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Bahraich News: बहराइच जिले के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर शिशिर अग्रवाल ने ऐसे ही एक बेहद दुर्लभ मामले में कमाल कर दिखाया. उन्होंने बताया कि इस बीमारी को लेकर अमेरिका तक रिसर्च की गई. वहीं से मिली जानकारी और सलाह के आधार पर इलाज की नई राह निकली. बच्चे के लिए दिल्ली और मुंबई से खास प्रोटीन और एल्ब्यूमिन इंजेक्शन मंगवाने पड़े.

बहराइच: प्लास्टिक बेबी शब्द सुनकर कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि यह होता क्या है? जन्म के समय कुछ बच्चों के पूरे शरीर पर एक सख्त, चमकदार और पारदर्शी परत होती है जो प्लास्टिक या मोम जैसी दिखती है. इस परत की वजह से त्वचा खिंची रहती है. जिससे बच्चे को काफी दर्द होता है. कुछ दिनों या हफ्तों बाद यह परत सूखकर पपड़ी की तरह उतरने लगती है. अगर समय पर सही इलाज न मिले तो ऐसे नवजात की जान भी जा सकती है.

बहराइच जिले के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर शिशिर अग्रवाल ने ऐसे ही एक बेहद दुर्लभ मामले में कमाल कर दिखाया. उन्होंने बताया कि इस बीमारी को लेकर अमेरिका तक रिसर्च की गई. वहीं से मिली जानकारी और सलाह के आधार पर इलाज की नई राह निकली. बच्चे के लिए दिल्ली और मुंबई से खास प्रोटीन और एल्ब्यूमिन इंजेक्शन मंगवाने पड़े.

डॉ. शिशिर अग्रवाल और उनकी टीम ने लगभग 10 साल तक लगातार मेहनत की. यह ऐसी बीमारी है. जिसमें बचने की उम्मीद लगभग न के बराबर मानी जाती है. मेडिकल साइंस के मुताबिक ऐसे एक लाख बच्चों में से मुश्किल से कोई एक ही बच पाता है. लेकिन इस मामले में डॉक्टरों के जज्बे और लंबे इलाज ने चमत्कार कर दिया. जो बच्चा जन्म के समय प्लास्टिक जैसी झिल्ली में पूरी तरह लिपटा हुआ था. आज वही बच्चा आम बच्चों की तरह हंसता, खेलता और बातें करता है.

यह मामला बहराइच के पड़ोसी जिले श्रावस्ती का है. भिनगा तहसील के चौबेपुरवा भेला गांव में अक्टूबर 2016 में तरन्नुम नाम की महिला ने एक अजीबोगरीब बच्चे को जन्म दिया. बच्चा पूरी तरह ‘प्लास्टिक झिल्ली’ से ढका हुआ था. वह न ठीक से रो पा रहा था, न हंस पा रहा था और न ही शरीर में कोई खास हरकत थी. स्थानीय डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए. इसी बीच बच्चे के रोते-बिलखते माता-पिता उसे लेकर बहराइच के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शिशिर अग्रवाल के पास पहुंचे.

डॉ. शिशिर ने इस बेहद चुनौतीपूर्ण केस को तुरंत अपने हाथ में लिया. बच्चे को 9 दिन तक आईसीयू में रखा गया. बीमारी की गंभीरता को देखते हुए अमेरिका के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. पंकज अग्रवाल से फोन पर सलाह ली गई. इस केस पर वहां बाकायदा रिसर्च भी की गई. लगातार 10 साल तक चले इलाज के दौरान दिल्ली और मुंबई से विशेष प्रोटीन और एल्ब्यूमिन इंजेक्शन मंगाकर लगाए गए. बच्चे को नियमित फिजियोथेरेपी भी दी गई. लंबे इलाज और देखभाल का नतीजा यह है कि आज बच्चा करीब 80 फीसदी तक सामान्य हो चुका है और रोजमर्रा की जिंदगी में आम बच्चों की तरह व्यवहार कर रहा है.

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