क्षेत्रीय दलों में विस्तार का ट्रेंड
भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार एक नया ट्रेंड बनता जा रहा है. अभी तक क्षेत्रीय दल अपने ही राज्यों तक सीमित रहे हैं, लेकिन अब उनमें विस्तार की ललक बढ़ गई है. नार्थ ईस्ट में जेडीयू के पहले कुछ विधायक होते थे. लंबे समय से अपनी जातीय राजनीति और विकास के मुद्दों के लिए मशहूर रहीं बिहार की सियासी पार्टियां अब दूसरे राज्यों में विस्तार की कोशिश कर रही हैं. बिहार की प्रमुख पार्टियां जैसे लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू), विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) अब बिहार की सीमाओं से बाहर निकल कर यूपी, पंजाब, दिल्ली, केरल जैसे राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बेताब दिख रही हैं. केरल में आरजेडी ने खाता खोला है. जेडीयू नार्थ ईस्ट के अलावा दिल्ली में किस्मत आजमा चुकी है. बिहार से बाहर झारखंड में जेडीयू और एलजेपीआर के विधायक हैं.
चुनाव की इच्छा या सौदेबाजी?
बिहार की राजनीति बीते दो दशक से गठबंधनों और जातीय समीकरणों पर आधारित रही है. हाल के वर्षों में बिहार की पार्टियों को लगने लगा है कि उन्होंने अपने सूबे में जो काम किए हैं, वे उन्हें दूसरे राज्यों में सियासी जमीन मुहैया करा सकते हैं. दूसरे राज्यों में बड़ी संख्या में प्रवासी बिहारी रहते हैं. वहां से बिहार के सांस्कृतिक संबंध भी हैं. इससे बिहार के राजनीतिक दलों को लगता है कि वे पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत दूसरे राज्यों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं. गठबंधन में चुनाव लड़ कर आरजेडी ने केरल में खाता खोला भी है. यह रणनीति उन्हें बिहार में बेहतर सौदेबाजी की स्थिति भी दे सकती है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) यूपी में लड़ना चाहती है. चिराग पासवान की एलजेपीआर बिहार में एनडीए का मजबूत घटक बन चुकी है. चिराग पासवान ने हाल ही में स्पष्ट संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेगी. उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी यूपी में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है और अभी शुरुआती दौर में काम चल रहा है.
UP में पासवान वोट पर नजर
यूपी में एलजेपीआर की रुचि का कारण पासवान समुदाय की ठीकठाक आबादी है. प्रवासी बिहारियों का यबपी से करीबी रिश्ता है. चिराग की रुचि इसलिए भी उत्तर प्रदेश के चुनाव में है, क्योंकि वे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहते हैं. चिराग पासवान ने कहा है कि पार्टी सभी 403 सीटों पर लड़ने की तैयारी कर रही है. हालांकि यह एनडीए के साथ समन्वय में तो संभव नहीं हो सकता है. इसी तरह बिहार चुनाव में चिराग ने सभी 243 सीटों पर लड़ने का ऐलान किया था. इससे उन्हें यह फायदा हुआ कि एनडीए में एलजेपीआर को 29 सीटें लड़ने को मिल गईं. यूपी में वे संगठन को मजबूत करने के लिए जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटे हैं. यह विस्तार चिराग की महत्वाकांक्षा को दिखाता है. बिहार में एनडीए के बैनर तले 19 सीटें जीतने के बाद चिराग राष्ट्रीय स्तर पर खुद को स्थापित करना चाहते हैं. पासवान समुदाय के अलावा युवा और पिछड़े वर्गों को लक्ष्य कर वे यूपी में अपनी जगह बनाना चाहते हैं.
