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Anu Malik Life Story : ये कहानी बॉलीवुड के एक ऐसे फनकार की है जिसने महज 7 साल की उम्र में अपने हुनर का जादू दिखाना कर दिया था. यह दास्ता बॉलीवुड के उस सितारे की है जिसने गुरबत को अपने हुनर और लगन से हराया. उस फनकार की जिसने अपनी पिता की गरीबी से जूझते देखा. जब कामयाबी मिली तो पिता की हर इच्छा पूरी की. यहां तक कि बस स्टॉप पर लाचार खड़े पिता को नई कार खरीदकर दे दी. अपनी मेहनत से बॉलीवुड का चमकता सितारा बना. अमिताभ बच्चन इस फनकार के दीवाने थे. शाहरुख खान तो इस फनकार के ताउम्र एहसानमंद रहेंगे. शाहरुख खान के करियर को अर्श पर पहुंचाने में इस सितारे ने अहम भूमिका निभाई.

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अनु मलिक अपने पिता सरदार मलिक को बहुत प्यार करते थे….

यह कहानी बॉलीवुड के मशहूर संगीतकार अनु मलिक की है जिनका वास्तविक नाम अनवर मलिक है. संगीत उन्हें विरासत में मिला. उनके पिता सरदार मलिक भी संगीतकार थे. 1927 में जन्मे सरदार मलिक कपूरथला के रहने वाले थे. फिर मुंबई का रुख किया. काफी साल संघर्ष करने के बाद भी वो अपना मुकाम बॉलीवुड में नहीं बना पाए. एक फिल्म में उन्होंने शानदार म्यूजिक दिया. उन्हें सारंगा मैन से लोग जानने लगे. ‘सारंगा तेरी याद में’ गाना उन्होंने कंपोज किया था. सरदार मलिक के घर में ही संगीतकार अनु मलिक का जन्म हुआ. बचपन से गरीबी देखी. पिता का संघर्ष देखा.

गीतकार हसरत जयपुरी संगीतकार अनु मलिक के मामा थे. बचपन से ही उन्हें संगीत का माहौल मिला. धुन समझ में आने लगीं. शंकर-जयकिशन के गानों का उन पर गहरा असर पड़ा. स्कूल के दिनों में उन्होंने एक मराठी कविता की धुन बनाई थी. धुन जब पिता को सुनाई तो वो हैरान रह गए. उन्होंने गानों की लंबी-चौड़ी लिस्ट अनु मलिक को दे दी और उनकी धुन बनाने को कहा.

अनु मलिक ने धुन बनानी शुरू कीं. अपने पिता को कई धुनें सुनाईं. सरदार मलिक अपने बेटे की प्रतिभा को देखकर बेहद खुश हुए. अनु मलिक ने मुंबई के मीठी बाई कॉलेज से बीए किया. अनु मलिक एक आईपीएस अफसर बनना चाहते थे लेकिन उन्हें सफलता संगीत के क्षेत्र में मिली. अनु मलिक को फिल्म इंडस्ट्री में काम दिलाने में गीतकार समीर के पिता अनजान ने बहुत मदद की.

