपटॉप से भी जोड़ सकते हैं. सारा के लिए हर टेक्स्टबुक को पेज-दर-पेज स्कैन किया गया और वर्ड फाइल्स में बदला गया, जिससे डिवाइस उन्हें ब्रेल में बदल सके और सारा अपनी उंगलियों के टच से उन्हें पढ़ सकें. क्लास 10 में 95% लाने वाली सारा ने 12वीं में अपनी मेहनत से खुद का ही रिकॉर्ड तोड़ दिया.

आईएएस बनना चाहती हैं सारा

जियोग्राफी और मास मीडिया जैसे विषयों में 100 में से 100 अंक लाने वाली सारा अब रुकने वाली नहीं हैं. बोर्ड टॉपर बनने के बाद उनकी आंखों में नया सपना है- सिविल सेवा अधिकारी (IAS) बनने का. सारा देश की सेवा करना चाहती हैं. वह साबित करना चाहती हैं कि एक दिव्यांग व्यक्ति भी प्रशासन की कमान संभाल सकता है. सारा की कहानी सिर्फ एक छात्रा की कामयाबी नहीं है, बल्कि उस परिवार की जीत है जिसने हार नहीं मानी और उस टेक्नोलॉजी की भी, जिसने एक ‘स्पेशल’ बच्ची को ‘सुपर’ टॉपर बना दिया.

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Deepali PorwalSenior Sub Editor

Deepali Porwal is a seasoned bilingual journalist with 11 years of experience in the media industry. She currently works with News18 Hindi, focusing on the Education and Career desk. She is known for her versat…और पढ़ें

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