Image Slider

कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों का नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय देश के सबसे अनोखे राजनीतिक घटनाक्रमों में से एक बन गया है. लेकिन इस हाई-प्रोफाइल विलय के बाद दिल्ली और कोलकाता के गलियारों में एक बड़ा दिलचस्प सवाल तैर रहा है, क्या संसद के दिग्गज राजनेता अब बंगाल के एक गुमनाम पति-पत्नी का हुक्म मानेंगे, जिन्होंने इस पार्टी को खड़ा किया था? या फिर बागी सांसद अपनी भारी-भरकम संख्या बल के दम पर इस पूरी पार्टी के ही सर्वेसर्वा मालिक बन जाएंगे?

चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया का गठन साल 2023 में बंगाल के उत्तिया कुंडू और उनकी पत्नी शेउली कुंडू ने किया था. आधिकारिक दस्तावेजों में उत्तिया कुंडू पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और उनकी पत्नी शेउली कुंडू कोषाध्यक्ष के पद पर काबिज हैं. लेकिन अब बड़ा सवाल यह है कि क्या टीएमसी के 20 दिगग्ज क्या गुमनाम पति-पत्नी का हुक्म मानेंगे या फिर इस पार्टी पर टीएमसी के बागियों का कब्जा हो जाएगा. आइए समझते हैं कि इस दिलचस्प सियासी मोड़ पर देश का कानून और चुनाव आयोग के नियम क्या कहते हैं.

नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया का गठन साल 2023 में बंगाल के उत्तिया कुंडू और उनकी पत्नी शेउली कुंडू ने किया था. (फाइल फोटो)

कागजी मालिक बनाम विधायी ताकत

भारतीय राजनीति और चुनाव आयोग के नियमों के तहत, किसी भी राजनीतिक दल के दो हिस्से होते हैं. पहला, सांगठनिक विंग जो पार्टी के संविधान और पदाधिकारियों से चलता है, और दूसरा विधायी विंग जो संसद या विधानसभा में मौजूद पार्टी के चुने हुए प्रतिनिधियों जैसे सांसदों औऱ विधायकों से बनता है. इस समीकरण को देखकर साफ है कि कागजों पर भले ही पार्टी कुंडू दंपत्ति की है, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में 20 लोकसभा सांसदों के आने के बाद पार्टी का पूरा वजन और राजनीतिक कद पूरी तरह से बागी गुट के पक्ष में झुक गया है.

क्या कहता है नियम? कैसे बदल सकती है पार्टी की कमान

चुनाव आयोग के नियमों और किसी भी रजिस्टर्ड राजनीतिक दल के आंतरिक संविधान के मुताबिक, कोई भी बाहरी गुट किसी पार्टी में शामिल होते ही रातों-रात उसके पदों पर कब्जा नहीं कर सकता. इसके लिए एक तय कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है. जो ये हैं-

ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने वाली काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व में बागी सांसद सोमवार को लोकसभा स्पीकर से मुलाकात करेंगे.

1. राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक और आपसी सहमति

अक्सर ऐसे विलय पर्दे के पीछे एक बड़ी राजनीतिक ‘डील’ का हिस्सा होते हैं. सूत्रों की मानें तो बागी गुट ने भाजपा के रणनीतिकारों की मदद से इस विलय को अंजाम दिया है. ऐसे में यह पूरी तरह मुमकिन है कि उत्तिया कुंडू और शेउली कुंडू की सहमति से जल्द ही NCPI की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई जाएगी. इस बैठक में पार्टी के संविधान में संशोधन करके बागी सांसदों को बड़े पदों जैसे कार्यकारी अध्यक्ष या संसदीय दल का नेता पर बिठाया जाएगा.

2. लोकतांत्रिक बहुमत से तख्तापलट

यदि भविष्य में कुंडू दंपत्ति और बागी सांसदों के बीच कोई विवाद होता है, तो बागी सांसद पार्टी के भीतर आंतरिक चुनाव या विशेष सत्र बुलाने की मांग कर सकते हैं. चूंकि पार्टी में अब एक बहुत बड़ा और प्रभावी गुट शामिल हो चुका है, इसलिए वे अपने प्रभाव से नए सदस्यों को जोड़कर संगठन के भीतर बहुमत हासिल कर सकते हैं और लोकतांत्रिक तरीके से नए अध्यक्ष का चुनाव कर सकते हैं.

राज्यसभा में 3 सांसदों के इस्तीफे से ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ीं.

क्या बागी फिर से बागी बनेंगे? पर्दे के पीछे का सच

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बागी सांसदों के फिर से बागी बनने यानी NCPI को भी छोड़ने की नौबत नहीं आएगी. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह पूरा खेल ‘संसदीय अस्तित्व’ को बचाने के लिए खेला गया है. उत्तिया कुंडू की NCPI एक पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल थी, जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन हासिल करने के लिए पूरा आसमान था. 20 सांसदों के आने से उनकी पार्टी को रातों-रात राष्ट्रीय स्तर की पहचान मिल गई है.

इसलिए, नियमों के मुताबिक नियंत्रण भले ही शुरुआत में कुंडू दंपत्ति के हाथ में रहे, लेकिन पार्टी का असली रिमोट कंट्रोल और फैसले लेने की ताकत टीएमसी के बागी गुट और उनके पीछे खड़ी बड़ी ताकतों के पास ही रहेगी. कुंडू दंपत्ति को संगठन में सम्मानजनक स्थान देकर बागी गुट इस पूरी पार्टी की कमान व्यावहारिक रूप से अपने हाथ में ले लेगा.

———-

🔸 स्थानीय सूचनाओं के लिए यहाँ क्लिक कर हमारा यह व्हाट्सएप चैनल जॉइन करें।

 

Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Ghaziabad365 || मूल प्रकाशक ||