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दिल्ली हाईकोर्ट ने डीएसएसएसबी भर्ती में बायोमेट्रिक, फोटोग्राफ और फिंगरप्रिंट में गड़बड़ी मिलने पर प्रोबेशनरी कर्मचारियों की सेवा समाप्त करने के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि यदि यह संदेह हो कि परीक्षा देने वाला उम्मीदवार और नियुक्ति पाने वाला व्यक्ति अलग है, तो नियुक्ति की वैधता जांचना विभाग का अधिकार है। ऐसी स्थिति में सेवा समाप्ति को कदाचार की सजा नहीं, बल्कि नियुक्ति रद्द करना माना जाएगा।

न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति शैल जैन की खंडपीठ ने कैट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें कर्मचारियों की सेवा समाप्ति निरस्त की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पहचान के सत्यापन के लिए की गई कार्रवाई दंडात्मक नहीं है। इसलिए नियमित विभागीय जांच अनिवार्य नहीं होगी।

मामला दिल्ली सरकार के विभिन्न विभागों, खासकर जेल विभाग में असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट, वार्डर और मैट्रन समेत डीएएसएस, स्टेनोग्राफर और जूनियर असिस्टेंट पदों पर हुई नियुक्तियों से जुड़ा था। ये नियुक्तियां 2020-21 के आसपास डीएसएसएसबी की विभिन्न विज्ञापनों के माध्यम से हुई थीं। भर्ती परीक्षा के बाद कुछ कर्मचारियों की पहचान पर सवाल उठे। विभागों ने उनके बायोमेट्रिक और फोटो का डीएसएसएसबी के रिकॉर्ड से मिलान कराया। कई मामलों में तीन से पांच बार सत्यापन के बावजूद मिसमैच मिला। कर्मचारियों को नोटिस देकर जवाब का अवसर भी दिया गया, लेकिन विसंगतियां बनी रहीं।

अदालत ने कहा कि नियुक्ति उसी व्यक्ति की होती है, जिसने भर्ती परीक्षा दी हो। यदि बाद में पता चले कि सेवा में आया व्यक्ति परीक्षा देने वाला उम्मीदवार नहीं था, तो नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे मामलों में नियुक्ति रद्द की जा सकती है।

कर्मचारियों को राहत भी

हाईकोर्ट ने साफ किया कि वह कर्मचारियों को छद्म व्यक्ति या कदाचार का दोषी घोषित नहीं कर रही। सेवा समाप्ति को नियुक्ति रद्द किए जाने के रूप में माना जाएगा। इसलिए इसका असर उनकी भविष्य की सरकारी नौकरी की पात्रता पर नहीं पड़ेगा। वे नियमों के अनुसार आगे की भर्तियों में शामिल हो सकेंगे।

ऐसे हुई पहचान की जांच

डीएसएसएसबी रिकॉर्ड से बायोमेट्रिक, फोटो और फिंगरप्रिंट का कई बार मिलान किया गया। एक मामले में फिंगरप्रिंट मैच शून्य और इमेज मैच 36 प्रतिशत रहा। कुछ मामलों में परीक्षा में किसी और के बैठने की शिकायत भी रिकॉर्ड पर थी। जवाब का मौका देने के बाद विभाग ने सेवा समाप्त की। कैट ने 30 अप्रैल 2024 के एक सामान्य फैसले और बाद के कुछ अन्य आदेशों में इन समाप्ति आदेशों को रद्द कर दिया था। ट्रिब्यूनल का कहना था कि यह कार्रवाई दंडात्मक और कलंकित करने वाली है, इसलिए विभागीय जांच जरूरी थी। जेल महानिदेशक और दिल्ली सरकार ने इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

 

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