India First: भारतीय सिनेमा की पहली चाइल्ड आर्टिस्ट मंदाकिनी अठावले थीं, जो दादा साहेब फाल्के की बेटी थीं. साल 1918 में बनी फिल्म श्री कृष्ण जन्म में उन्होंने भगवान कृष्ण का मुख्य किरदार निभाया था. इसके बाद उन्होंने कालिया मर्दन में भी काम किया.
साल 1918 में दादा साहेब फाल्के ने ‘श्री कृष्ण जन्म’ नाम की एक मूक (साइलेंट) फिल्म बनाई थी. इस फिल्म में उन्होंने अपनी बेटी मंदाकिनी को भगवान श्री कृष्ण के बचपन का मुख्य किरदार निभाने के लिए चुना. उस समय मंदाकिनी की उम्र महज 6-7 साल के आसपास थी. जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो पर्दे पर एक छोटी सी बच्ची को कृष्ण के रूप में देखकर दर्शक भावुक हो गए. कई लोग तो स्क्रीन के सामने हाथ जोड़कर बैठ जाते थे. इस फिल्म की अपार सफलता के बाद साल 1919 में दादा साहेब फाल्के ने ‘कालिया मर्दन’ फिल्म बनाई, जिसमें मंदाकिनी ने फिर से बाल कृष्ण की भूमिका निभाई. इस फिल्म में उनके चेहरे के एक्सप्रेशंस और कालिया नाग का घमंड तोड़ने वाले दृश्यों ने लोगों का दिल जीत लिया.
मंदाकिनी ने अपने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था कि जब वे छोटी थीं, तो उनके पिता दादा साहेब फाल्के उन्हें खुद एक्टिंग सिखाया करते थे. वे शीशे के सामने खड़े होकर मंदाकिनी को गुस्सा, प्यार, डर और खुशी के भाव दिखाना सिखाते थे. शूटिंग के दौरान दादा साहेब खुद कैमरे के पीछे खड़े होकर जैसा करते, मंदाकिनी कैमरे के सामने ठीक वैसा ही दोहराती थीं. जब दादा साहेब कहते ‘स्टार्ट’, तो वे एक्टिंग शुरू कर देती थीं और ‘स्टॉप’ कहते ही रुक जाती थीं. हालांकि, घर में दादा साहेब का अनुशासन बहुत सख्त था. वे बच्चों को बिना वजह शीशा देखने या सेट पर ज्यादा घूमने-फिरने की इजाजत नहीं देते थे. अगर कोई बच्चा गलती करता था, तो उसे पानी से भरा बर्तन पीठ पर रखकर झुकने की सजा दी जाती थी ताकि पानी की एक बूंद भी न गिरे.
उस जमाने में फिल्मों की शूटिंग आज जैसी आसान नहीं होती थी. न तो आधुनिक कैमरे थे और न ही मेकअप के नए सामान. मंदाकिनी का मेक-अप केवल उनके मामा ही किया करते थे. ‘कालिया मर्दन’ फिल्म में पहली बार कुछ अनोखे कैमरे इफेक्ट्स का इस्तेमाल किया गया था, जहाँ मंदाकिनी के मुस्कुराते चेहरे से धीरे-धीरे भगवान कृष्ण का रूप बनता दिखाई देता था. उस दौर के पोस्टरों और अखबारों में मंदाकिनी को एक ‘जादुई बच्ची’ के रूप में दिखाया गया था जो पर्दे पर साक्षात कृष्ण का रूप धर लेती थी. फाल्के साहब की ‘लंका दहन’ (1917) में भी उन्होंने छोटे-मोटे दृश्य किए थे, लेकिन ‘श्री कृष्ण जन्म’ और ‘कालिया मर्दन’ ने उन्हें पूरे देश में मशहूर कर दिया था.
फिल्मों में इतनी सफलता और लोकप्रियता मिलने के बावजूद मंदाकिनी का फिल्मी सफर ज्यादा लंबा नहीं चला. जब वे लगभग 14 साल की हुईं, तो उनकी शादी डॉक्टर अठावले से कर दी गई. शादी के बाद वे नासिक में रहने लगीं और धीरे-धीरे फिल्मों की दुनिया और स्टूडियो के माहौल से पूरी तरह दूर हो गईं. फिल्मों की चकाचौंध वाली जिंदगी छोड़कर वे एक साधारण गृहणी बन गईं. उन्होंने रसोई संभालने से लेकर अपने परिवार की जिम्मेदारी पूरी निष्ठा के साथ निभाई. बाद में वे जब भी अपने बचपन के दिनों को याद करती थीं, तो वे बताती थीं कि कैसे एक पेड़ की टहनी से कूदने वाली साधारण लड़की को उनके पिता ने पर्दे का ‘भगवान कृष्ण’ बना दिया था.
साल 1987 में नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया (NFAI) ने 75 वर्ष की उम्र में मंदाकिनी अठावले का एक लंबा इंटरव्यू रिकॉर्ड किया था, जिसमें उन्होंने दादा साहेब फाल्के के जीवन और भारतीय सिनेमा की शुरुआती यात्रा के कई अनसुने पन्ने खोले थे. भले ही आज मंदाकिनी हमारे बीच नहीं हैं और उस दौर की पुरानी फिल्मों की रीलों को सहेजना मुश्किल रहा है, लेकिन भारतीय सिनेमा के पन्नों में उनका नाम हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है. भारत की पहली बाल कलाकार के रूप में मंदाकिनी ने जो शुरुआत की थी, उसी ने आगे चलकर सिनेमा में बच्चों के किरदारों की एक नई और मजबूत पहचान बनाई.
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निरंजन दुबे हिंदी डिजिटल पत्रकारिता का एक जाना-पहचाना नाम हैं. प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव. वर्तमान में News18 हिंदी में Sr. Associate Editor के पद पर कार्यरत हैं और मध्य प्रदेश…
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