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नोएडा के पास इंदिरापुरम में गौरग्रीन अपार्टमेंट की बहुमंजिला इमारत में जब आग लगी तो फायरब्रिगेड डिपार्टमेंट भी कमोवेश लाचार नजर आया. वैसे हकीकत ये भी है कि नोएडा, दिल्ली जैसे शहर में अगर हाईराइज बिल्डिंग में 14वीं मंजिल या इससे ऊपर आग लग जाए तो उसके पास इससे निपटने के पर्याप्त उपकरण भी हैं. हालांकि ये बात भी है कि हाईराइज बिल्डिंग्स में आग बुझाने के पर्याप्त साधन खुद होने चाहिए. आइए जानते हैं कि भारत में फायर ब्रिगेड हाईराइज्स में आग बुझाने में कितने कारगर हैं.

नोए़डा में कई इमारतें 50 मंजिला या इससे ऊपर हैं. कई इतनी ही ऊंची इमारते बन रही हैं. सामान्य तौर पर 30 इमारतें दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम में बहुतायत में हैं. लेकिन हकीकत यही है कि इनमें किसी में भी अगर आग लग जाए तो फायर ब्रिगेड के पास इतने उपकरण नहीं हैं कि वो इनसे निपटने में सक्षम हो.

भारत में स्थिति मिश्रित है – बड़े महानगरों में केवल मुंबई ही ऐसी जगह है, जहां फायर ब्रिगेड के पास आधुनिक हाई-रीच उपकरण हैं. अधिकांश शहरों, खासकर एनसीआर नोएडा जैसे तेजी से ऊंचाई पकड़ते क्षेत्रों में फायर ब्रिगेड की बाहरी पहुंच अभी भी इमारतों की ऊंचाई से काफी पीछे है.

नोए़डा और दिल्ली में फायर ब्रिगेड के पास आग बुझाने के लिए कैसे उपकरण हैं

नोएड़ा और दिल्ली में सामान्य हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म करीब 30–42 मीटर ऊंचे ही हैं, जो 10 से 14 मंजिल तक ही पहुंच सकते हैं. इससे बेहतर स्काईलिफ्ट 54-70 मीटर के होते हैं, जो बेंगलुरु और मुंबई जैसे महानगरों में हैं.
हालिया NCR रिपोर्ट के अनुसार नोएडा और गाजियाबाद में कई जगह मौजूदा क्रेन करीब 42 मीटर यानि 14 फ्लोर तक ही प्रभावी हैं, जबकि शहर में 60–80 मंजिला टावर मौजूद हैं.

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नोए़डा में कितने अपार्टमेंट्स 50 मंजिल से ऊंचे हैं या इसके आसपास के हैं

नोएडा में सुपरटेक सुपरनोवा 70 मंजिलों से ज्यादा की है. जबकि कई कई नए सेक्टरों में 50 – 70 मंजिला प्रोजेक्ट बन रहे हैं.

तो नोएडा और एनसीआर में ज्यादा मंजिलों वाली इमारतों में आग बुझाने के लिए कौन सी तकनीक इस्तेमाल हो रही है

नोएडा फायर विभाग ने सीएएफएस यानि कंप्रेस्ड एयर फोम सिस्टम जैसी तकनीक अपनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो सैद्धांतिक रूप से 100 मंजिल तक फोम पहुंचाने में मदद कर सकती है, लेकिन यह अभी पारंपरिक “सीढ़ी से रेस्क्यू” जैसा समाधान नहीं है. नोएडा जैसे शहरों में टावर तेजी से ऊपर जा रहे हैं, लेकिन फायर रेस्क्यू इंफ्रास्ट्रक्चर अभी पूरी तरह उसी गति से नहीं बढ़ा है.

तो भारत आग से निपटने के लिए असली सुरक्षा किस पर निर्भर है?

– आमतौर पर इसमें बिल्डिंग की अपनी फायर सेफ्टी ही इससे रक्षा करने का काम कर सकती है. जिसमें स्प्रिंकलर, वेट राइजर, फायर पंप, स्मोक एक्सट्रैक्शन,रिफ्यूज एरिया, प्रेसराइज्ड सीढ़ियां और फायरमैन लिफ्ट बनाई जाती हैं. लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि इनका रखरखाव नहीं हो पाता ना ही फायर सेफ्टी के आडिट का कोई सिस्टम बना हुआ है. एक बार हाईराइज बिल्डिंग को नो आब्जेक्शन सर्टिफिकेट मिलने के बाद शायद ही रखरखाव पर ध्यान दिया जाता है. पाइपलाइन में प्रेशर नहीं रहता. अलार्म काम नहीं करते. रिफ्यूज एरिया स्टोरेज बन जाते हैं.
वैसे देश में 30 मंजिल तक कुछ हद तक सरकारी फायर ब्रिगेड मदद कर सकती है, लेकिन 50–100 मंजिल वाली इमारतों में सुरक्षा का असली आधार बिल्डिंग का खुद का फायर इंजीनियरिंग सिस्टम है.
भारत में कुछ बड़े शहरों ने 14 मंजिल से ऊपर तक पहुंचने वाले आधुनिक हाई-राइज फायरफाइटिंग उपकरण खरीदे हैं, लेकिन यह सुविधा अभी चुनिंदा महानगरों तक सीमित है.

