इन चार सालों में इंग्लैंड की टीम ने टेस्ट क्रिकेट को नीरसता और भविष्यवाणी से दूर एक रोमांचक खेल बना दिया था. इस दौर में क्रिकेट की पारंपरिक सोच को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया. मैकुलम और स्टोक्स के शब्दकोश में ‘ड्रॉ’ जैसा कोई शब्द ही नहीं था. चौथी पारी में बड़े लक्ष्यों का पीछा करना उनके लिए एक असंभव मिशन नहीं, बल्कि एक सुनहरा अवसर था. उनका हर फैसला, हर घोषणा, हर फील्ड सेटिंग और मैदान पर खेला गया हर शॉट क्रिकेट के सदियों पुराने ढर्रे को चुनौती देता था.
27 जीत के बाद भी अधूरा रह गया ‘बैजबॉल’ युग.
संकट का दौर और एक नए माइंडसेट की शुरुआत
जब मई 2022 में ब्रेंडन मैकुलम ने इंग्लैंड के ड्रेसिंग रूम में कदम रखा था, तब टीम बेहद नाजुक दौर से गुजर रही थी. इंग्लैंड ने अपने पिछले 17 टेस्ट मैचों में से सिर्फ एक जीता था. जो रूट कप्तानी छोड़ चुके थे, टीम का आत्मविश्वास पूरी तरह खत्म हो चुका था और ऑस्ट्रेलिया में एशेज की करारी हार ने टीम की खामियों को जगजाहिर कर दिया था. इंग्लैंड की टीम विश्व टेस्ट चैंपियनशिप की अंक तालिका में सबसे निचले पायदानों पर संघर्ष कर रही थी. बल्लेबाजी बिखरी हुई थी और गेंदबाजों को कोई सहयोग नहीं मिल रहा था.
‘बैजबॉल’ का जन्म और हार के डर से मुक्ति
ऐसे संकट के समय में इंग्लैंड क्रिकेट के निदेशक रॉब की ने एक बड़ा जुआ खेला. उन्होंने ब्रेंडन मैकुलम को कोच और बेन स्टोक्स को कप्तान नियुक्त किया. यह सिर्फ नेतृत्व का बदलाव नहीं था, बल्कि मानसिकता का एक संपूर्ण रीसेट था. मैकुलम ने आते ही कोई चमत्कार करने का वादा नहीं किया, बल्कि उन्होंने खिलाड़ियों से सिर्फ एक बात कही ‘हारने के डर को दिल से निकाल दो.’ इसी सोच से उस सांस्कृतिक बदलाव का जन्म हुआ जिसे दुनिया ने ‘बैजबॉल’ का नाम दिया.
साल 2022 में घरेलू मैदानों पर रनों की तूफानी चेज
इस आक्रामक रणनीति के परिणाम तुरंत दिखने लगे. साल 2022 इस क्रांति के जन्म का गवाह बना. न्यूजीलैंड के खिलाफ घरेलू सीरीज में इंग्लैंड ने 3-0 से सूपड़ा साफ किया. खास बात यह थी कि तीनों मैचों में इंग्लैंड ने चौथी पारी में रनों का पीछा करते हुए जीत हासिल की. जो रूट ने मैदान पर अपनी खोई हुई आजादी वापस पा ली और जॉनी बेयरस्टो तो मानो अजेय हो गए. इंग्लैंड ने 277, 299 और 296 जैसे बड़े लक्ष्यों को इतनी तेजी और आक्रामकता से हासिल किया कि 250 से अधिक रनों का पीछा करना अब उनके लिए बेहद आम बात लगने लगी.
