-सिख न्याय एवं अधिकार मंच ने पुराने प्राथमिकी, पुलिस रिकॉर्ड और न्यायालयीन अभिलेखों की समीक्षा की मांग की
-अधूरे मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष पुन: जांच कराने की अपील
-जरूरत पडऩे पर केंद्रीय जांच एजेंसी या स्वतंत्र विशेष जांच दल से जांच कराने की मांग
उदय भूमि संवाददाता
गाजियाबाद। वर्ष 1984 में देशभर में हुई सिख विरोधी हिंसा की घटनाओं का दर्द आज भी प्रभावित परिवारों के बीच मौजूद है। गाजियाबाद में उस दौर में सिख समाज के लोगों के साथ हुई हिंसक घटनाओं की निष्पक्ष समीक्षा और लंबित मामलों में न्याय की मांग को लेकर 1984 सिख न्याय एवं अधिकार मंच द्वारा शुक्रवार को प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। मंच के पदाधिकारियों ने कहा कि चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जिन परिवारों को न्याय नहीं मिल सका है, उनके मामलों को एक बार फिर गंभीरता से देखा जाना चाहिए। मंच ने गाजियाबाद में वर्ष 1984 से संबंधित पुराने पुलिस रिकॉर्ड, प्राथमिकी, केस डायरी, अंतिम रिपोर्ट और न्यायालयीन अभिलेखों की समीक्षा कराने की मांग की। मंच की ओर से कहा गया कि गाजियाबाद के राजनगर क्षेत्र सहित विभिन्न स्थानों पर उस समय सिख परिवारों के साथ गंभीर हिंसक घटनाएं होने की बात सामने आई थी। इन घटनाओं में हत्या, आगजनी, लूटपाट और जान-माल के नुकसान जैसे आरोप शामिल रहे हैं।
पदाधिकारियों ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी निर्दोष व्यक्ति को परेशान करना या किसी राजनीतिक दल को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करना है कि जिन मामलों में पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध हों, उनमें कानून के अनुसार कार्रवाई हो। मंच ने मांग रखी कि वर्ष 1984 से संबंधित सभी पुराने मामलों की विस्तृत समीक्षा कराई जाए। जिन मामलों में जांच अधूरी रही या पर्याप्त जांच नहीं हो सकी, उनमें उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष पुन: जांच कराए जाने की जरूरत बताई गई। मंच ने यह भी मांग की कि आवश्यकता के अनुसार इन मामलों की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी या स्वतंत्र विशेष जांच दल से कराने के लिए उचित स्तर पर कार्रवाई की जाए।
प्रधान इंदरजीत सिंह टीटू ने कहा कि उस समय के पीडि़त परिवारों, प्रत्यक्षदर्शियों और उपलब्ध गवाहों के बयान भी महत्वपूर्ण हैं। पुराने दस्तावेजों, हलफनामों और अन्य अभिलेखों को रिकॉर्ड पर लेकर उनकी निष्पक्ष समीक्षा की जानी चाहिए। मंच का कहना है कि जांच के दौरान यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध पर्याप्त एवं विश्वसनीय साक्ष्य सामने आते हैं तो उसके खिलाफ बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के कानून के अनुरूप कार्रवाई होनी चाहिए।
पीडि़त परिवारों को राहत देने की भी मांग
मंच ने उन परिवारों के मामलों की भी समीक्षा की मांग की, जिन्हें अब तक शासन द्वारा अनुमन्य राहत या उचित सहायता नहीं मिल सकी है। पदाधिकारियों ने कहा कि लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवारों की स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन को उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजनी चाहिए। मंच ने मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन से इस पूरे विषय को संवेदनशीलता के साथ लेते हुए आवश्यक कार्रवाई की अपील की। प्रेस वार्ता में पदाधिकारियों ने कहा कि कानून का शासन तभी मजबूत होता है, जब गंभीर अपराधों की निष्पक्ष जांच हो और साक्ष्यों के आधार पर दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।
उन्होंने कहा कि चार दशक से अधिक समय बीत जाना पीड़ित परिवारों के न्याय के अधिकार को समाप्त नहीं करता। हाल ही में 1984 के मामलों में दोषसिद्ध होकर आजीवन कारावास की सजा काट रहे पूर्व सांसद सज्जन कुमार के 20 अगस्त 2026 को निधन का उल्लेख करते हुए मंच ने कहा कि इस घटनाक्रम ने एक बार फिर 1984 के पीड़ित परिवारों के न्याय के प्रश्न को सार्वजनिक विमर्श में ला दिया है।
प्रेस वार्ता में मंच के चेयरमैन सरदार हरमीत सिंह, महामंत्री एसपी सिंह ओबेराय, सचिव कुलविंदर सिंह ओबेराय, जस्मित सिंह, जगमोहन कपूर, हरपाल सिंह भुई, गुरमीत सिंह खोसला, जसबीर सिंह बत्रा, जगदीप सिंह खोसला, जोगिंदर सिंह तथा भारत नगर बोर्ड के प्रधान बग्गु जी सहित अन्य पदाधिकारी और सदस्य मौजूद रहे। मंच ने उम्मीद जताई कि जिला प्रशासन और शासन इस संवेदनशील विषय पर उपलब्ध अभिलेखों की समीक्षा कर न्यायहित में उचित कदम उठाएगा।
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