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जापान की संसद ने जुलाई 2026 में टोक्यो के अलावा एक दूसरी (बैकअप) राजधानी बनाने का कानून पारित किया है, जिसमें किसी एक शहर का नाम तय नहीं है बल्कि ओसाका, फुकुओका और आइची (नागोया) जैसे शहर रेस में हैं. टोक्यो में संभावित बड़े भूकंप के खतरे से देश की शासन व्यवस्था को बचाने के लिए बैकअप तैयार करना है. बेहतरीन सुविधाएं और मजबूत बुनियादी ढांचे के कारण ओसाका सबसे आगे है. फुकुओका, सपोरो (होक्काइडो) और आइची (नागोया) जैसे शहर भी जापान की राजधानी बनने के लिए दावेदारी पेश कर रहे हैं. हालांकि, जापान के नए कानून फ्रेमवर्क तय करता है और अंतिम फैसला जापान के प्रधानमंत्री करेंगे.

भारत में भी समय-समय पर दूसरी राजधानी की मांग उठती रही है. इसकी मुख्य कारण क्षेत्रीय एकीकरण, प्रशासनिक सुविधा और राष्ट्रीय सुरक्षा है. जापान की राजधानी बदलने का मुख्य कारण टोक्यो में विनाशकारी भूकंप का बार-बार आना है. इसलिए जापान एक वैकल्पिक राजधानी की तलाश रहा है. वहीं भारत में राजधानी बदलने की बहस उत्तर-दक्षिण के अंतर को पाटने और अपने प्रशासनिक केंद्र को सुरक्षित रखने पर केंद्रित है.

भारतीय संदर्भ: दूसरी राजधानी के पक्ष में तर्क

भारत के लिए एक वैकल्पिक राजधानी की बहस भूगोल, जलवायु और सुरक्षा पर आधारित है. भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने भारत की दूसरी राजधानी के रूप में हैदराबाद की पुरजोर वकालत की थी. 1955 में अपनी किताब ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स’ (भाषाई राज्यों पर विचार) में उन्होंने नई दिल्ली से जुड़ी कई अहम समस्याओं का ज़िक्र किया था:

लंबी दूरी के कारण दक्षिण भारत में रहने वाले नागरिकों के लिए दिल्ली आना-जाना बहुत असुविधाजनक है. दिल्ली की भीषण गर्मी और कड़ाके की ठंड इसे प्रशासनिक कामकाज के लिए एक कठिन जगह बनाती है. अंबेडकर ने कहा कि दिल्ली एक असुरक्षित जगह है, क्योंकि यह पड़ोसी देशों से बमबारी की आसान पहुंच के दायरे में है. उन्होंने तर्क दिया कि हैदराबाद एक केंद्रीय और सुरक्षित जगह है, जहां मिली-जुली संस्कृति है और यह देश के लिए स्थायी संतुलन का काम कर सकता है.

2018 में बेंगलुरु को राजधानी बनाने के लिए कर्नाटक की मांग

साल 2018 में, कर्नाटक के तत्कालीन आवास मंत्री एम. कृष्णप्पा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक औपचारिक पत्र लिखकर बेंगलुरु को भारत की दूसरी राजधानी घोषित करने का अनुरोध किया था. इस कदम को दक्षिण भारत के बेहतर एकीकरण की दिशा में एक प्रयास के तौर पर पेश किया गया था. समर्थकों का तर्क था कि बेंगलुरु का ग्लोबल टेक हब होना, साल भर सुहावना मौसम और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था इसे दक्षिण भारत का एक आदर्श प्रशासनिक केंद्र बनाती है.

एक से ज़्यादा राजधानी वाले देश

कई देश क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं में संतुलन बनाने, सरकार के अलग-अलग अंगों को अलग-अलग जगह रखने या ऐतिहासिक मतभेदों को संभालने के लिए सत्ता को कई शहरों में बांटते हैं. जहां एम्स्टर्डम नीदरलैंड की आधिकारिक संवैधानिक राजधानी है, वहीं संसद, कार्यकारी सरकार और सुप्रीम कोर्ट सभी ‘द हेग’ में स्थित हैं.

इन देश की राजधानी अलग-अलग हैं.

क्या भारत को सचमुच दूसरी राजधानी की ज़रूरत है?

हालांकि, नई दिल्ली में पहले से किए गए भारी खर्च और बुनियादी ढांचे के निवेश (जिसमें सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट भी शामिल है) के कारण पूरी राजधानी को कहीं और ले जाने की संभावना बहुत कम है, लेकिन इसके पीछे के मुद्दे अभी भी बने हुए हैं. राजधानी बदलने के बजाय, आधुनिक विशेषज्ञ अक्सर ये सुझाव देते हैं:

दक्षिण में संसद सत्र आयोजित करना: दक्षिण के किसी शहर में नियमित रूप से शीतकालीन या मॉनसून सत्र आयोजित किया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे महाराष्ट्र नागपुर में अपनी विधानसभा का शीतकालीन सत्र आयोजित करता है.

सुप्रीम कोर्ट की बेंचों का विकेंद्रीकरण: चेन्नई, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में सुप्रीम कोर्ट की स्थायी क्षेत्रीय बेंचें स्थापित करना, ताकि सभी भारतीयों के लिए न्याय शारीरिक और आर्थिक रूप से सुलभ हो सके.

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