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होमखेलक्रिकेटपोलियो से जंग, एक आंख से कप्तानी, क्रिकेट के इन 5 हीरो की दास्तां देगी हौसला

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5 cricketers who defied disabaility: किस्मत इंसान को तोड़ सकती है, लेकिन उसके हौसले को नहीं. क्रिकेट इतिहास के 5 ऐसे ही जांबाजों की दास्तान, जिन्होंने अपनी शारीरिक अपंगता और गंभीर बीमारियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. एक आंख की रोशनी खोने के बाद भी टीम इंडिया की कप्तानी करने वाले टाइगर पटौदी से लेकर, पोलियोग्रस्त हाथ से 242 विकेट चटकाने वाले भागवत चंद्रशेखर तक. इन खिलाड़ियों के फौलादी इरादों और अटूट जज्बे की वह प्रेरणादायक कहानियां, जो साबित करती हैं कि मैदान पर जीत शरीर से नहीं, जिगरे से जीती जाती है.

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इन पांच क्रिकेटर्स ने अपनी कमजोरी को बनाया ताकत.

नई दिल्ली.  22 गज की वह पिच, जहां 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आती गेंदें और मैदान में मौजूद हजारों दर्शकों का शोर अच्छे-अच्छों के पैर डिगा देता है. वहां सिर्फ हुनर नहीं, लोहे जैसी इच्छाशक्ति की जरूरत होती है. जब किस्मत किसी खिलाड़ी से उसकी शारीरिक क्षमता का एक हिस्सा छीन लेती है, तो दुनिया मान लेती है कि सफर खत्म हो गया. लेकिन कुछ जुनूनी ऐसे होते हैं जो किस्मत के लिखे को अपने हौसले से बदल देते हैं. आइए जानते हैं क्रिकेट इतिहास के उन 5 जांबाजों की दास्तां, जिन्होंने अपनी अपंगता और शारीरिक चुनौतियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और खेल की दुनिया में खूब नाम कमाए.

साल 1961 में इंग्लैंड में एक भयानक कार हादसा हुआ और एक 20 साल के नौजवान ने अपनी दाईं आंख की रोशनी हमेशा के लिए खो दी. डॉक्टरों ने कहा कि अब वह कभी ढंग से देख नहीं पाएगा, क्रिकेट खेलना तो दूर की बात है. उस नौजवान का नाम था मंसूर अली खान पटौदी (Mansoor Ali Khan Pataudi) . जिन्हें दुनिया ‘टाइगर पटौदी’ के नाम से जानती थी. नवाब पटौदी ने हार नहीं मानी. उन्होंने एक आंख से ही गेंद की लेंथ को भांपने का अभ्यास किया. जब वह मैदान पर उतरते, तो उन्हें एक की जगह दो गेंदें नजर आती थीं, लेकिन अपने कड़े अभ्यास से उन्होंने सही गेंद को हिट करना सीख लिया. हादसे के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने न सिर्फ भारतीय टीम में वापसी की, बल्कि महज 21 साल की उम्र में भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे युवा कप्तान भी बने. इतना ही नहीं, यह उनकी जांबाज कप्तानी का ही कमाल था कि साल 1968 में भारत ने विदेश (न्यूजीलैंड) में अपनी पहली टेस्ट सीरीज जीतकर इतिहास रचा था.

इन पांच क्रिकेटर्स ने अपनी कमजोरी को बनाया ताकत.

पोलियोग्रस्त हाथ, जिससे कांपते थे दुनिया के बल्लेबाज
जब भागवत चंद्रशेखर (Bhagwat Chandrashekhar) बचपन में पोलियो के शिकार हुए, तो उनका दायां हाथ कमजोर और लकवाग्रस्त हो गया. किसी भी आम इंसान के लिए यह एक बहुत बड़ा झटका होता, खासकर उसके लिए जो खिलाड़ी बनना चाहता हो. लेकिन चंद्रशेखर ने अपनी इस कमजोरी को ही दुनिया का सबसे खतरनाक हथियार बना लिया. उन्होंने अपने पतले और पोलियोग्रस्त दाएं हाथ से लेग स्पिन गेंदबाजी करना शुरू किया. उनका यह हाथ सामान्य से ज्यादा लचीला हो गया था, जिससे वह गेंद को अप्रत्याशित गति और बाउंस दे पाते थे. बल्लेबाज समझ ही नहीं पाते थे कि गेंद कब स्पिन होगी और कब तेज आएगी. उन्होंने भारत के लिए 58 टेस्ट मैच खेले और विपक्षी टीमों के पसीने छुड़ाते हुए 242 विकेट अपने नाम किए. उन्होंने साबित किया कि अगर हौसला बुलंद हो, तो शरीर की कमजोरी भी आपकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है.

