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मंगोलपुरी जूता फैक्टरी
– फोटो : भूपिंदर सिंह

विस्तार

मंगोलपुरी हादसे ने चार परिवारों के चिराग बुझा दिए। अब इस हादसे ने औद्योगिक क्षेत्र की दूसरी फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों के मन में भी भय का माहौल पैदा कर दिया है। रोजी-रोटी की मजबूरी में मजदूर धुएं, केमिकल और तपिश के बीच हरदिन अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं। कहीं संकरे रास्ते हैं तो कहीं निकासी के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं। मजदूरों की मानें तो 12 से 15 हजार वेतन के लिए उन्हें हर दिन खतरे से जूझना पड़ता है और सुरक्षा की आवाज उठाने पर नौकरी जाने का डर सताता है। 


मंगोलपुरी औद्योगिक क्षेत्र के फेज-1 स्थित बी-ब्लॉक में जूते और चप्पल बनाने वाली कई फैक्ट्रियां संचालित हैं। मजदूरों के मुताबिक, इनमें से कई इमारतों में बाहर निकलने के लिए सीमित रास्ते हैं। वैकल्पिक निकासी के लिए बालकनी या अन्य व्यवस्था भी नहीं है। चोरी रोकने के नाम पर कई बार गेट लगाकर फ्लोर बंद कर दिए जाते हैं। इससे आपातस्थिति में बाहर निकलना मुश्किल हो सकता है। एक जूता फैक्टरी में काम करने वाले बाबूलाल बताते हैं कि मजदूरों के पास काम से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज तक नहीं होते। उन्हें 12 से 15 हजार रुपये मासिक वेतन पर जोखिम भरे माहौल में काम करना पड़ता है।

संकरी जगह और सामान से भरी सीढ़ियां बढ़ा रहीं खतरा

मजदूरों के अनुसार, जगह की कमी के कारण कई फैक्ट्रियों में काम करने के साथ-साथ सुरक्षित निकासी के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं है। 

केमिकल, धुएं और गर्मी के बीच तैयार होते हैं जूते 

मजदूरों ने बताया कि जूते बनाने की प्रक्रिया में डीओपी, प्राइमर 234, आरसी 256, बीसी और एमके जैसे केमिकल का इस्तेमाल होता है। आरोप है कि इनके इस्तेमाल के दौरान कई फैक्ट्रियों में पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नहीं किए जाते। पीवीसी को मशीनों में गर्म कर पिघलाने के दौरान निकलने वाले धुएं से सांस लेने में परेशानी होती है। वहीं, मशीनों में लगे कई हीटरों के कारण फैक्टरी के अंदर तापमान भी काफी बढ़ जाता है।

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