70 और 80 के दशक में एक ऐसी हीरोइन उभरी, जिसने अपने बेबाक अंदाज से फिल्मी पर्दे की परिभाषा ही बदल दी. उन्होंने अपनी बोल्ड इमेज और वेस्टर्न लुक से उस दौर की पारंपरिक हीरोइन के सांचे को पूरी तरह तोड़ दिया था. वह अपने समय की टॉप स्टार रहीं, जिनका स्टाइल और ग्लैमर हर किसी के लिए मिसाल बन गया था. मगर बेशुमार शोहरत के पीछे एक दर्दनाक कहानी भी छिपी थी. उनकी निजी जिंदगी गहरे अकेलेपन और मानसिक संघर्षों के बीच उलझकर रह गई, जिसने उन्हें धीरे-धीरे तबाह कर दिया.
नई दिल्ली. बॉलीवुड की मशहूर एक्ट्रेस परवीन बाबी का बचपन संघर्षों से भरा रहा. महज 6 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की. साल 1973 में उनकी किस्मत तब बदली, जब एक डायरेक्टर की नजर कैंपस में उन पर पड़ी और उन्हें फिल्म का ऑफर मिला. हालांकि, उनकी पहली फिल्म फ्लॉप रही, लेकिन उनके चेहरे का जादू चल गया और दो साल के भीतर ही वह अमिताभ बच्चन के साथ स्क्रीन शेयर करने लगीं. परवीन बाबी बॉलीवुड की पहली हीरोइन थीं, जिन्होंने मशहूर टाइम मैगजीन के कवर पेज पर जगह मिली थी.
70 और और 80 के दशक में परवीन बॉलीवुड की फीमेल सुपरस्टार बनकर उभरीं. ‘दीवार’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘शान’ और ‘नमक हलाल’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के जरिए उन्होंने उस दौर के हर बड़े स्टार के साथ काम किया. परवीन ने अपनी शर्तों पर जिंदगी जी और हिंदी फिल्मों की पारंपरिक हीरोइनों की छवि को पूरी तरह बदल दिया. वह खुद को हमेशा एक आजाद ख्याल वाली महिला मानती रहीं.
फिल्म शान की शूटिंग के दौरान परवीन की जिंदगी में एक अंधेरा मोड़ आया. उन्होंने अचानक शूटिंग से गायब होना शुरू कर दिया और को-एक्टर्स को उनके पीलिया होने की झूठी खबरें दी गईं. वह गंभीर मानसिक तनाव और पैरानोइड का शिकार हो गईं, जहां उन्हें अपना फोन टैप होने और घर में जासूसी करने वाले डिवाइसेस का डर सताने लगा. महेश भट्ट के साथ सफर के दौरान उन्होंने कार में बम होने के डर से चिल्लाते हुए चलती गाड़ी से सड़क पर छलांग लगा दी थी.
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परवीन बाबी के निजी जीवन में रिश्तों के उतार-चढ़ाव ने भी काफी सुर्खियां बटोरीं. अपने करियर के शुरुआती सुनहरे दौर में उनका नाम मशहूर एक्टर कबीर बेदी के साथ जुड़ा. दोनों का रिश्ता काफी चर्चा में रहा और एक समय पर वे बॉलीवुड के सबसे ग्लैमर्स कपल्स में से एक माने जाते थे. हालांकि, आपसी मतभेदों और परवीन की बदलती मानसिक स्थिति के कारण यह साथ लंबा नहीं चल सका और आखिरकार दोनों की राहें हमेशा के लिए जुदा हो गईं.
साल 1983 में जब परवीन अपने करियर के शिखर पर थीं, तब वह अचानक दुनिया की नजरों से ओझल हो गईं. वह न्यूयॉर्क चली गईं और वहां दार्शनिक यूजी कृष्णमूर्ति के प्रभाव में आकर करीब एक दशक तक गुमनामी की जिंदगी जी. साल 1984 में उन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखी और उसकी मैन्युस्क्रिप्ट कृष्णमूर्ति के पास छोड़ दी, जो कभी छप नहीं पाई. जब 1992 में वह मुंबई लौटीं, तो उन्हें पहचानना तक मुश्किल था. तब पता चला कि वह पैरानॉयड स्किजोफ्रेनिया जैसी गंभीर मानसिक बीमारी की गिरफ्त में हैं.
भारत लौटकर उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर अमिताभ बच्चन और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर अपनी हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया, जिसे सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया गया. 1993 के बम धमाकों में भी उन्होंने सबूत होने का दावा किया, लेकिन जान के डर से कोर्ट नहीं पहुंचीं. वह पूरी तरह अकेलेपन में सिमट गईं, हर बातचीत को रिकॉर्ड करने लगीं और 2001 में मां के निधन के बाद उनका कोई सहारा नहीं बचा था.
22 जनवरी 2005 की सुबह, परवीन बाबी के दरवाजे पर कई दिनों से दूध और अखबार पड़े हुए थे. जब पुलिस ने दरवाजा तोड़ा, तो अंदर 50 साल की परवीन का बेजान शरीर पड़ा मिला. बीमारी और अकेलेपन ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया था, उनके पेट में दाने का एक टुकड़ा तक नहीं था. तीन दिन पहले ही उनकी घर में मौत हो चुकी थी. हैरानी की बात यह थी कि मौत के बाद भी उनका शव लेने कोई आगे नहीं आया, जिसके बाद महेश भट्ट ने उनका अंतिम संस्कार करवाया था.
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