बरेली का स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास गौरवशाली रहा है. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में क्रांतिकारियों ने कलेक्ट्रेट रिकॉर्ड रूम में आग लगा दी थी. वहीं 1857 की पहली क्रांति के दौरान भी यहां अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जबरदस्त संघर्ष हुआ था. मेथोडिस्ट चर्च और नकटिया पुल से जुड़े संघर्षों की यादें आज भी बरेली के इतिहास में दर्ज हैं. नकटिया पुल की लड़ाई में अंग्रेजी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. और इस संघर्ष से जुड़े अंग्रेज सैनिकों की कब्रें आज भी मौजूद हैं.
1857 की पहली क्रांति के दौरान भी यहां अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जबरदस्त संघर्ष हुआ था. मेथोडिस्ट चर्च और नकटिया पुल से जुड़े संघर्षों की यादें आज भी बरेली के इतिहास में दर्ज हैं. नकटिया पुल की लड़ाई में अंग्रेजी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. और इस संघर्ष से जुड़े अंग्रेज सैनिकों की कब्रें आज भी मौजूद हैं.
अगस्त क्रांति अंग्रेजों के लिए खुली चुनौती
वरिष्ठ इतिहासकार डॉक्टर राजेश कुमार शर्मा बताते हैं.कि बरेली के इतिहास में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन भी एक ऐसा अध्याय है. जिसने अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी. 9 और 10 अगस्त 1942, महात्मा गांधी के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के आह्वान के बाद देशभर में आंदोलन तेज हो गया. बरेली में भी क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. कई प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन आंदोलन की आग बुझने के बजाय और तेज होती चली गई.
डॉ. शर्मा के अनुसार इसी दौरान बरेली कलेक्ट्रेट का रिकॉर्ड रूम आंदोलनकारियों के निशाने पर आया. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, क्रांतिकारियों ने कलेक्ट्रेट के रिकॉर्ड रूम में आग लगा दी और सरकारी दस्तावेजों को नष्ट कर दिया. इस घटना ने अंग्रेजी प्रशासन में खलबली मचा दी.
क्रांतिकारियों ने निभाई अपनी भूमिका
ताराचंद रुस्तोगी, मोहन सिंह नंदा और पंडित विश्व नारायण समेत कई आंदोलनकारियों ने इस दौर में सक्रिय भूमिका निभाई. अंग्रेजी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसाईं और गिरफ्तारियां कीं, लेकिन आंदोलनकारियों के हौसले नहीं टूटे.लाठियां खाने के बावजूद क्रांतिकारियों के बीच ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारों की गूंज सुनाई देती रही. बरेली का यह इतिहास बताता है. कि आजादी सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि लाखों देशवासियों के साहस, संघर्ष और बलिदान का परिणाम थी.1942 की अगस्त क्रांति में बरेली के इन सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देकर स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा दिया.
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Rajnish Kumar Yadav is a digital journalist and content publisher with over seven years of experience in print and digital media. He is currently working with News18 Digital (Local18) as a Content Publisher, wh…
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