सोशियोलॉजी की पढ़ाई कर रही एक साधारण-सी लड़की ने जब ग्लैमर की दुनिया में कदम रखा तो उसे खुले दिल से स्वागत नहीं मिला. कभी उसके लुक्स पर सवाल उठे तो कभी वजन को लेकर ताने सुनने पड़े. कई बार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा और यहां तक कह दिया गया कि वह फिल्मों की हीरोइन बनने लायक नहीं है. लगातार मिल रही नाकामियों से उसका आत्मविश्वास जरूर डगमगाया, लेकिन उसने अपने सपनों का साथ नहीं छोड़ा.संघर्षों के बीच उसने खुद को साबित करने की ठानी और फिर एक दिन ऐसा आया जब उसी लड़की के अभिनय का पूरा देश मुरीद हो गया.
नई दिल्ली. बॉलीवुड में अकसर खूबसूरती और ग्लैमर को सफलता की पहली शर्त माना जाता है. इंडस्ट्री में कुछ कलाकार ऐसे भी हैं, जिन्होंने इस धारणा को गलत साबित किया. 7 साल की एक हसीना, जिसको कभी सिर्फ और सिर्फ रिजेशन मिले वो नेशनल अवॉर्ड जीतकर अपनी नई कहानी लिख चुकी है. लेकिन ये सफर बिलकुल भी आसान नहीं था. लोगों के ताने झेले. रिजेक्शन मिला. हीरोइन बनने के सपनों से साथ इंडस्ट्री में आई लेकिन ताने मिले ‘चेहरा देखा है आईने में’.
13 फिल्मों से निकाल दिया जाना, ‘मनहूस’ कहलाना, नाक का ऑपरेशन कराने तक का दबाव और वजन को लेकर मिले भद्दे कॉमेंट्स तक झेले. लेकिन हार नहीं मानी. ये एक्ट्रेस और कोई नहीं बल्कि अपनी ‘कहानी’ खुद लिखने वाली एक्ट्रेस विद्या बालन हैं.
1 जनवरी 1979 को मुंबई के एक तमिल परिवार में जन्मीं विद्या बालन बचपन से ही पढ़ाई में काफी तेज थीं. उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर्स कॉलेज से ससोशियोलॉजी में बैचलर की डिग्री हासिल की. एक्टिंग के प्रति उनके जुनून को देखते हुए उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी. इसके बाद मुंबई यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री भी पूरी की.
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कॉलेज के दिनों के दौरान ही विद्या ने टेलीविजन विज्ञापनों और म्यूजिक वीडियोज में काम करना शुरू कर दिया था. इसी दौरान उन्हें मशहूर टीवी शो ‘हम पांच’ में राधिका का किरदार निभाने का मौका मिला, जिसने उन्हें पहली बार घर-घर में पहचान दिलाई. टेलीविजन के बाद विद्या बालन ने बड़े पर्दे का रुख किया. उन्हें लगा था कि टीवी के बाद ये सफर आसान होगा. लेकिन ये बिलकुल भी आसान नहीं था.
साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें कई प्रोजेक्ट्स साइन करने के बाद भी ऐन वक्त पर बाहर कर दिया गया. एक समय तो ऐसा आया जब उन्हें लगातार 12 फिल्मों से रिजेक्ट किया गया. कुछ निर्देशकों और निर्माताओं ने उन्हें बॉडी शेम कर तीखी आलोचना की. विद्या ने खुद अपने पुराने इंटरव्यू में इस बारे में बात कर चुकी हैं. उन्होंने बताया था कि एक प्रोड्यूसर ने उन्हें सीधे मुंह कह दिया था ‘तुम में हीरोइन बनने वाले लुक्स नहीं हैं.’ ये सब सुनने के बाद वह महीनों तक शीशे में अपना चेहरा देखने से भी कतराने लगी थीं.
लेकिन विद्या ने हार नहीं मानी. उन्होंने खुद को साबित करने का फैसला किया और लगातार ऑडिशन देती रहीं. आखिरकार साल 2005 में उन्हें वह मौका मिला जिसने उनकी जिंदगी बदल दी. फिल्म आई ‘परिणीता’, जिसमें उन्होंने ‘ललिता’ का किरदार निभाया. अपनी स्क्रीन प्रेजेंस के कारण फिल्म को शानदार प्रतिक्रिया मिली और विद्या रातों-रात चर्चा में आ गईं.
इस फिल्म में उनके दमदार, निडर और बेबाक एक्टिंग के लिए उन्हें साल 2011 का बेस्ट एक्ट्रेस का ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ दिया गया. यह उन सभी आलोचकों के मुंह पर एक करारा तमाचा था, जिन्होंने कभी उनके लुक्स की वजह से उन्हें नकारा था. इसके बाद ‘कहानी’, ‘बॉबी जासूस’, ‘तुम्हारी सुलु’ और ‘मिशन मंगल’ जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया कि वह अकेले अपने कंधों पर पूरी फिल्म संभाल सकती हैं. उनकी फिल्मों में महिलाओं को सिर्फ सजावट के तौर पर नहीं, बल्कि कहानी की केंद्रीय शक्ति के रूप में दिखाया गया.
विद्या की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने कभी भी ग्लैमर की दौड़ में खुद को बदलने की कोशिश नहीं की. उन्होंने हमेशा अपनी शर्तों पर काम किया और वही किरदार चुने जिनमें अभिनय की गुंजाइश हो. यही कारण है कि उन्हें कई फिल्मफेयर पुरस्कारों समेत अनेक सम्मान मिले.
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