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मथुरा के गोकुल स्थित पूतना कुंड से जुड़ी इस ग्राउंड रिपोर्ट में धार्मिक आस्था और प्रशासनिक लापरवाही की दो तस्वीरें सामने आती हैं. माना जाता है कि यहीं पर भगवान श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में राक्षसी पूतना का वध किया था, लेकिन आज यह ऐतिहासिक स्थल बदहाली का शिकार है. वर्ष 2014-15 में हुए सौंदर्यीकरण के बावजूद कुंड में गंदा पानी, झाड़ियां और रखरखाव की कमी साफ दिखाई देती है. श्रद्धालु इस स्थिति को देखकर पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन की अनदेखी पर सवाल उठा रहे हैं.

मथुरा: मथुरा के कंस कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ. जन्म के उपरांत ही वासुदेव जी उन्हें टोकरी में रखकर यमुना पार गोकुल ले गए और नंद बाबा के घर छोड़कर कन्या को वहां से ले आए. कृष्ण की छठी के दिन कंस ने अपनी सबसे बलशाली राक्षसी, जिसे पूतना के नाम से जाना जाता था, को उन्हें मारने के लिए भेजा. उसने सुंदर स्त्री का रूप धारण कर अपने स्तनों में विष लगाकर कृष्ण को दूध पिलाकर मारने की योजना बनाई. लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से पूतना का वध कर दिया. द्वापर काल का यह कुंड आज भी गोकुल में मौजूद है, जिसे पूतना कुंड के नाम से जाना जाता है.

भगवान कृष्ण ने किया था पूतना का वध

कहा जाता है कि महज 6 दिन के शिशु अवस्था में ही कृष्ण ने पूतना का वध कर ब्रज में राक्षसों से मुक्ति की शुरुआत कर दी. उन्होंने ब्रजवासियों को यह संदेश दिया कि वे कोई साधारण बालक नहीं हैं. कंस ने अपनी सबसे बलशाली राक्षसी पूतना को कृष्ण के वध के लिए भेजा था. छह दिन के नन्हे बालक को मारने के लिए पूतना ने सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और अपने स्तनों में विष लगाकर कृष्ण को दूध पिलाने आई. लेकिन 6 दिन की आयु में ही कृष्ण ने पूतना का वध कर दिया और यह संदेश दिया कि जल्द ही मथुरा और ब्रजधाम कंस के अत्याचारों से मुक्त होने वाले हैं. इसके बाद कंस द्वारा भेजे गए अनेक राक्षसों जैसे अघासुर, बकासुर आदि का भी उन्होंने वध कर उन्हें मोक्ष प्रदान किया.

पूतना कुंड

गोकुल की ओर लगभग 30-40 कदम चलते ही लाल पत्थर से बना एक स्थल दिखाई देता है, जिसे पूतना कुंड कहा जाता है. माना जाता है कि यहीं पर करीब 5,200 वर्ष पहले पूतना नाम की राक्षसी ने छठी के दिन भगवान कृष्ण को दूध की जगह विष पिलाने का प्रयास किया था.

50 लाख की लागत से पूतना कुंड का किया गया था कायाकल्प

वर्ष 2014-15 में लगभग 50 लाख रुपये की लागत से इस पूतना कुंड का कायाकल्प किया गया था, लेकिन करीब साढ़े तीन साल में ही यह पुनः जर्जर स्थिति में पहुंच गया है. सड़क किनारे पर्यटन विभाग का साइन बोर्ड भी अब सफेद रंग से रंगा हुआ है, हालांकि उस पर अब भी पूतना कुंड का उल्लेख दिखाई देता है. कुंड के चारों ओर लाल पत्थर की बेंचें बनी हुई हैं, घूमने के लिए फुटपाथ और विश्राम के लिए पत्थर की बारादरी भी बनाई गई है. कभी यह कुंड विशाल क्षेत्र में फैला हुआ था, लेकिन सौंदर्यीकरण के बाद यह लगभग दो-ढाई सौ वर्गगज तक सीमित हो गया है.

बदहाल स्थिति में है कुंड

पर्यटन विभाग ने सौंदर्यीकरण के बाद इसकी देखरेख पर ध्यान नहीं दिया. यहां भरा पानी दूषित प्रतीत होता है और किनारों पर विलायती बबूल उगने लगे हैं. श्रद्धालु इसकी स्थिति देखकर पर्यटन विभाग और नगर पंचायत प्रशासन की लापरवाही को सहज ही समझ सकते हैं.

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Vivek Kumar

विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें

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