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Rice Flour Rangoli: दिवाली पर तेलंगाना के पारंपरिक घर प्राकृतिक सजावट के अनूठे अंदाज से जगमगा उठते हैं. यहां गोबर से घरों की लिपाई, गेरू से दीवारों और आंगन की सजावट तथा चावल के आटे से सुंदर रंगोली बनाई जाती है. इस परंपरा में सिंथेटिक रंगों और प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं किया जाता. प्राकृतिक सामग्रियों से घर सजाने का यह तरीका तेलंगाना की लोक संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली की खूबसूरती को दर्शाता है.
तेलंगाना के ग्रामीण अंचलों और पारंपरिक घरों में दिवाली की सुबह केवल पटाखों या आधुनिक सजावट से नहीं, बल्कि मिट्टी और गोबर की सोंधी खुशबू से शुरू होती है. शहरी इलाकों में जहां आर्टिफिशल रंगों की रंगोली का चलन बढ़ा है, वहीं तेलंगाना के गांवों में आज भी त्योहार की शुरुआत ज़मीन और प्रकृति से जुड़कर की जाती है.
त्योहार के दिन भोर में ही घर की महिलाएं आंगनों में पानी छिड़ककर सफाई करती हैं. इसके बाद फर्श पर रंगोली बनाई जाती है. इसमें रासायनिक रंगों की जगह शुद्ध चावल के आटे और चूने का उपयोग होता है. मान्यता है कि चावल का आटा ज़मीन पर रेंगने वाली चींटियों और छोटे जीवों के लिए पहला आहार बनता है.
रंगोली के ठीक बीचों-बीच और मुख्य चौखट पर गाय के ताजे गोबर से बने छोटे-छोटे शंक्वाकार पिरामिड रखे जाते हैं, जिन्हें गोब्बेम्मा कहा जाता है। लोक मान्यताओं में इन्हें देवी लक्ष्मी और गोदा देवी का जीवंत रूप माना जाता है.
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गोब्बेम्मा को केवल सादा नहीं छोड़ा जाता, बल्कि इसका विधिवत शृंगार होता है. महिलाएं इन पिरामिडों पर हल्दी और कुमकुम के टीके लगाती हैं. इनके शीर्ष पर गेंदे, कन्नेरु या सीताफल के ताजे पीले फूल और दूर्वा घास सजाई जाती है, जो समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है.
दिवाली पर तेलंगाना के घरों की चौखटों और दीवारों के निचले हिस्से को पीली मिट्टी और लाल गेरू से रंगा जाता है. लाल और पीले रंगों का यह संयोजन दक्कनी लोक वास्तुकला की सदियों पुरानी पहचान है. यह घर को एक प्राकृतिक, उत्सवमय और भव्य रूप देता है.
यह परंपरा केवल अंधविश्वास या दिखावा नहीं है. गाय का गोबर और हल्दी बेहतरीन प्राकृतिक एंटीबैक्टीरियल एजेंट हैं. बारिश के तुरंत बाद आने वाले इस त्योहार के समय वातावरण में कीड़े-मकोड़े अधिक होते हैं. चौखटों पर गेरू, मिट्टी और गोबर का लेप घर को हानिकारक कीटों और संक्रमण से सुरक्षित रखता है.
तेलंगाना की संस्कृति कृषि प्रधान जीवनशैली से गहराई से जुड़ी है. गोब्बेम्मा की परंपरा दरअसल गोधन और मवेशियों के प्रति आभार व्यक्त करने का तरीका है. यह त्योहार सिखाता है कि उत्सव का वास्तविक आनंद प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना, उसके संसाधनों का सम्मान करने में है.
प्लास्टिक के स्टिकर्स और सिंथेटिक रंगों की चकाचौंध के बीच तेलंगाना की यह परंपरा सादगी की मिसाल पेश करती है. गोब्बेम्मा और लाल गेरू से सजे ये आंगन आज भी याद दिलाते हैं कि हमारी सांस्कृतिक पहचान मिट्टी, सादगी और पर्यावरण के संरक्षण में ही सुरक्षित है.
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