हरियाणा के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के मानचित्र में कोई बदलाव न करने और सभी 14 जिलों को यथावत रखने का फैसला पहली नजर में कुछ लोगों को निराश कर सकता है। विशेषकर चरखी दादरी, भिवानी, महेंद्रगढ़, जींद, करनाल और पानीपत जैसे जिलों के लोगों को, जो लंबे समय से एनसीआर से बाहर किए जाने की मांग कर रहे थे। उनका तर्क है कि एनसीआर का दर्जा सुविधाओं से अधिक पाबंदियों का कारण बन गया है। इसके बावजूद इन जिलों को एनसीआर में बनाए रखने का फैसला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन जिलों के लोगों की शिकायतें भी वाजिब हैं।
एनसीआर का हिस्सा होने के कारण उन्हें पर्यावरण संबंधी कड़े नियमों, ग्रैप की पाबंदियों, पुराने वाहनों पर प्रतिबंध, निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण और उद्योगों के लिए सख्त मानकों का सामना करना पड़ता है। किसानों पर पराली प्रबंधन का अतिरिक्त दबाव भी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहे तो प्रतिबंधों का बोझ क्यों उठाया जाए। लेकिन किसी क्षेत्र का भविष्य केवल वर्तमान असुविधाओं से तय नहीं होता। सरकार ने संभवतः इसी व्यापक सोच के साथ एनसीआर की मौजूदा सीमाओं को बरकरार रखा है।
एनसीआर का 46% क्षेत्र हरियाणा का
एनसीआर क्षेत्र में हरियाणा का 25,327 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आता है। यह पूरे एनसीआर का 46 फीसदी है। उत्तर प्रदेश के एनसीआर क्षेत्र में नोएडा, ग्रेटर नोएडा के बाद साहिबाबाद तक मेट्रो पहुंच चुकी है लेकिन हरियाणा के गुरुग्राम और फरीदाबाद जिले ही पूरी तरह कवर नहीं हुए हैं। दिल्ली से करनाल तक रैपिड रेल प्रोजेक्ट 2020 से लटका है। वर्तमान में दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ कॉरिडोर प्राथमिकता पर है। मेरठ से गाजियाबाद तक रैपिड रेल चलने लगी है। हरियाणा के हिस्से वाले गलियारों में अब काम शुरू हुआ है। कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेसवे चालू तो हो गया लेकिन इसके साथ जुड़े कई औद्योगिक और लॉजिस्टिक हब पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए हैं। ऐसी परियोजनाओं को समयबद्ध ढंग से पूरा करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
नए अवसर पैदा होंगे, निवेश बढ़ेगा
इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भविष्य की कनेक्टिविटी परियोजनाएं हैं। दिल्ली-एनसीआर का विस्तार अब केवल दिल्ली, नोएडा और गुरुग्राम तक सीमित नहीं है। रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस), ऑर्बिटल रेल कॉरिडोर और आधुनिक हाईवे नेटवर्क जैसी परियोजनाएं करनाल, पानीपत और अन्य शहरों को राजधानी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की दिशा में अहम साबित हो सकती हैं। बेहतर संपर्क से उद्योग, लॉजिस्टिक्स, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे तथा निवेश भी बढ़ेगा। हकीकत यह है कि गुरुग्राम व फरीदाबाद को छोड़ दिया जाए तो हरियाणा के शेष एनसीआर क्षेत्र में अपेक्षित विकास नहीं हुआ है।
लाभ और प्रतिबंधों के बीच संतुलन जरूरी
बेहतर सड़कें, आधुनिक परिवहन, औद्योगिक निवेश, रोजगार और शहरी सुविधाएं समय पर उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि लाभ और प्रतिबंधों के बीच संतुलन नहीं बना तो असंतोष फिर उभर सकता है। हरियाणा के लिए यह फैसला तत्काल राहत के बजाय दीर्घकालिक विकास को प्राथमिकता देने का संकेत है। अब चुनौती यही है कि एनसीआर का दर्जा केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि करनाल, पानीपत, जींद, महेंद्रगढ़ और भिवानी जैसे जिलों के लोगों को भी उसका वास्तविक लाभ मिले। तभी आज की पाबंदियां कल की समृद्धि का आधार बन सकेंगी।
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