आग बुझाने को लेकर भारत के बड़े महानगरों में फायर सेफ्टी उपकरणों की क्या स्थिति है

मुंबई में 100 मीटर तक के फायर सेफ्टी प्लेटफॉर्म हैं, ये देश का सबसे उन्नत हाईराइज फायर सिस्टम है, जिसकी बाहरी पहुंच करीब 20–30 मंजिल तक है. दिल्ली में ब्रोंटो स्काईलिफ्ट हैं, जो 70 मीटर तक जा पाती हैं, इसका मतलब ये है कि वो 20 फ्लोर तक को संभाल सकती है.
बेंगलुरु में 52मीटर के प्लेटफॉर्म हैं, जिससे फायर ब्रिगेड की बाहरी पहुंच 16 से 18 मंजिलों तक हो पाती है.
हैदराबाद, कोलकाता में कुछ हाईराइज उपकरण ही हैं, वहां सीमित उपकरणों से ही काम चलाना पड़ता है जबकि यहां हाईराइज्स भवन बढ़ रहे हैं
वैसे सबसे बड़ी वास्तविकता ये है कि 50 मंजिल से ऊंची इमारतों में कोई भी भारतीय फायर ब्रिगेड बाहरी सीढ़ी से सीधे शीर्ष मंजिल तक नहीं पहुंच सकती.

विकसित देशों जैसे सिंगापुर, दुबई, जापान, अमेरिका में क्या अलग है?

– सिंगापुर में सिविल डिफेंस फोर्स दुनिया की सबसे व्यवस्थित शहरी फायर एजेंसियों में गिनी जाती है. वहां की मुख्य रणनीति बिल्डिंग आधारित फायर बचाव की है. इसके लिए हर यूनिट में ऑटो स्प्रिंकलर जरूरी है. फायरमैन लिफ्ट जरूर होती है. कुछ मंजिलों पर रिफ्यूज फ्लोर होते हैं. प्रेसराइज्ड स्टेयरवेल होते हैं और डिजिटल बिल्डिंग कमांड सिस्टम होता है. वहां ड्रोन और रोबोटिक्स की मदद आग बुझाने में ली जाने लगी है. सालाना फायर सेफ्टी का ऑडिट बहुत कड़ा होता है, अगर सिस्टम खराब मिला तो भारी जुर्माना होता है.
दुबई के बुर्ज खलीफा का अपना जोनल फायर सिस्टम है. हाईप्रेशर पंप हैं. फायर-रेसिस्टेंट क्लैडिंग हैं और कंट्रोल रूम. अमेरिका में इसके आधुनिक उपकरण और हर बिल्डिंग का अपना फायर सेफ्टी सिस्टम है.

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नेशनल बिल्डिंग कोड क्या कहता है

भारत में 15 मीटर से ऊपर इमारतों पर विशेष फायर सेफ्टी नियम लागू होते हैं, जबकि 70 मीटर से ऊंचे टावरों के लिए और कड़े मानक हैं. फायर लिफ्ट,ड्यूल सीढ़ियां, रिफ्यूज फ्लोर, हाई-कैपेसिटी पंप, इमरजेंसी कमांड सेंटर होने चाहिए.

वैसे ऊंची इमारतों में फायर सुरक्षा के लिए क्या होता है

आमतौर पर ऊंची इमारतों में कोशिश की जाती है कि उनका अपना फायर सेफ्टी सिस्टम इतना मजबूत और प्रभावी हो कि वो अपनी रक्षा खुद कर ले. 100 मंजिल इमारत की सुरक्षा फायर ट्रक की ऊंचाई से नहीं, बल्कि बिल्डिंग इंजीनियरिंग, रखरखाव और आपदा प्रबंधन से तय होती है.

भारत का फायर डिपार्टमेंट उस तरह से मुस्तैद क्यों नहीं पाया, जिस तरह से शहरों में हाईराइज्सस बढ़ रहे हैं

भारत में हाईराइज इमारतों की रफ्तार और फायर-रेस्क्यू इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी के बीच बड़ा अंतर है. हमारा फायर डिपार्टमेंट अब भी दशकों पुरानी स्थिति में लगता है. लेकिन समस्या सिर्फ उपकरणों की नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, बजट, नियमन और प्रशासनिक प्राथमिकताओं की भी है.
नोएडा, गुरुग्राम, मुंबई, पुणे, हैदराबाद जैसे शहरों में टावर तेजी से बने लेकिन फायर सेवाओं का विस्तार उतनी तेज गति से नहीं हुआ. रियल एस्टेट निवेश अक्सर सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर से आगे निकल गया.
भारत में फायर डिपार्टमेंट मुख्यतौर पर राज्य और नगर निकायों पर निर्भर हैं. हर शहर की क्षमता अलग है. राष्ट्रीय स्तर पर समान हाईराइज फायर मानक लागू करना चुनौतीपूर्ण है. 70मीटर से 100मीटर ब्रोंटो स्काईलिफ्ट या हाईड्रोलिक प्लेटफॉर्म बहुत ज्यादा महंगे हैं. इनका रखरखाव भी खर्चीला है. कई इलाकों में फायर टेंडर की पहुंच ही कठिन है. बिल्डर NOC लेते हैं, पर बाद में उसकी देखरेख पर कतई ध्यान नहीं देते. नतीजतन स्प्रिंकलर खराब, पंप निष्क्रिय,रिफ्यूज एरिया बंद मिलते हैं. सेफ्टी ऑडिट होता नहीं लेकिन उसकी जगह फार्मेलिटी ही होती है. आधुनिक हाईराइज फायरफाइटिंग के लिए विशेष प्रशिक्षण जरूरी है. वहीं सिंगापुर जैसी जगहों पर फायर सुरक्षा शहरी नियोजन का अनिवार्य हिस्सा होता है. नियमित ड्रिल और डिजिटल मॉनिटरिंग भी. लापरवाही पर कड़े दंड भी.

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