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होमफोटोमनीLatest Moneyकागज की करेंसी से कितना अलग होगा प्लास्टिक का नोट, जानें इसकी खासियत

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Plastic Currency : रिजर्व बैंक ने जब से प्लास्टिक करेंसी उतारने की बात कही है, हर किसी के मन में नई करेंसी देखने का कौतुहल मचा हुआ है. आखिर कागज के नोट से प्लास्टिक की करेंसी कितनी अलग होगी और इसे उतारने के बारे में रिवर्ज बैंक क्यों सोच रहा है. अभी दुनिया के 60 देशों में प्लास्टिक की करेंसी चलाई जा रही है. आरबीआई इस करेंसी को सबसे पहले छोटे नोट में उतारने की तैयारी कर रहा है.

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, रिजर्व बैंक अब अपने दशकों पुराने प्लान पर काम करने जा रहा है. उसकी मंशा पॉलिमर बैंकनोट उतारने की है, जो जल्दी खराब नहीं होते. प्लास्टिक नोट उतारने का पायलट प्रोजेक्ट 10 और 20 रुपये के छोटे नोट से शुरू करने की तैयारी है. इसका ट्रायल भी पूरा हो चुका है और जो परिणाम सामने आए हैं, उससे पता चलता है कि आरबीआई साल 2027 में इस प्लान को पूरी तरह लागू कर देगा.

आरबीआई प्लास्टिक करेंसी को लेकर कितना संजीदा है, इसका अंदाजा उसकी बोर्ड बैठक की बातचीत से लगाया जा सकता है. आरबीआई के बोर्ड की पिछली दो बैठकें मुंबई और पटना में हुई हैं, जिसमें पॉलिमर नोट को लेकर काफी मंथन किया गया. बैठक का मुद्दा नोट छपाई पर लगने वाले खर्च को लेकर भी रहा. हालांकि, प्लास्टिक नोट आने के बावजूद सिस्टम में चल रहे मौजूदा कागज के नोटों को चलन से बाहर नहीं किया जाएगा.

प्लास्टिक के नोट को पतले और लचीले मैटरियल से बनाया जाएगा, जबकि मौजूदा करेंसी कॉटन मिले हुए कागज पर बनाई जा रही है. भले ही ये नोट प्लास्टिक के होंगे, लेकिन यह क्रेडिट अथवा डेबिट कार्ड की तरह कड़े नहीं होंगे और इन्हें आसानी से मोड़कर अपने वॉलेट में रखा जा सकेगा. इन पॉलिमर करेंसी को भी बिलकुल कागज की तरह ही इस्तेमाल किया जा सकेगा.

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मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, अभी 60 देशों में पॉलिमर करेंसी चलाई जा रही है. कुछ देशों में इसे पूरी तरह लागू कर दिया गया है तो कुछ जगहों पर आशिंक तौर पर चलाई जा रही है. ऑस्ट्रेलिया पहला ऐसा देश था, जिसने साल 1988 में पॉलिमर वाले 10 डॉलर उतारे थे. इसके बाद साल 1998 में रोमानिया ने इसे लागू किया और पहला यूरोपीय देश बना. फिलहाल कनाडा, यूके, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड और वितयनाम में भी प्लास्टिक करेंसी इस्तेमाल की जाती है.

पेपर की मौजूदा करेंसी को छापने का खर्चा तो ज्यादा होता ही है, उसकी लाइफ भी कम होती है. प्लास्टिक के नोट न तो जल्दी फटते हैं और न ही गंदे होते हैं. साफ शब्दों में कहें तो कागज के मुकाबले प्लास्टिक के नोट लंबे समय तक चलते हैं और साफ-सुथरे भी रहते हैं. इस नोट में सिक्योरिटी फीचर भी ज्यादा होंगे, जिसमें ट्रांसपैरेंट विंडो, माइक्रो ऑप्टिक होलोग्राम, खास तरह की स्याही का इस्तेमाल किया जाएगा. लिहाजा इसका नकली नोट छापना संभव नहीं होगा.

आरबीआई ने यह कदम करेंसी छापने की बढ़ती लागत को कम करने और नोट की लाइफ बढ़ाने के लिए उठाया है. बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, मार्च 2025 में खत्म हुए वित्तवर्ष में नोट छापने के लिए 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च किए गए जिसकी लागत एक साल पहले तक 5,101.4 करोड़ रुपये रही है. यह लागत नकदी की डिमांड बढ़ने की वजह से आई है. इसके साथ ही नोट खराब होने मात्रा भी पिछले साल से 12.3 फीसदी बढ़ गई है. वित्तवर्ष 2025 में 23.8 अरब नोट को सर्कुलेशन से बाहर किया गया, जो एक साल पहले तक 21.24 अरब नोट था.

आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, सर्कुलेशन से बाहर किए जाने वाले खराब नोटों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी 500 के नोटों की है, जिसके बाद 100 के नोटों का नंबर आता है. ऑनलाइन भुगतान बढ़ने के बावजूद नकदी का इस्तेमाल कम नहीं हो रहा है. 15 मई तक के आंकड़े देखें तो सर्कुलेशन में कुल 42.86 लाख करोड़ की करेंसी थी. चालू वित्तवर्ष के पहले 6 हफ्ते में ही करेंसी का सर्कुलेशन 1.5 लाख करोड़ रुपये बढ़ है.

यह पहली बार नहीं है, जब भारत ने प्लास्टिक के नोट चलाने की तैयारी की है. साल 2012 में यूपीए सरकार ने भी 10 रुपये के प्लास्टिक नोट ट्रायल बेसिस पर लॉन्च किए थे. तब 1 अरब नोटों को सर्कुलेशन में लॉन्च किया गया था. इन नोटों को कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला में जारी किया गया था. प्लास्टिक नोट उतारने की मंशा नकली नोटों पर लगाम कसने और इसके सुरक्षा फीचर बढ़ाने के लिए है.

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