  1. अनु मलिक ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था, ‘मैंने अपने पिता को बिना काम के घर पर देखा. फिर उन्हें वचन दिया कि एक दिन मैं बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशकों को घर लाकर दिखा दूंगा. मैंने 14 साल की उम्र में पहला गाना रिकॉर्ड किया था. मुझे बहुत बड़ी पिक्चर मिली थी. प्रोड्यूसर ने मुझसे कहा कि फिल्म तो दे देंगे लेकिन गीतकार अनजान को लेकर आओ. अनजान साहब उन दिनों बहुत बिजी थे. मैंने उन्हें फोन किया लेकिन उन्होंने उठाया नहीं. फिर मुझे पता चला कि वो सुबह-सुबह बीच पर घूमने जाते हैं. मैं सुबह-सुबह उनसे मिला. मैंने अपने पिता का परिचय दिया. वो मेरे घर पर सुबह 10 बजे आए. सिर्फ एक रूम का घर था. मैंने उनके पैर छुए. मैंने उन्हें ट्यून सुनाईं.’
  2. अनु मलिक ने आगे बताया, ‘मैंने उन्हें पहली ट्यून ‘याद तेरी आएगी, मुझको बड़ा सताएगी’ सुनाई. दो घंटे तक सिटिंग चली. उठे और मुझे गले लगाया. पूरा किस्सा एफसी मेहरा की फिल्म ‘एक जान हैं हम’ से जुड़ा हुआ है जो कि 1983 में आई थी.
  3. अनु मलिक ने अपने करियर में बहुत संघर्ष किया. वो कहते हैं कि उन्होंने जो भी किया, अपने पिता के लिए किया. अनु मलिक ने अपने एक इंटरव्यू में बताया, ‘मेरे माता-पिता दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं. मेरा राइट हैंड मेरी मां है. मेरा लेफ्ट हैंड जिससे मैं बाजा बजाता हूं, वो मेरे पिता हैं. जब मैंने पहली बार ट्यून बनाई थीं तो मेरे पिता ने कहा था कि मुझ पर सरस्वती मां की कृपा है.’
  4. अनु मलिक अपने परिवार के बारे में बताते हैं, ‘मेरी मां ने बहुत दर्द सहा है. वो बहुत ज्यादा नहीं बोलती थीं. हमारे घर के बगल में एक साउंड रिकॉर्डिस्ट रहते थे. वो जब गाना रिकॉर्ड करके घर लौटते थे तो गाने बजाते थे. उनके घर पर बड़े-बड़े प्रोड्यूसर-डायरेक्टर आया करते थे. उनके घर पर पार्टियां हुआ करती थीं. मैं हार मानकर घर पर लेटा हुआ था. तब मेरी मां ने थप्पड़ जड़ दिया था और कहा था कि तुम इस तरह से हार नहीं मान सकते. उन्होंने कहा था कि तुम सभी बड़े निर्माता-निर्देशक घर पर आएंगे लेकिन तुम इस तरह से लेट काम नहीं ले सकते. तपती हुई धूप में मुझे घर से भेजा.’
  5. अनु मलिक बताते हैं, ‘मैं पिताजी का बाजा लेकर घर से निकला. बसों में सफर किया. आज भी मेरी गाड़ी पर बाजा रखा रहता है. ना जाने कहां निर्माता मिल जाए और मेरा गाना पसंद आ जाए. मेरे अंदर वो जज्बा आज भी है. पिता जी मेरे खुद्दार थे और वो काम मांगने नहीं जाते थे. मैंने कहा कि मैं काम मांगने जाऊंगा. आरडी बर्मन, कल्याण जी- आनंद जी इंडस्ट्री पर राज कर रहे थे. लता मंगेशकर-किशोर कुमार बहुत बिजी थे. स्टूडियो बुक थे.’

पिता को खरीदकर दी नई कार

अनु मलिक बताते हैं कि उनके पिता कुछ नहीं बोलते थे. बस दूर से मुस्कुराते रहते थे. मैंने उनसे कह दिया था कि आज से आप काम करने नहीं जाएंगे. आपको जो चाहिए, मिल जाएगा. अनु मलिक ने एक बार नई कार लाकर अपने पिता को दी थी. वो इस किस्से के बारे में बताते हैं, ‘जब मेरा टाइम शुरू हो गया तो मैंने देखा कि मेरे पिता बस स्टॉप पर खड़े हुए हैं. मैंने गाड़ी मोड़ी, फोन किया और एक नई गाड़ी खरीदी. पिता जी से कहा कि यह गाड़ी आपकी और यह ड्राइवर आपका है. ये बहुत बड़ा काम तो नहीं था लेकिन जिसके लिए मैं काम कर रहा था, वो बस स्टॉप पर क्यों असहाय खड़ा था.’

‘मर्द’ फिल्म से मिली पहचान

अनु मलिक 1985 की ‘मर्द’ फिल्म से पहचान मिली. इस फिल्म में उन्होंने अमिताभ बच्चन के लिए गाने कंपोज किया था. मनमोहन देसाई ने उन्हें काम दिया था. फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. इसके बाद बाजीगर (1993), विजयपथ (1994), अकेले हम अकेले तुम (1995), दिलजले ((1996), बॉर्डर (1997), बादशाह (1997), सोल्जर (1998) जैसे फिल्मों में सुपरहिट म्यूजिक देकर अपनी पहचान बनाई.

2000 के दशक में भी अनु मलिक ने अपने संगीत का जादू बिखेरा. हेरा-फेरी (2000), जोश (2000), अजनबी (2000), मुन्ना भाई एमबीबीएस (2003), मैं हूं ना (2004), मर्डर (2004), नो एंट्री (2005), दम लगा के हइशा (2015) जैसी फिल्मों में अपनी सुरीली धुनों से दर्शकों का दिल जीत लिया.

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Chaturesh TiwariNews Editor

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