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Black Wheat Farming: गोंडा के युवा किसान मनोज मिश्रा ने पारंपरिक खेती की लीक से हटकर ‘काले गेहूं’ की पैदावार कर अपनी एक अलग पहचान बनाई है. यूट्यूब से आइडिया लेकर शुरू की गई यह खेती आज न केवल इलाके के किसानों के लिए प्रेरणा बनी है, बल्कि सेहत और कमाई दोनों के मामले में वरदान साबित हो रही है. बिना किसी हानिकारक रासायनिक खाद के पूर्ण रूप से जैविक तरीके से उगाई जाने वाली यह फसल कैंसर, डायबिटीज और दिल की बीमारियों से लड़ने में बेहद कारगर मानी जाती है. कम लागत और सामान्य गेहूं से कहीं बेहतर दाम मिलने के कारण अब आसपास के कई किसान इस सफल तकनीक को अपनाकर अपनी आमदनी दोगुनी करने की राह पर निकल पड़े हैं.
गोंडा: आज के दौर में जहां ज्यादातर युवा खेती-किसानी से दूर भाग रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के एक युवा ने अपनी मेहनत और नई सोच से सबको एक नया रास्ता दिखाया है. गोंडा के विकासखंड इटियाथोक के रहने वाले मनोज मिश्रा ने वह कर दिखाया है, जो इलाके के दूसरे किसानों के लिए एक मिसाल बन गया है. जहां अमूमन किसान सालों से वही पारंपरिक गेहूं और धान उगाते आ रहे हैं, वहीं मनोज ने ‘काले गेहूं’ (Black Wheat) की खेती शुरू कर एक नई राह चुनी है. उनकी यह कोशिश न सिर्फ उनकी जेब भर रही है, बल्कि लोगों की सेहत का भी ख्याल रख रही है.
यूट्यूब के एक वीडियो ने दिखाया रास्ता
मनोज बताते हैं कि एक दिन यूट्यूब देखते समय उनकी नजर काले गेहूं की खेती पर पड़ी. उन्हें यह आइडिया काफी पसंद आया. इसके बाद उन्होंने खुद काफी रिसर्च की और यह जानने की कोशिश की कि क्या गोंडा की मिट्टी और यहां का मौसम इस फसल के लिए सही है. शुरुआत में उन्होंने रिस्क न लेते हुए अपनी थोड़ी सी जमीन पर काले गेहूं के बीज बोए. जब फसल कटने का समय आया, तो पैदावार उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छी रही. जिसके बाद उन्होंने इसे बड़े स्तर पर शुरू कर दिया और आज वह एक सफल और प्रगतिशील किसान के रूप में पहचाने जाते हैं.
दवा की तरह काम करता है यह गेहूं
मनोज मिश्रा के अनुसार, काले गेहूं की सबसे बड़ी खासियत इसका पोषण है. सामान्य गेहूं के मुकाबले इसमें एंथोसाइनिन (Antioxidant) नाम का तत्व बहुत ज्यादा मात्रा में पाया जाता है. यही कारण है कि इसका रंग काला होता है. डॉक्टर्स की मानें तो यह गेहूं दिल की बीमारी, डायबिटीज (शुगर) और मोटापे से लड़ रहे लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. बाजार में बढ़ती डिमांड के पीछे सबसे बड़ी वजह इसका सुपरफूड होना है.
एक खास बात जो मनोज की खेती को दूसरों से अलग बनाती है, वह है खाद का चयन. मनोज अपने खेत में किसी भी तरह के हानिकारक रासायनिक खाद या कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करते. उनकी पूरी खेती जैविक (Organic) तरीके से होती है. मनोज का कहना है कि जब लोग इसे सेहत के लिए खरीद रहे हैं, तो इसे शुद्ध होना ही चाहिए. केमिकल फ्री होने की वजह से मार्केट में उन्हें इसके बहुत अच्छे दाम मिल रहे हैं.
कम खर्च और ज्यादा मुनाफा
अक्सर किसानों को लगता है कि नई तरह की खेती में बहुत ज्यादा पैसा खर्च होगा, लेकिन काले गेहूं के साथ ऐसा नहीं है. इसकी खेती का तरीका बिल्कुल सामान्य गेहूं जैसा ही है. लागत कम आती है और देखभाल भी उतनी ही करनी पड़ती है, जितनी आप साधारण गेहूं की करते हैं. बस बीज सही होना चाहिए. चूंकि बाजार में काले गेहूं की कीमत सामान्य गेहूं से काफी ज्यादा है, इसलिए किसानों की आमदनी में सीधा इजाफा होता है. मनोज की कामयाबी की चमक अब उनके खेतों से निकलकर पूरे जिले में फैल रही है. उन्हें देखकर आसपास के गांवों के किसान भी अब काले गेहूं की खेती में दिलचस्पी दिखा रहे हैं.
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सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें
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