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जिले के भीखमपुर गांव के वीर क्रांतिकारी पंडित राजनारायण मिश्र को अंग्रेजी हुकूमत ने 9 दिसंबर 1944 को लखनऊ जेल में फांसी दे दी थी. उस समय उनकी उम्र मात्र 24 वर्ष थी. इतिहासकारों के अनुसार, वे अंग्रेजी शासन द्वारा फांसी दिए जाने वाले अंतिम स्वतंत्रता सेनानियों में गिने जाते हैं. उनके सर्वोच्च बलिदान ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की. र्ष 1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था, तब भीखमपुर गांव के युवा राजनारायण मिश्र भी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. उनका मानना था कि अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए क्रांतिकारियों के पास हथियार होना जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने शस्त्र जुटाने का अभियान शुरू किया

लखीमपुर खीरीः भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. जिले के भीखमपुर गांव के वीर क्रांतिकारी पंडित राजनारायण मिश्र को अंग्रेजी हुकूमत ने 9 दिसंबर 1944 को लखनऊ जेल में फांसी दे दी थी. उस समय उनकी उम्र मात्र 24 वर्ष थी. इतिहासकारों के अनुसार, वे अंग्रेजी शासन द्वारा फांसी दिए जाने वाले अंतिम स्वतंत्रता सेनानियों में गिने जाते हैं. उनके सर्वोच्च बलिदान ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की.

वर्ष 1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था, तब भीखमपुर गांव के युवा राजनारायण मिश्र भी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. उनका मानना था कि अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए क्रांतिकारियों के पास हथियार होना जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने शस्त्र जुटाने का अभियान शुरू किया

राजनारायण मिश्र पर तान दी बंदूक

बताया जाता है कि इसी दौरान वे महमूदाबाद के कोठार में वहां के जिलेदार से बंदूक लेने पहुंचे. जिलेदार ने बंदूक देने से इनकार कर दिया और उल्टा राजनारायण मिश्र पर ही बंदूक तान दी. आत्मरक्षा और क्रांतिकारी उद्देश्य से राजनारायण मिश्र ने उसकी बंदूक छीन ली और उसी से गोली चला दी, जिससे जिलेदार की मौके पर ही मौत हो गई. इसके बाद वे बंदूक लेकर वहां से निकल गए. इस घटना के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने भीखमपुर गांव में जमकर दमन चक्र चलाया. गांव के लोगों पर अत्याचार किए गए और राजनारायण मिश्र को पकड़ने के लिए व्यापक अभियान शुरू किया गया. अदालत ने उन्हें फरार घोषित कर दिया और उन्हें जीवित या मृत पकड़वाने वाले के लिए 500 रुपये का इनाम घोषित किया गया. इसके बाद उन्होंने लखीमपुर खीरी छोड़ दिया और देश के विभिन्न हिस्सों में रहकर गुप्त रूप से स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाते रहे.

हुलिया बदल करते थे ये काम

राजनारायण मिश्र लगातार अपना हुलिया बदलकर क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे. इसी दौरान जब महात्मा गांधी पुणे स्थित आगा खां पैलेस में 21 दिन का ऐतिहासिक अनशन कर रहे थे, तब मुंबई में हड़ताल कराने के आरोप में राजनारायण मिश्र को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्होंने अपनी पहचान छिपाकर छह महीने की सजा काटी. अक्टूबर 1943 में जेल से रिहा होने के बाद जब वे उत्तर प्रदेश लौटे, तो मेरठ पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

उन पर देशद्रोह सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए. मुकदमे की सुनवाई के बाद 27 जून 1944 को लखनऊ की अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई. आखिरकार 9 दिसंबर 1944 को लखनऊ जेल में मात्र 24 वर्ष की आयु में पंडित राजनारायण मिश्र को फांसी दे दी गई. उन्होंने हंसते-हंसते मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है. आज भी लखीमपुर खीरी के लोग अपने इस वीर सपूत को गर्व और श्रद्धा के साथ याद करते हैं.

दादा जी को याद कर आंखे हो जाती है नम

बातचीत करते हुए संजय मिश्रा ने जानकारी देते हुए बताया कि दादा जी को जब भी हम याद करते हैं तो आंखों में आंसू जाते हैं. मेरी जितनी भी पुरानी संपत्ति थी उसे अंग्रेजों ने जब कर लिया था और नमक की बुवाई करवा दी थी घर को पूरी तरीके से नष्ट कर दिया था. जब उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई अब से फांसी लगने के दिन तक शहादत के जोश और प्रसन्नता के कारण उनका वजन 6.5 पौंड और बढ़ गया. 9 दिसंबर 1944 को प्रातः 4:00 बजे लखनऊ की जिला जेल में फांसी पर लटका दिया गया था.

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें

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