ऐतिहासिक रन-चेज और दक्षिण अफ्रीका से मुकाबला
इसके बाद भारत के खिलाफ री-शेड्यूल किया गया पांचवां टेस्ट मैच बैजबॉल का सबसे बड़ा मैनिफेस्टो बन गया. 378 रनों के विशाल लक्ष्य का पीछा करते हुए इंग्लैंड के बल्लेबाजों के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी. जो रूट और जॉनी बेयरस्टो ने नाबाद 269 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी कर इंग्लैंड को टेस्ट इतिहास की सबसे बड़ी सफल रन-चेस दिलाई और सीरीज को 2-2 से बराबर किया. हालांकि इसके तुरंत बाद दक्षिण अफ्रीका ने लॉर्ड्स टेस्ट में मैकुलम को पहली हार का स्वाद चखाया, लेकिन पैनिक करने के बजाय इंग्लैंड ने अगले दोनों टेस्ट जीतकर सीरीज अपने नाम कर ली.
पाकिस्तान में रिकॉर्ड तोड़ ऐतिहासिक क्लीन स्वीप
बैजबॉल की सबसे स्वर्णिम गाथा पाकिस्तान की धरती पर लिखी गई, जिसे इस युग की सबसे बड़ी विदेशी उपलब्धि माना जाता है. इंग्लैंड पाकिस्तान का दौरा करने वाली और वहां 3-0 से क्लीन स्वीप करने वाली इतिहास की पहली मेहमान टीम बनी. रावलपिंडी टेस्ट के पहले ही दिन इंग्लैंड ने 75 ओवरों में 6.75 की रन रेट से 506 रन कूटकर टेस्ट क्रिकेट के 112 साल पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया, जो 1910 में ऑस्ट्रेलिया ने बनाया था. इस पारी में इंग्लैंड ने मैच के पहले सत्र में सबसे ज्यादा रन (174) बनाने, सबसे तेज ओपनिंग शतकीय साझेदारी (83 गेंद) और सबसे तेज दोहरी शतकीय साझेदारी (181 गेंद) का रिकॉर्ड बनाया. इसी मैच में जैक क्रॉली और हैरी ब्रूक ने रिकॉर्ड तोड़ आक्रामक शतक जड़े.
बैजबॉल के चार सालों का आंकड़ों में सफर
आंकड़ों में देखें तो इस पूरे दौर में इंग्लैंड ने कुल 49 टेस्ट मैच खेले, जिनमें से उन्होंने 27 मैचों में शानदार जीत दर्ज की और 20 मैचों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इस दौरान उनका जीत का प्रतिशत 55.1 रहा. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस आक्रामक शैली के कारण करीब चार सालों में केवल दो टेस्ट मैच ही ऐसे रहे जो ड्रॉ पर समाप्त हुए, जिससे साफ होता है कि इंग्लैंड कभी भी मैच बचाने के लिए नहीं, बल्कि हमेशा नतीजा निकालने के लिए खेलता था.
अति आक्रामकता के नुकसान और एक युग का अंत
बेशक, इस आक्रामक दर्शन के अपने नुकसान भी रहे. लगातार आक्रमण करने की जिद में कप्तान बेन स्टोक्स कई बार सस्ते में आउट हुए, जिसकी कीमत टीम को चुकानी पड़ी. बल्लेबाजों ने नवीनता की सीमाओं को इस कदर लांघा कि जो रूट जैसे पारंपरिक बल्लेबाज भी तेज गेंदबाजों के खिलाफ रिवर्स-रैंप शॉट खेलने लगे और कुछ मौकों पर तो वे बाएं हाथ से भी बल्लेबाजी करते दिखे. इस अति-आक्रामकता ने जहां मनोरंजन का चरम दिखाया, वहीं कई मौकों पर गैर-जिम्मेदाराना शॉट्स के कारण इंग्लैंड को मैच गंवाने भी पड़े, जिसके परिणामस्वरूप आखिरकार ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज हार के साथ इस ऐतिहासिक युग का अंत हुआ. भले ही बैजबॉल का सफर अब खत्म हो गया हो, लेकिन इसने टेस्ट क्रिकेट के इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ी है जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा.
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