कहानी
फिल्म दीपू (मिहिर गोडबोले) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक बहुत ही मासूम और प्यारा बच्चा है, जो एक बड़े शहर की भागदौड़ से दूर रहता है. दीपू के पिता का एक नए शहर में ट्रांसफर हो जाता है, जिससे उसे अपना पुराना स्कूल, पुराने दोस्त और पुराना माहौल छोड़ना पड़ता है. किसी भी बच्चे के लिए नए शहर में नए स्कूल में जाना आसान नहीं होता और दीपू के साथ भी ऐसा ही है. शुरू में उसके नए क्लासमेट उसे थोड़ा अलग-थलग रखते हैं. अपने नए स्कूलमेट्स के बीच अपनी जगह बनाने और उन्हें इम्प्रेस करने के लिए, दीपू एक दिन एक अनोखा दावा करता है. वह अपने दोस्तों को गंभीरता से बताता है कि उसके घर में रहने वाला आम सा दिखने वाला बूढ़ा आदमी (जैकी श्रॉफ) कोई आम बूढ़ा आदमी नहीं है. दीपू का दावा है कि उसके दादाजी असल में एक सीक्रेट ‘सुपरहीरो’ हैं, जो आधी रात को स्पेसशिप में आने वाले खतरनाक एलियंस से चुपके से लड़ते हैं. दीपू अपने दोस्तों को कई कहानियां सुनाता है कि कैसे उसके दादाजी ने इन स्पेस दुश्मनों से धरती और इंसानों को बचाने के लिए बार-बार अपनी जान जोखिम में डाली.
दीपू की दिलचस्प और जादुई कहानियां सुनकर, स्कूल के कुछ मासूम बच्चे उस पर पूरी तरह यकीन कर लेते हैं और उसे बचाने वाला मानने लगते हैं. इस बीच, क्लास के कुछ चालाक और शरारती बच्चे दीपू की कहानियों पर यकीन कर लेते हैं, उन्हें सरासर झूठ और मनगढ़ंत बातें मानते हैं. वे दीपू के घर जाकर उसके दादाजी के ‘सुपरहीरो’ होने के दावों का पर्दाफाश करने का फैसला करते हैं. दीपू की कहानी के मुताबिक, उसके दादाजी अभी अपनी जिंदगी के सबसे बड़े और आखिरी सीक्रेट मिशन पर काम कर रहे हैं. एलियंस धरती पर एक बहुत बड़ा और खतरनाक हमला करने वाले हैं और सिर्फ उसके दादाजी ही उन्हें रोक सकते हैं. यहीं से कहानी का असली रोमांच और सस्पेंस शुरू होता है. क्या दीपू की कहानी सच है? क्या सच में यूनिवर्स के दूसरे कोने से एलियंस धरती पर आ रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल- क्या झुकी हुई पीठ और सफेद बालों वाले वह आम दादाजी सच में सुपरहीरो हैं या यह सिर्फ एक बच्चे की मासूम कल्पना और अपने अकेलेपन को दूर करने का एक तरीका है? इन सभी खूबसूरत और इमोशनल सवालों के जवाब आपको सिनेमा के बड़े पर्दे पर मिलेंगे, जो आपको इमोशंस की एक बिल्कुल अलग और जादुई दुनिया में ले जाएंगे.
एक्टिंग
यह फिल्म देखने के बाद आपको जग्गू दादा से एक बार फिर प्यार हो जाएगा. असल जिंदगी में जैकी श्रॉफ अपनी बेफिक्र पसंद और कूल अंदाज के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस फिल्म में वे अपनी असली पर्सनैलिटी से बिल्कुल उलटे दिखते हैं. उन्होंने एक बूढ़े दादाजी का रोल किया है जिनकी बॉडी लैंग्वेज, धीमी चाल, आंखों में बेबसी और अपने पोते के लिए बेइंतहा प्यार आपकी आंखों में आंसू ला देगा. वे पर्दे पर जितने आम दिखते हैं, उनकी एक्टिंग भी उतनी ही जबरदस्त है. दिलचस्प बात यह है कि असल जिंदगी में पर्यावरण से प्यार करने वाले और हमेशा एक छोटा सा ऑर्गेनिक पौधा साथ रखने वाले जैकी श्रॉफ का यह सिग्नेचर स्टाइल फिल्म में भी दिखता है. इस फिल्म के साथ ही उन्होंने बड़े पर्दे पर सुपरहीरो होने की परिभाषा हमेशा के लिए बदल दी है.
