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उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब तक जो भी मुख्यमंत्री बने हैं. उनके हिस्से में सिर्फ राजनीति ही नहीं रही है, जबकि उनके हिस्से में कई सारे किस्से हैं. कुछ किस्से सत्ता के हैं. कुछ बगावत के हैं. कुछ चुनावी चालों के हैं. लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी हैं. जो सीधे दिल से होकर राजनीति तक पहुंचती हैं. ‘UP CM के गजब किस्से’ के दूसरे भाग में आज ऐसी ही एक कहानी आप सबको बताने जा रहा हूं जो बहुत कम लोगों पता होगी. कहानी एक ऐसी महिला की जिसने पहले अपने जीवन का फैसला खुद किया और फिर आगे चलकर राजनीति में भी अपनी ऐसी अलग जगह बनाई जो आज भारत के इतिहास में दर्ज है.

यह कहानी है सुचेता कृपलानी की. वही सुचेता कृपलानी. जिन्हें आज हम उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री और आज़ाद भारत के किसी भी राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर जानते हैं. लेकिन मुख्यमंत्री बनने से बहुत पहले उनकी जिंदगी में एक ऐसा अध्याय भी है. जिसे पढ़ते हुए आप बस मुस्करा देंगे. चलिए समझते हैं पूरी कहानी.

जब BHU की एक टीचर की मुलाकात कांग्रेस के बड़े नेता से हुई
सुचेता कृपलानी का जन्म 25 जून 1908 को हुआ था. उस समय उनका नाम सुचेता मजूमदार था. पढ़ाई-लिखाई में तेज सुचेता आगे चलकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में Constitutional History पढ़ाने लगीं. यह वही दौर था, जब देश आजादी की लड़ाई में उबल रहा था. विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के साथ राजनीति की हलचल भी थी. कांग्रेस से जुड़े नेता युवाओं को आंदोलन से जोड़ने में लगे थे. इसी दौर में सुचेता की जिंदगी में एक नया किरदार दाखिल होता है. नाम- आचार्य जे.बी. कृपलानी. Indian Express में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, 1929 में सुचेता BHU में पढ़ाती थीं और जे.बी. कृपलानी वहां स्वतंत्रता आंदोलन के लिए स्वयंसेवक तलाशने जाया करते थे. यही वह जगह थी, जहां पहली बार दोनों के रास्ते टकराए. पहली नजर का प्यार जैसा कुछ रिकॉर्ड में नहीं मिलता, लेकिन इतना जरूर साफ है कि यहीं से परिचय शुरू हुआ और धीरे-धीरे वह रिश्ता एक बड़े फैसले तक पहुंच गया.

आखिर कौन थे जे.बी. कृपलानी, जिन पर सुचेता का दिल आ गया?

आज के दौर में बहुत सारे लोगों को यह नाम न पता हो. तो हम उन्हें बता दें कि उस दौर में आचार्य जे.बी. कृपलानी राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा चेहरा थे. उनका पूरा नाम था जीवताराम भगवानदास कृपलानी. कांग्रेस में उनकी बहुत मजबूत पकड़ थी. गांधीवादी विचारधारा के आदमी थे. स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका थी. वह सिर्फ नेता नहीं उस दौर के राजनीतिक और वैचारिक चेहरों में गिने भी माने जाते थे.

उस समय सुचेता उनसे काफी छोटी थीं. करीब 20 साल का दोनों में अंतर था. लेकिन दोनों के विचार एक थे. इसलिए मुलाकातें होने लगी, बातचीत बढ़ी. साथ में काम करने लगे और फिर वह हुआ, जिसकी शायद उस दौर में बहुत कम लोगों ने उम्मीद की होगी. दोनों ने शादी का फैसला कर लिया.

यहीं से किस्से में शुरू होता है असली ड्रामा

अब जरा उस वक्त का माहौल सोचिए.
1930 का दशक. समाज पहले से कहीं ज्यादा परंपराओं में बंधा हुआ. एक युवा, पढ़ी-लिखी महिला. दूसरी तरफ उससे 20 साल बड़ा एक राष्ट्रीय नेता. ऐसे में अगर दोनों शादी का फैसला करें, तो बात सिर्फ घर के भीतर नहीं रहती, समाज तक जाती है. और सुचेता-कृपलानी की कहानी में भी यही हुआ.

Indian Express की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि जे.बी. कृपलानी सुचेता से करीब 20 साल बड़े थे और दोनों परिवार इस रिश्ते के पक्ष में नहीं थे. यानी शादी का रास्ता सीधा नहीं था. यह वह मोड़ था, जहां प्यार से ज्यादा सवाल थे—उम्र को लेकर, समाज को लेकर, परिवार को लेकर.

लेकिन असली मोड़ अभी बाकी था.

जब गांधी भी इस रिश्ते से खुश नहीं थे
सुचेता और कृपलानी की कहानी को यादगार बनाने वाला सबसे बड़ा प्रसंग यही है.
इस रिश्ते पर सिर्फ परिवारों ने ही आपत्ति नहीं जताई, महात्मा गांधी भी शुरुआत में इस शादी के पक्ष में नहीं थे.

Indian Express की 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, गांधी को लगता था कि अगर यह शादी हुई तो वह अपने “right arm JB Kripalani” को खो देंगे. दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें यह डर था कि शादी के बाद कृपलानी का पूरा ध्यान आंदोलन और संगठन से हट सकता है.

लेकिन यहां सुचेता ने जो जवाब दिया, वही शायद इस पूरे किस्से की जान है. उसी रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने गांधी से कहा था—शादी के बाद आपको एक नहीं, दो कार्यकर्ता मिलेंगे.

