<strong>Gayatri Prakatotsav Muhurat:</strong> सनातन धर्म में मां गायत्री को वेदमाता यानी सभी वेदों की उत्पत्ति का स्रोत कहा जाता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मां गायत्री का प्राकट्य हुआ था, जिसे गायत्री प्रकटोत्सव या गायत्री जयंती के रूप में मनाया जाता है। गायत्री मंत्र को हिंदू धर्म का सबसे प्रभावशाली और पवित्र मंत्र माना गया है, जिसके नियमित जप से बुद्धि, विवेक और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/astrology-tantra-mantra-yantra/rules-for-chanting-gayatri-mantra-126053000042_1.html" target="_blank">क्या आप भी गलत तरीके से करते हैं गायत्री मंत्र का जाप? जानें सही नियम और 21 दिनों में देखें चमत्कारी बदलाव</a></strong>
वर्ष 2026 में मां गायत्री का प्रकटोत्सव 25 जून, गुरुवार को मनाया जा रहा है। आइए जानते हैं इसके शुभ मुहूर्त, सरल पूजा विधि और महामंत्र के बारे में:
शुभ मुहूर्त
साल 2026 में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि (जिसे निर्जला एकादशी भी कहा जाता है) की अवधि इस प्रकार है:
एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जून 2026 को शाम 06:12 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त: 25 जून 2026 को रात 08:09 बजे तक
ब्रह्म मुहूर्त/ सर्वोत्तम साधना समय: सुबह 03:31 एएम से 04:27 एएम तक
उदयातिथि के अनुसार व्रत और प्रकटोत्सव: 25 जून 2026 (गुरुवार)
मां गायत्री की सरल पूजा विधि
मां गायत्री की पूजा में मानसिक पवित्रता और एकाग्रता का सबसे अधिक महत्व है। आप घर पर इस विधि से पूजन कर सकते हैं:
<strong>स्नान और संकल्प:</strong> प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ-सुथरे सफेद या पीले वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर मां गायत्री की आराधना का संकल्प लें।
<strong>पूजा स्थल तैयार करना: </strong>एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर मां गायत्री की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। यदि तस्वीर न हो, तो अक्षत के अष्टदल कमल पर कलश स्थापित करके भी ध्यान कर सकते हैं।
<strong>सामग्री अर्पण: </strong>माता को गंगाजल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं। इसके बाद उनका पंचोपचार पूजन करें, उन्हें चंदन, अक्षत, पीले फूल, धूप और गाय के घी का दीपक अर्पित करें।
<strong>सात्विक प्रसाद का भोग: </strong>मां गायत्री को नारियल, मौसमी फल या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। माता को पंचामृत भी अर्पित किया जा सकता है।
<strong>मंत्र जप और आरती: </strong>रुद्राक्ष या चन्दन की माला से गायत्री मंत्र का कम से कम 108 बार यानी एक माला जाप करें। इसके बाद मां गायत्री की कपूर से आरती करें और अनजाने में हुई भूलचूक के लिए क्षमा याचना करें।<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/ekadashi-vrat-katha/why-is-the-nirjala-ekadashi-fast-observed-without-consuming-water-learn-about-legend-with-bhimasena-126062400013_1.html" target="_blank">निर्जला एकादशी 2026: बिना पानी पिए क्यों रखा जाता है यह कठिन व्रत? जानिए भीमसेन से जुड़ी अद्भुत कथा</a></strong>
<strong>मां गायत्री का महामंत्र और अर्थ</strong>
ऋग्वेद में वर्णित गायत्री मंत्र को सभी मंत्रों का राजा (गुरुमंत्र) माना गया है।
– 'ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्'
<strong>सरल अर्थ: </strong>हम उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।
<strong>जाप का नियम: </strong>गायत्री मंत्र का मानसिक जाप कभी भी किया जा सकता है, लेकिन बोलकर जप करते समय यह ध्यान रखें कि सुबह के समय आपका मुख पूर्व दिशा या शाम के समय पश्चिम दिशा की ओर हो।
<strong>विशेष: </strong>मां गायत्री की साधना के लिए तीन समय (त्रिकाल संध्या) सबसे उत्तम माने गए हैं—सूर्योदय से ठीक पहले (प्रातः काल), दोपहर के समय (मध्यान्ह काल), और सूर्यास्त से ठीक पहले (सायं काल)।
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