दो इंच छोटे हाथ से लिख दी महानता की कहानी
क्रिकेट में तकनीक और दोनों हाथों का संतुलन सबसे अहम माना जाता है. लेकिन इंग्लैंड के महान बल्लेबाज सर लेन हटन (Len Hutton) की कहानी हैरान करने वाली है.द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक सैन्य प्रशिक्षण के दौरान वह गंभीर रूप से चोटिल हो गए. उनके हाथ का ऑपरेशन करना पड़ा, जिसके बाद उनका बायां हाथ उनके दाएं हाथ से करीब 2 इंच छोटा हो गया. एक बल्लेबाज के लिए यह करियर खत्म होने जैसा था. लेकिन हटन ने हार मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने अपनी बल्लेबाजी की तकनीक को बदला, ग्रिप में बदलाव किया और दोबारा मैदान पर उतरे. उन्होंने इंग्लैंड के लिए 79 टेस्ट मैच खेले और 19 सेंचुरीज के साथ 6,971 रन बनाए. उनका यह जज्बा बताता है कि मैदान पर कद हाथों की लंबाई से नहीं, इरादों की ऊंचाई से नापा जाता है.

तीन अंगुलियां नहीं थीं, फिर भी लगा दिए रिकॉर्ड्स के अंबार
महज 13 साल की उम्र में एक दर्दनाक फोर्कलिफ्ट एक्सीडेंट ने न्यूजीलैंड के मार्टिन गप्टिल (Martin Guptill) के बाएं पैर के पंजे की तीन उंगलियां छीन ली थीं. उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह लड़का कभी दौड़ भी पाएगा. लेकिन गप्टिल के पैर में भले ही उंगलियां न हों, उनके सपनों में गजब की उड़ान थी. गप्टिल ने विशेष रूप से डिजाइन किए गए जूते पहने और मैदान पर उतर पड़े. वह न सिर्फ न्यूजीलैंड के सबसे विस्फोटक ओपनर बने, बल्कि दुनिया के सबसे शानदार फील्डर्स में से एक कहलाए. वनडे क्रिकेट में 237 रनों की ऐतिहासिक पारी खेलने वाले गप्टिल ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सालों तक न्यूजीलैंड का प्रतिनिधित्व किया. आज भी दुनिया भर की टी20 लीग में उनकी बल्लेबाजी देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि इस खिलाड़ी के पैर में तीन अंगुलियां नहीं हैं.

दिमागी बीमारी के दौरों के बीच संभाली इंग्लैंड की कमान
शारीरिक चोटों से लड़ना एक बात है, लेकिन एक ऐसी बीमारी से लड़ना जो सीधे आपके दिमाग पर हमला करती हो, बेहद खौफनाक है. इंग्लैंड के पूर्व कप्तान टोनी ग्रेग (Tony Greig) ‘एपिलेप्सी’ यानी मिर्गी की बीमारी से पीड़ित थे. उन्हें अक्सर गंभीर दौरे पड़ते थे, जिससे उनका शरीर बेकाबू हो जाता था. इस दिमागी बीमारी के साये में भी टोनी ग्रेग ने हार नहीं मानी. वह मैदान पर उतरते रहे, रन बनाते रहे और विकेट चटकाते रहे. उन्होंने न सिर्फ इंग्लैंड के लिए 58 टेस्ट मैच खेले, बल्कि टीम की कप्तानी भी की. उनके नाम टेस्ट क्रिकेट में 8 शानदार शतक और 141 विकेट दर्ज हैं. बाद में वह दुनिया के सबसे लोकप्रिय कमेंटेटर भी बने.

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Kamlesh Raiचीफ सब एडिटर

कमलेश राय वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर कार्यरत हैं. 17 वर्षों से अधिक के अपने सुदीर्घ पत्रकारीय सफर में उन्होंने डिजिटल मीडिया की बारीकियों और खबरों की गहरी समझ के साथ एक विशिष्ट पहचान बनाई ह…और पढ़ें

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