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Chitrakoot Ke Sant Darshan : कहा जाता है कि दिव्य संत-महत्माओं का दर्शन हो जाए तो दिन बन जाता हैं. संत वहीं हैं जिन्हें माया-मोह ना हो. जो मोह को त्यागकर भगवान की भक्ति में लीन हों. सांसारिक मायामोह से मुक्त होकर जंगल में तप कर रहे हों. भारत की भूमि ऋषि-मुनियों की है. घने जंगलों-पहाड़ों के बीच गुफाओं में आज भी कई साधु-संत तपस्या करते हैं. ऐसे ही एक संत यूपी के चित्रकूट में घने जंगल में बनी एक गुफा में रहते हैं. दिन में सिर्फ एक बार गुफा से निकलते हैं. बिना बर्तन के प्रसादी बनाते हैं.

चित्रकूट को पावन धरा माना जाता है. कहा जाता है कि भगवान राम ने चित्रकूट में ही तुलसीदास को दर्शन दिए थे. चित्रकूट में मंदाकिनी नदी बहती है जिसे पयस्विनी नदी के नाम से भी जाना जाता है. इसी के तट पर स्थित रामघाट पर श्रद्धालु आस्था के साथ स्नान करते हैं. चित्रकूट के ही घने जंगलों में पहाड़ पर बनी गुफाओं में कई संत-महात्मा तपस्या करते हैं. इन घनों जंगलों में जंगली जानवरों के बीच साधु-महात्मा रहते हैं. चित्रकूट में स्थित नरसिंह धारा में एक ऐसे तपस्वी साधु महाराज रहते हैं जो अपनी गुफा से दिन में सिर्फ एक बार बाहर निकलते हैं. सबसे हैरानी की बात यह है कि इनके पास भोजन बनाने के लिए कोई बर्तन नहीं है. ये पत्थर पर ही आटा गूंथकर अपना प्रसादी तैयार कर लेते हैं.

चित्रकूट में नरसिंह धारा में पानी की एक धारा पहाड़ों से निकलती है. घने जंगलों के बीच स्थित इस स्थान पर भगवान नरसिंह की एक प्राचीन प्रतिमा है. पहाड़ी में एक गुफ है जहां पर एक साधु महाराज तपस्या करते हैं. जंगल के बीच बनी गुफा में भगवान की भक्ति में लीन इन साधु संतों को संसार का कोई मोह नहीं है.

गुफा में रहने वाले साधु महाराज स्नान के बाद भगवान का ध्यान करते हैं. पूजा-पाठ करते हैं. भगवान को जल अर्पण करने और पूजा पाठा के भगवान की प्रसादी बनाना शुरू करते हैं. सबसे हैरानी की बात यह है कि इनके पास भोजन बनाने के लिए कोई बर्तन नहीं है.

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साधु महाराज दिन में सिर्फ एक बार गुफा से बाहर निकलते हैं. गुफा के पास बहती निर्मल धारा से पानी लेते हैं. झरने के किनारे स्थित एक बड़े से पत्थर को ही इन्होंने आधार बना लिया है. उसी पत्थर पर आटा गूंथते हैं.

आज के समय में जहां हम छोटी से छोटी सुविधा के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, वहीं ये साधु महाराज बिना बर्तन के भोजन पकाते हैं. यह देखना अपने आप में अद्भुत है. इन संतों का जीवन त्याग-संतोष और तपस्या से भरा हुआ है. 

साधु महाराज को इस घने जंगल में कई श्रद्धालु भोजन सामाग्री दे जाते हैं. साधु महाराज बताते हैं कि कई बार भोजन की व्यवस्था ना होने पर वो जंगल में मिलने वाले फल-कंदमूल के सहारे दिन बिताते हैं. एक छोटी से गुफा में रहते हैं. रात में कई बार जंगली जानवर शेर-भालू आते हैं लेकिन कभी नुकसान नहीं पहुंचाया. जानवरों का झुंड गुजरता है.

साधु महाराज अंगूठी लगाते हैं. घास-फूस के सहारे लकड़ी जलाते हैं और उसी पर रामरोट पकाते हैं. रामरोट 1 किलोग्राम वजन का होता है. गुफा वाले साधु महाराज बताते हैं कि चाहे एक किलो आटा हो या पांच किलो, वो सिर्फ एक रामरोट बनाते हैं. उसी में से सबको भोजन-प्रसादी वितरित करते हैं.

साधु महाराज पेड़ के पत्तों पर भगवान को प्रसादी अर्पित करते हैं. फिर खुद पत्तल पर भोजन प्रसादी ग्रहण करते हैं. कुटिया में आए श्रद्धालुओं को भोजन देते हैं. वैसे तो नियमित रूप से 1 घंटे सुबह-शाम साधना करते हैं. कई बार रात-रातभर भगवान का नाम लेते रहते हैं.

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