प्यार में कभी किसी पर इतना भरोसा हो जाता है कि अपना दिल भी उसी के नाम कर देते हैं. फिर वही शख्स जब आंखों के सामने नहीं रहता तो शिकायत उसकी गैरमौजूदगी से कम और अपने उस दिल से ज्यादा होती है. जिसे हम उसके पास छोड़ आए होते हैं. प्रेम में बिछड़ने का दर्द शायद यही है. इंसान सामने वाले को रोक नहीं पाता, लेकिन अपने दिल को भी समझा नहीं पाता. नुसरत फतेह अली खान की मशहूर कव्वाली ‘बीबा साडा दिल मोड़ दे’ इसी बिखरने, भरोसे और जुदाई की कहानी कहती है.
पहली लाइन ही पूरा दर्द
कव्वाली की पहली लाइन ही पूरे दर्द को सामने रख देती है. ‘जे तू अखियां दे सामने नहीं रहना, ते बीबा साडा दिल मोड़ दे’. यानी अगर तुम मेरी आंखों के सामने नहीं रहना चाहते, अगर तुम्हारा मेरे साथ रहना मंजूर नहीं, तो ‘बीबा’ यानी ‘प्यार’ कम से कम मेरा दिल मुझे वापस कर दो. यहां दिल सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि उस रिश्ते की निशानी है, जिसमें आशिक अपना सब कुछ सामने वाले को सौंप चुका है.
मोहब्बत की सबसे बड़ी कमजोरी
इसके बाद शिकायत और गहरी हो जाती है. प्रेमी कहता है कि उसने अपने साजन पर भरोसा किया था, उसके प्यार को सच माना था. लेकिन अब उसी भरोसे की वजह से आंखों में आंसू हैं. ‘कर बैठी साजना भरोसा तेरे प्यार ते, रोण बैठी दिल वे मैं तेरे ऐतेबार ते’ इन पंक्तियों में मोहब्बत की सबसे बड़ी कमजोरी दिखाई देती है. जब भरोसा टूटता है तो सिर्फ रिश्ता नहीं टूटता, इंसान का अपने फैसले पर भरोसा भी हिल जाता है.
प्यार में जुदाई क्यों?
जब प्यार सच्चा होता है तो उसे भूल पाना मुश्किल होता है. रोज के दर्ज को कव्वाली में बयां किया है, जिसमें जुदाई को रोज-रोज सहने से इनकार भी है. ‘असां नित दा विचोरा नइओ सहना’ यानी हर दिन का यह बिछड़ना अब सहा नहीं जाता. यह कोई एक दिन की नाराजगी नहीं हैं. यह उस लंबे इंतजार का दर्द है, जिसमें हर दिन सामने वाले की कमी महसूस होती है. इसलिए फिर आशिक अपने प्यार से कहता हैं ‘बीबा’ यानी ‘प्यार’ कम से कम मेरा दिल मुझे वापस कर दो.
इश्क में जब दिल नहीं सुनता कोई बात
इसके बाद कव्वाली में एक और बेहद खूबसूरत भाव आता है ‘आयवी निक्का जिया मनाना नै कहना’ यानी यह छोटा सा दिल मेरी बात बिल्कुल नहीं मानता है. उस आशिक को अभी भी ये आस हैं कि छोटी-सी कोशिश में बड़ी उम्मीद छिपी है. एक बार शायद वो ‘बीबा’ सुन ले तो दोनों के बीच का पहले जैसी बात हो जाए. वो अपनी बात को बढ़ता है और कहता है ‘तेनु छैयेदे ने दिल वाले फिद खोलने, आसां तेरे नाल कई दुख सुख फोलने’ यानी अब हमारे बीच कोई पर्दा या झिझक नहीं होनी चाहिए. तुम अपने सारे डर और राज मुझसे बयां करो. क्योंकि मैं भी तुम्हारे साथ बैठकर अपने दिल में छिपे हर सुख-दुख को तुम्हारे सामने उड़ेलना चाहता हूं.
शिकायत भी और मोहब्बत भी
‘साडे कोल नै तुं खरी पल भेना’ ये लाइन शिकायत और मोहब्बत से भरी हुई है. इसमें प्रेमी अपने बीबा यानी प्यार से शिकायत करता है कि दर्द यहीं है कि जिसके साथ इतनी बातें करनी थीं, वही पास बैठने को तैयार नहीं. फिर कव्वाली अपने सबसे त्याग वाले भाव तक पहुंचती है. ‘तेरी मर्जी ए साडे नाल वख होंदे’ अगर तुम्हारी मर्जी हमसे अलग होने की है, तो हम उसे भी स्वीकार कर लेंगे. लेकिन इसके तुरंत बाद प्रेमी अपनी कमजोरी भी मान लेता है कि उसकी दुनिया उस इंसान के पीछे ही बसी है. यानी अलग होना संभव है, मगर दिल से उस इंसान को निकाल देना संभव नहीं.
फरियाद लौटती ‘ते बीबा साडा दिल मोड़ दे’
यही वजह है कि बार-बार वही फरियाद लौटती है ‘ते बीबा साडा दिल मोड़ दे’. यहां ‘बीबा’ प्यार और अपनापन जताने वाला संबोधन है. इस शब्द में भी शिकायत के साथ मोहब्बत बची हुई है. सामने वाला दूर हो रहा है, रिश्ता टूट रहा है, भरोसा घायल है, फिर भी उसे पुकारने का तरीका कठोर नहीं होता. नुसरत फतेह अली खान की आवाज इस पूरे एहसास को और गहरा कर देती है. उनकी गायकी में दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है और बार-बार दोहराया गया मुखड़ा ऐसा लगता है जैसे कोई टूटता हुआ इंसान अपनी आखिरी उम्मीद के सहारे सामने वाले से गुहार लगा रहा हो.
जुदाई के बाद भी नफरत नहीं
‘बीबा साडा दिल मोड़ दे’ की खूबसूरती यही है कि इसमें जुदाई के बाद भी नफरत नहीं है. प्रेमी सामने वाले को रोक नहीं रहा, उसे दोष नहीं दे रहा. वह बस कह रहा है अगर मेरी जिंदगी में रहना नहीं है, तो ठीक है… लेकिन जो दिल तुम्हें प्यार करते-करते तुम्हारा हो गया था, उसे तो वापस कर दो.
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