किसी AI डाटा सेंटर के लिए पानी और बिजली जरूरी
AI और आधुनिक टेक्नोलॉजी में एक्सपर्ट यामिनी जिन्हें सोशल मीडिया पर टेक दीदी के नाम से जाना जाता है, ने इस विषय पर बातचीत के दौरान कहा कि अधिकांश लोगों को यह जानकारी नहीं है कि AI आधारित डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी का उपयोग किया जाता है. उन्होंने बताया कि डेटा सेंटर लगातार काम करने के दौरान अत्यधिक गर्मी पैदा करते हैं और उन्हें सुरक्षित रूप से संचालित रखने के लिए कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है. यही कारण है कि इन केंद्रों में पानी का उपयोग ज्यादा किया जाता है.
डेटा सेंटरों में होता है साफ पानी का इस्तेमाल
उन्होंने बताया कि चिंता गौतमबुद्ध नगर तो हाईराइज सोसाइटी और इंडस्ट्रियल एरिया के लिए मशहूर है. यहां कई डाटा सेंटर स्थापित हो रहे हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि डेटा सेंटरों में सामान्य या खारे पानी के बजाय साफ और पेयजल का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे समय में जब नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गौतमबुद्ध नगर समेत देश के कई हिस्सों में पेयजल की समस्या पहले से मौजूद है, AI उद्योग की बढ़ती जल आवश्यकता भविष्य में चुनौती बन सकती है. डाटा सेंटर को लगातार बिजली की भी जरूरत होती है और बिजली भी पानी से बनती है. उस हिसाब से देखें तो ये आंकड़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है.
बीत साल में 150 बिलियन लीटर पानी की हुई खपत
यामिनी ने दावा किया कि साल 2025 के दौरान भारत में डेटा सेंटरों की ओर से लगभग 150 बिलियन लीटर पानी का उपयोग किया गया. उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे देश में AI आधारित सेवाओं का विस्तार होगा और नए डेटा सेंटर स्थापित होंगे, पानी की मांग भी उसी अनुपात में बढ़ेगी. गुजरात के जामनगर में निर्माणाधीन बड़े डेटा सेंटर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में ऐसे कई और केंद्र विकसित किए जाएंगे या किया जा रहे हैं और उन्हें लगातार संचालित रखने के लिए बिजली और पानी की की आपूर्ति जरूरी होगी.
छोटी जरूरतों के लिए AI उपयोग भी चिंता का विषय
एक्सपर्ट ने बताया कि आज लोग छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी AI का उपयोग कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग तस्वीरें बनवाना, साधारण ईमेल लिखवाना या सामान्य जानकारी के लिए AI का सहारा लेना आम होता जा रहा है. उनका मानना है कि ऐसे उपयोग से डेटा सेंटरों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है और इनडायरेक्ट पानी की खपत भी बढ़ती है. उन्होंने यह भी कहा कि AI के अंधाधुंध उपयोग के साथ गोपनीयता से जुड़े खतरे भी बढ़ रहे हैं, क्योंकि लोग अपनी निजी तस्वीरें और व्यक्तिगत जानकारी AI प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर रहे हैं.
AI को सहायक बनाएं, विकल्प नहीं
यामिनी का कहना है कि लोगों को AI पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय इसे एक सहायक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए. उन्होंने कहा कि AI इंसानों की रचनात्मकता का विकल्प नहीं बन सकता. अलग-अलग लोग एक ही प्रश्न पूछने पर भी अलग परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, इसलिए इंसानी सोच और रचनात्मक क्षमता की अपनी अलग अहमियत है. भविष्य उन्हीं लोगों का होगा, जो AI से प्रभावी ढंग से काम लेना जानते होंगे. AI को अपना कंपेनियन बनाना चाहिए न कि उसका रिप्लेसमेंट.
भविष्य में जागरूकता अभियान जरूरी
AI के बढ़ते प्रभाव और जल संसाधनों पर उसके संभावित दबाव को देखते हुए यामिनी आशंका जताती हैं कि भविष्य में लोगों को पानी बचाने के लिए AI के सीमित उपयोग को लेकर जागरूक करना पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि जिस तरह आज प्लास्टिक के उपयोग को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, उसी तरह आने वाले समय में AI के जिम्मेदार उपयोग को लेकर भी अभियान चलाने की आवश्यकता पड़ सकती है. उनके अनुसार, यदि डेटा सेंटरों की संख्या लगातार बढ़ती रही और AI का उपयोग हर व्यक्ति तक पहुंच गया, तो जल संसाधनों पर दबाव और अधिक बढ़ सकता है. विशेष रूप से महानगरों में इसका प्रभाव पहले देखने को मिल सकता है.
ग्रामीण क्षेत्रों में अभी सीमित है AI की पहुंच
वर्तमान में AI का उपयोग मुख्य रूप से शहरी और महानगरीय क्षेत्रों तक कुछ ही लेवल तक सीमित है. ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बड़ी संख्या में लोग केवल सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म तक ही सीमित हैं. हालांकि, जैसे-जैसे तकनीक का विस्तार होगा, AI का उपयोग भी तेजी से बढ़ेगा और इसके साथ संसाधनों की मांग भी बढ़ेगी.
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