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नई दिल्ली: 10 अगस्त 2022 की वो तारीख जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक बीजेपी से नाता तोड़कर बिहार में आरजेडी और कांग्रेस को साथ लेकर नई सरकार बनाई थी. इस यूटर्न के साथ ही नीतीश कुमार ने साफ संकेत दे दिया था कि वो 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सत्ता से बाहर करने का प्रयास करेंगे. इसके लिए नीतीश कुमार खुद आगे बढ़े और घूम-घूमकर तमाम विपक्षी पार्टियों को 23 जून 2023 को पहली बार पटना में एकजुट किया. आगे चलकर विपक्षी दलों की इसी एकजुटता का नाम ‘इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस’ यानी इंडिया गठबंधन पड़ा.

सबकुछ बढ़िया चल रहा था. इंडिया गठबंधन से मुकाबले के लिए 10 साल में पहली बार एनडीए घटकदलों की भी बैठक बुलाई गई. तभी 28 जनवरी 2024 की वो तारीख जब नीतीश कुमार ने एक और यूटर्न लिया और विपक्षी एकता का सारा खेल बदल गया. इसी दिन नीतीश कुमार अपनी ही मेहनत से बनाए गए इंडिया गठबंधन से खुद ही अलग हो गए. 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार दोबारा एनडीए में आ गए और बीजेपी के साथ मिलकर बिहार में सरकार बना ली. किसी को समझ में ही नहीं आया कि इंडिया गठबंधन के अंदर ऐसा क्या हुआ कि नीतीश कुमार को एक बार फिर से एनडीए में आना पड़ा.

नीतीश कुमार के इंडिया गठबंधन से अलग होने की कहानी अब तक सीक्रेट बनी थी. लेकिन अब इससे पर्दा हट गया है. यह खुलासा जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष और तमाम विपक्षी नेताओं के साथ मीटिंग में नीतीश कुमार के साथ मौजूद रहने वाले संजय कुमार झा ने किया है, इसलिए इसकी विश्वसनीयता पर भी संदेह होने की गुंजाइश नहीं बचती है.

‘ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने इंडिया गठबंधन को बर्बाद किया’

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा- ‘दो लोगों ने इंडिया गठबंधन का सत्यानाश कर दिया, मैं ऑन रिकॉर्ड कह रहा हूं उनके नाम ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल हैं. गठबंधन के अंदर आम सहमती बनी थी कि नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन के संयोजक बनेंगे. ये दोनों शायद एक प्लान के तहत मीटिंग में आए और कहा कि इंडिया गठबंधन का संयोजक किसी दलित को होना चाहिए. दोनों ने एक सुर में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे साहब का नाम प्रपोज कर दिया. ममता और केजरीवाल के इतना कहते ही कांग्रेस बैकफुट पर आ गई.’

जेडीयू के राज्य सभा सांसद संजय झा ने यह भी दोहराया कि नीतीश कुमार कभी भी इंडिया गठबंधन के संयोजक बनने के लिए बेचैन नहीं थे. वह तो केवल सबको एक प्लेटफॉर्म पर ला रहे थे. लेकिन इस कदम को नाकाम कर दिया गया.

उन्होंने आरोप लगाया कि इंडिया ब्लॉक में कोई प्लान या विजन तो था नहीं, एकजुटता भी नहीं थी. क्षेत्रीय पार्टियों को लगा कि कांग्रेस सिर्फ कुछ राज्यों में ही पॉलिटिक्स करती है और इससे उन पर ज्यादा असर नहीं पड़ता. लेकिन खासकर ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने इंडिया गठबंधन को व्यक्तिगत तौर पर बर्बाद कर दिया.

‘वाजपेयी और आज के हालात में फर्क है’

इसी इंटरव्यू में संजय झा से पूछा गया कि अभी नरेंद्र मोदी की सरकार सहयोगी पार्टियों पर निर्भर है, फिर भी हमें अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने जैसा सरकार में गठबंधन दबाव नहीं दिखता. ऐसा लगता है कि गठबंधन सहयोगियों के लिए बीजेपी/संघ के मुख्य मुद्दों को अलग नहीं रखा जाता.

इसके जवाब में संजय झा ने कहा कि उन दिनों (वाजपेयी सरकार) 24 पार्टियां थीं. आज कम्युनिकेशन है. अगर हमारे पास कोई राज्य का मुद्दा होता है, तो उसे सुलझा लिया जाता है. अगर कोई राष्ट्रीय मुद्दा होता है, तो सलाह-मशविरा होता है. महिला आरक्षण बिल के लिए हमसे सलाह ली गई थी. बिहार के नतीजों के बाद पिछली मीटिंग में नीतीश कुमार की तारीफ हुई थी. एनडीए के सांसद के एक-दूसरे से मिलने का एक सिस्टम है. हो सकता है कि यह पुराना वाजपेयी मॉडल न हो, लेकिन हमारे पास ऐसे मुद्दे नहीं हैं, जिनसे हमें असहज महसूस हो. अगर नीतीश कुमार के पास कोई मुद्दा होता है, तो हम बात करते हैं और उसे सुलझाते हैं.

परिवार के कब्जे के चलते टूट रहीं क्षेत्रीय पार्टियां

वहीं संजय झा से जब मौजूदा दौर में क्षेत्रीय पार्टियों के टूटने और अस्तित्व खत्म होने से जुड़ा सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह चिंता की बात है. कई रीजनल पार्टियां फैमिली पार्टियां बन गईं, जिससे वे टूटने लगीं. जेपी आंदोलन के समाजवादी नेताओं ने विचारधारा से शुरुआत की, फिर जाति के नेता बन गए, फिर एक फैमिली की और फिर टूटना शुरू हो गया. नीतीश कुमार ने सभी सोशलिस्ट पार्टियों को एक साथ लाने की बहुत कोशिश की और इसके लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया. मुझे याद है उन्होंने एक मीटिंग बुलाई थी, जिसमें मुलायम सिंह यादव ने कहा था, ‘तुम्हारा झंडा और नाम रहेगा, सब बस एक हो जाओ.’ लेकिन सबको लगा कि पार्टी ने उनके एसेट्स, प्रॉपर्टी और बैंक अकाउंट्स को पर्सनलाइज कर दिया है.

उन्हें हैरानी हुई कि एक होने का क्या मतलब है. सब इससे दूर भाग गए. शायद हम अब तक अकेली ऐसी पार्टी हैं जिसने ऐसा नहीं किया है और हम भविष्य में भी नहीं करेंगे. 15 साल से लोग लिख रहे हैं कि यह पार्टी खत्म हो जाएगी लेकिन ऐसा नहीं होगा, क्योंकि नीतीश कुमार की लेगेसी को मिटाया नहीं जा सकता.

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