Ram Mandir Dress Code: श्री राम जन्मभूमि मंदिर के पुजारियों ने 15 अगस्त से एक नए ड्रेस कोड का पालन करना शुरू कर दिया है. नए ड्रेस कोड के तहत अब सभी पुजारी एक जैसी पारंपरिक पोशाक पहनेंगे. मंदिर ट्रस्ट की धार्मिक समिति के सदस्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने बताया कि यह ड्रेस कोड रामानंदी परंपरा के अनुसार तय किए गए हैं. रामानंदाचार्य परंपरा क्या है? इसका पालन किस तरह से होगा? इसके बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं.
राम मंदिर के लिए ड्रेस कोड लागू हो चुका है. (फोटो साभारः इंस्टाग्राम @shriramteerthkshetra)
मिथिलेश नंदिनी शरण ने बताया कि पुजारी हल्के पीले रंग की रेशमी धोती और उसी रंग का रेशमी उत्तरीय (ऊपरी वस्त्र) पहनेंगे. उन्होंने कहा कि हल्का पीला रंग भगवान राम को प्रिय माना जाता है, इसलिए ड्रेस कोड के लिए इसे चुना गया. पुजारियों को या तो ‘पंचकेश’ परंपरा का पालन करना होगा या पूरी तरह से बाल मुंडवाने होंगे. आधे-अधूरे बाल या दाढ़ी रखने की अनुमति नहीं होगी. पारंपरिक रामानंदी तिलक लगाना भी अनिवार्य कर दिया गया है. धार्मिक समिति के सदस्य महंत राजकुमार दास ने कहा कि रेशमी कपड़ों को उनकी पवित्रता और शुद्धता को ध्यान में रखते हुए चुना गया.
रामानंदाचार्य परंपरा में साधु-संतों और पुजारियों का पहनावा प्राचीन वैष्णव मान्यताओं के अनुसार पारंपरिक और सादा होता है, जिसमें मुख्य रूप से बिना सिले पीले या भगवा रंग के वस्त्र शामिल होते हैं. रामानंदी संप्रदाय वैष्णव धर्म की सबसे बड़ी और प्रमुख शाखाओं में से एक है. इस परंपरा में साधुओं के नियम, तिलक और वेशभूषा बेहद खास और कड़े होते हैं.
- रंग: इस परंपरा में धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा के दौरान पीले रंग के वस्त्रों को विशेष महत्व दिया जाता है.
- बिना सिला वस्त्र: अर्चक या पुजारी बिना सिले हुए पारंपरिक वस्त्र और कंधे पर पीला उत्तरीय धारण करते हैं.
- मौसम के अनुसार बदलाव: सर्दियों के मौसम में इसी परंपरा के तहत पीले रंग के विशेष ऊनी वस्त्र पहने जाते हैं.
रामानंदी परंपरा से जुड़ी खास बातें:
रामानंदी तिलक (श्री तिलक)
इस्कॉन टेंपल के मुताबिक, रामानंदी संप्रदाय का तिलक उनकी पहचान का सबसे मुख्य हिस्सा है, जिसे ‘श्री तिलक’ कहा जाता है:
- लाल श्री: माथे पर दो सफेद खड़ी रेखाओं (चंदन) के बीच में एक लाल रंग की खड़ी रेखा लगाई जाती है. यह लाल रेखा साक्षात् माता सीता (श्री जी) का प्रतीक है.
- सफेद चंदन: दोनों तरफ की सफेद रेखाएं भगवान श्री राम और लक्ष्मण जी का प्रतीक हैं.
- सिंदूर का महत्व: इस संप्रदाय के साधु माथे पर सिंदूर का तिलक भी लगाते हैं, क्योंकि हनुमान जी माता सीता के सिंदूर को अत्यंत पवित्र मानते थे.
वेशभूषा और भेद
इस परंपरा में साधुओं को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है, और दोनों की वेशभूषा अलग होती है:
- स्थानधारी साधु: ये साधु आश्रमों या मंदिरों में रहते हैं. ये मुख्य रूप से पीले या श्वेत (सफेद) रंग के बिना सिले वस्त्र और कंधों पर पीला उत्तरीय धारण करते हैं.
- नागा या अखाड़ा साधु: रामानंदी संप्रदाय के तीन प्रमुख अखाड़े- दिगंबर, निर्वाणी और निर्मोही हैं. इन अखाड़ों के नागा साधु वस्त्र नहीं पहनते या केवल भगवा रंग की लंगोट धारण करते हैं.
प्रमुख नियम और जीवनशैली
रामानंदी संप्रदाय के संतों का जीवन बहुत अनुशासित होता है:
- मंत्र दीक्षा: इस संप्रदाय में प्रवेश करते समय गुरु द्वारा ‘रामाय नमः’ या ‘श्री रामचंद्राय नमः’ मंत्र की दीक्षा दी जाती है.
- पूर्ण शाकाहार: खान-पान में सात्विकता का कड़ाई से पालन किया जाता है. लहसुन, प्याज और मांस-मदिरा पूरी तरह वर्जित हैं.
- भक्ति मार्ग: इस संप्रदाय के साधु भगवान राम और माता सीता को अपना आराध्य मानते हैं. वे दास्य भाव (सेवक के रूप में) या सख्य भाव (मित्र के रूप में) से साधना करते हैं.
- तुलसी माला: इस परंपरा के सभी अनुयायी अपने गले में तुलसी की कंठी माला अनिवार्य रूप से धारण करते हैं.
बता दें, रामलला के दर्शन करने वाले भक्तों के लिए कोई ड्रेस कोड लागू नहीं हुआ है. वह अपनी पसंद के ट्रेडिशनल और मॉडर्न ड्रेस में जा सकते हैं.
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रमेश कुमार, सितंबर 2021 से बतौर सीनियर सब एडिटर न्यूज18 हिंदी डिजिटल से जुड़े हैं. एक्सप्लेनर/नॉलेज डेस्क पर काम कर रहे हैं. समय-समय पर विधानसभा-लोकसभा चुनाव पर …
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