JDU पंजाब में लड़ने को बेताब
जेडीयू नीतीश कुमार के नेतृत्व में पंजाब में बड़े पैमाने पर एंट्री मारने की तैयारी कर रहा है. पंजाब जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष मालवेंद्र सिंह बेनीपाल ने घोषणा की है कि पार्टी 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में 45 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. पिछले दिनों राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस पर चर्चा भी हुई. पंजाब और बिहार का सांस्कृतिक संबंध गहरा है. सिखों के 10वें गुरु गोविंद सिंह की जन्मस्थली पटना साहिब है, जो भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है. पूर्व सीएम नीतीश कुमार की सुशासन और विकास की छवि को जेडीयू पंजाब में भुनाने की कोशिश करेगा. पंजाब में किसान आंदोलन, नशे की समस्या और युवा बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर जेडीयू अपनी वैकल्पिक राजनीति पेश कर सकता है. नीतीश कुमार पंजाब का दौरा भी करने वाले हैं. पार्टी बिहार-पंजाब के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों का फायदा उठाना चाहती है.
दिल्ली में JDU रहा असफल
जेडीयू ने दिल्ली में भी पहले प्रयास किए थे, लेकिन सफलता नहीं मिली. 2025 के दिल्ली चुनाव में जेडीयू ने एनडीए के साथ एक सीट पर चुनाव लड़ा. हालांकि उसे कामयाबी नहीं मिली. उसे महज 0.53 प्रतिशत वोट ही मिले. दिल्ली की नाकामी से जेडीयू ने सबक लिया है. अब पार्टी पंजाब जैसे राज्य पर फोकस कर रही है, जहां बिहारियों और सिख समुदाय का बड़ा आधार है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की मजबूत पकड़ और छोटे वोट बैंक के कारण जेडीयू को संघर्ष के ाबवजूद सफलता नहीं मिली. यह अनुभव भविष्य की रणनीतियों को आकार देगा.
VIP भी यूपी की जंग लड़ेगी
विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के अध्यक्ष मुकेश सहनी भी यूपी में टुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. वीआईपी मुख्य रूप से निषाद और पिछड़े समुदायों की पार्टी है. 2022 के चुनाव में मुकेश सहनी ने 50 से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. हालांकि उनके किसी भी उम्मीदवार को सफलता नहीं मिली. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में वीआईपी का खाता नहीं खोलने का झटका लगा है. इसके बावजूद वीआईपी यूपी में फिर से हाथ आजमाने को तैयार है. 2022 के यूपी विधानसबा चुनाव के वक्त मुकेश सहनी बिहार में एनडीए के साथ थे. 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए में उन्हें 11 सीटें मिली थीं. 4 जीत भी गए थे. 2 साल के लिए सहनी को विधान परिषद का सदस्य बनाया गया. उन्हें तत्कालीन नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री पद भी मिल गया था. यूपी चुनाव उनके लिए काल बन गया. विधायक भाजपा में चले गए और उन्हें एमएलसी पद पर विस्तार भी नहीं मिला. नतीजतन मंत्री पद स्वतः चला गया.
RJD ने केरल में खाता खोला है
राष्ट्रीय जनता दल को बिहार में भले बड़ा सेटबैक लगा हो, लेकिन पार्टी ने सबसे आश्चर्यजनक सफलता केरल में हासिल की है. 2026 के केरल विधानसभा चुनाव में आरजेडी उम्मीदवार पीके प्रवीण ने कुथुपरम्बा सीट से जीत दर्ज की और बिहार से बाहर पार्टी का खाता खोला. तेजस्वी यादव की रणनीति काम आई और राजद ने दक्षिण भारत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. केरल में आरजेडी की यह जीत प्रवासी बिहारियों के समर्थन और यूडीएफ के साथ रहने का नतीजा है. यह बिहार की पार्टी राजद के लिए राष्ट्रीय विस्तार का बड़ा उदाहरण है. आरजेडी अब और राज्यों में भी विस्तार की योजना बना रहा है. बिहार की पार्टियों का दूसरे राज्यों में विस्तार यह दर्शाता है कि क्षेत्रीय दल अब राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं रखने लगे हैं. सफलता मिले या न मिले, ये प्रयास बिहार की राजनीति को नई दिशा दे रहे हैं.
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