सोचिए, उस दौर की एक युवा महिला, सामने महात्मा गांधी, और जवाब इतना साफ, इतना संतुलित और इतना आत्मविश्वास भरा. यही वह क्षण है, जहां सुचेता सिर्फ एक प्रेम में पड़ी लड़की नहीं लगतीं, बल्कि अपने फैसले पर अडिग एक व्यक्तित्व की तरह सामने आती हैं.

विरोध बहुत था, लेकिन सुचेता ने रास्ता नहीं बदला
परिवारों की नाराजगी, उम्र का बड़ा फासला, गांधी की शुरुआती आपत्ति—किसी और की कहानी होती तो शायद यहीं ठहर जाती. लेकिन सुचेता कृपलानी की कहानी यहीं से आगे बढ़ती है. उन्होंने अपने फैसले से पीछे हटना मंजूर नहीं किया.

आखिरकार अप्रैल 1936 में सुचेता मजूमदार और आचार्य जे.बी. कृपलानी की शादी हो गई.
यह वही शादी थी, जिस पर पहले सवाल उठे, लेकिन आगे चलकर यही रिश्ता भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गया.

लेकिन सुचेता की कहानी को सिर्फ ‘लव स्टोरी’ समझना भूल होगी
अगर यह कहानी सिर्फ शादी तक सीमित होती, तो शायद इसे एक दिलचस्प निजी प्रसंग कहकर भुला दिया जाता. लेकिन सुचेता कृपलानी की असली ताकत यह थी कि उन्होंने अपनी पहचान सिर्फ किसी बड़े नेता की पत्नी के रूप में नहीं बनने दी.

शादी के बाद भी वह स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहीं. उन्होंने All India Mahila Congress के गठन में भूमिका निभाई. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वह भूमिगत गतिविधियों से जुड़ी रहीं. बाद में वह संविधान सभा की सदस्य बनीं. आजादी की पूर्व संध्या पर संसद के ऐतिहासिक सत्र में वंदे मातरम् गाने वालों में भी उनका नाम दर्ज है.

यानी सुचेता की कहानी में प्रेम है, लेकिन प्रेम से बड़ी चीज उनकी अपनी पहचान है.

और फिर आया वह दिन, जब सुचेता ने इतिहास लिख दिया
किस्से का सबसे बड़ा मोड़ आता है 2 अक्टूबर 1963 को.
यही वह दिन था, जब सुचेता कृपलानी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इसके साथ ही वह उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं. इतना ही नहीं, वह आज़ाद भारत के किसी भी राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री भी थीं.

अब जरा इस कहानी को शुरुआत से जोड़कर देखिए.
एक युवती, जिसने अपने से 20 साल बड़े नेता से शादी का फैसला किया.
जिस रिश्ते पर परिवारों ने सवाल उठाए.
जिस पर गांधी ने भी शुरुआत में आपत्ति जताई.
और वही महिला आगे चलकर देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक की कमान संभालने लगी.

यही वजह है कि सुचेता कृपलानी की कहानी सिर्फ राजनीतिक उपलब्धि की कहानी नहीं, बल्कि अपने फैसले पर टिके रहने की कहानी भी लगती है.

मुख्यमंत्री बनना भी आसान नहीं था
सुचेता को मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी सम्मान-चिन्ह की तरह नहीं मिली थी. उसके पीछे राजनीतिक संघर्ष भी था. 1963 में उत्तर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा थी. कांग्रेस को नया नेता चुनना था. Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मुकाबले में सुचेता कृपलानी ने कमलापति त्रिपाठी को हराकर कांग्रेस विधायक दल का नेतृत्व हासिल किया और फिर मुख्यमंत्री बनीं.

यानी उन्होंने सिर्फ इतिहास नहीं बनाया, वहां तक पहुंचने के लिए पार्टी के भीतर मुकाबला भी जीता.

इस किस्से की असली बात क्या है?
शायद यही कि सुचेता कृपलानी की कहानी एक साथ कई रूपों में सामने आती है.
यह एक महिला की निजी जिद की कहानी है.
यह अपने समय से आगे चलने की कहानी है.
यह उस रिश्ते की कहानी है, जिस पर सवाल बहुत उठे, लेकिन जो टूट नहीं पाया.
और यह उस नेता की कहानी भी है, जिसने अपनी पहचान किसी के सहारे नहीं, अपने दम पर बनाई.

इसलिए अगर कोई सुचेता कृपलानी को सिर्फ “यूपी की पहली महिला मुख्यमंत्री” कहकर आगे बढ़ जाए, तो कहानी अधूरी रह जाएगी.
उनकी जिंदगी का यह अध्याय बताता है कि मुख्यमंत्री बनने से पहले भी वह अपने समय से लड़ रही थीं—कभी समाज से, कभी सोच से, कभी परंपरा से.

आखिर में
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सुचेता कृपलानी का किस्सा इसलिए अलग दिखता है, क्योंकि इसमें सत्ता से पहले इंसान नजर आता है. यहां कुर्सी से पहले दिल की बात है, फैसले की कीमत है, विरोध का दबाव है और फिर उसी रास्ते पर चलते हुए इतिहास में दर्ज हो जाने का सुख भी है.

यही वजह है कि UP CM के गजब किस्से में सुचेता कृपलानी का यह अध्याय सिर्फ एक राजनीतिक प्रसंग नहीं, बल्कि प्यार, हिम्मत और इतिहास—तीनों को साथ लेकर चलने वाली दास्तान बन जाता है.

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