वहीं, चाइल्ड एक्टर मिहिर गोडबोले ने जैकी श्रॉफ के पोते के रूप में शानदार काम किया है. उनकी मासूमियत, डायलॉग डिलीवरी और स्क्रीन प्रेजेंस इतनी दमदार है कि वह जैकी श्रॉफ जैसे लेजेंडरी एक्टर पर कभी भारी नहीं पड़ते. वह कई सीन में दर्शकों को हंसाते हैं, जबकि फिल्म के दूसरे हाफ में उनकी एक्टिंग उन्हें रुला देती है. दोनों की ऑन-स्क्रीन दादा-पोते वाली केमिस्ट्री फिल्म की सबसे बड़ी हाईलाइट है. सहर्ष शुक्ला फिल्म में एक एलियन का रोल कर रहे हैं, लेकिन यह कोई डरावना, हॉलीवुड-स्टाइल एलियन नहीं है. वह इस किरदार को मजेदार, कॉमिक और क्यूट तरीके से निभाते हैं, जिसे देखकर बच्चे खासकर थिएटर में चीयर करेंगे.
फिल्म में बॉलीवुड की बहुत खूबसूरत एक्ट्रेस भाग्यश्री ने छोटा लेकिन दमदार और प्यारा रोल किया है. उनकी मौजूदगी स्क्रीन पर एक अलग ही गर्मजोशी लाती है. वहीं, प्रतीक बब्बर ने एक और दिलचस्प किरदार, एलियन को ईमानदारी और सटीकता के साथ निभाया है. बाकी सपोर्टिंग कास्ट ने भी बहुत अच्छी, नेचुरल परफॉर्मेंस दी है, जो छोटे शहर के माहौल को दिखाती है.
डायरेक्शन
इस फिल्म के असली कैप्टन और मास्टरमाइंड मनीष सैनी हैं, जिन्होंने न सिर्फ इसे डायरेक्ट किया बल्कि इसकी कहानी भी लिखी. मनीष सैनी को फिल्म इंडस्ट्री में किसी पहचान की जरूरत नहीं है, वह अपने काम के लिए पहले ही तीन बार मशहूर नेशनल अवॉर्ड जीत चुके हैं. उनके नेशनल अवॉर्ड जीतने का क्रेडेंशियल इस फिल्म में भी साफ दिखता है. मनीष ने बॉलीवुड की रूटीन और घिसी-पिटी कमर्शियल फिल्मों से हटकर कुछ बिल्कुल नया, ओरिजिनल और भरोसेमंद बनाने की कोशिश की है. लंबे समय से, इंडियन सिनेमा में बच्चों और पूरे परिवार के लिए साफ-सुथरी फिल्में बनना लगभग बंद हो गया था. इस सूखे के दौर में मनीष सैनी ‘द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो’ के साथ ताजी हवा के झोंके की तरह आए हैं. उन्होंने एक बहुत ही मुश्किल इंसानी भावना को स्क्रीन पर उतारा है, उसे सादगी और फैंटेसी के साथ मिलाया है, जो उनकी बेहतरीन राइटिंग काबिलियत का सबूत है.
सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसके मूड के हिसाब से ठीक ठाक है. कैमरा दुनिया को देखने के बच्चे के नजरिए को खूबसूरती से कैप्चर करता है. घर के अंदर के सीन, दादाजी के कमरे का सस्पेंस वाला माहौल और स्कूल की वाइब्रेंट दुनिया, सभी को चमकीले और वार्म रंगों से दिखाया गया है. हालांकि फिल्म का बजट हॉलीवुड की सुपरहीरो फिल्मों जितना बड़ा नहीं है, इसलिए टेक्निकली ये उस लेवल की फिल्म नहीं है.
म्यूजिक
फिल्म का म्यूजिक कहानी की भावना के साथ सिंक में है. बैकग्राउंड स्कोर बच्चों की क्यूरिऑसिटी, उनकी जिज्ञासा को दिखाता है और इमोशनल सीन के दौरान बजने वाली मधुर धुनें फिल्म के असर को और बढ़ाती हैं. फिल्म का मेन टाइटल ट्रैक बहुत कैची है और थिएटर से निकलने के बाद भी आपके दिमाग में रहता है.
कमियां
कोई भी सिनेमैटिक काम 100% परफेक्ट नहीं हो सकता और यही बात इस फिल्म पर भी लागू होती है. पहले हाफ में कुछ सीन ऐसे हैं जो थोड़े खिंचे हुए और एक्स्ट्रा लगते हैं. फिल्म की रफ्तार को और क्रिस्प बनाने के लिए स्कूल के कुछ सीन को एडिटिंग टेबल में थोड़ा छोटा किया जा सकता था. क्योंकि, यह फिल्म मुख्य रूप से एक बच्चे के नजरिए और फैंटेसी पर आधारित है, इसलिए कुछ जगहों पर लॉजिक और असलियत कुछ खो जाती है. हालांकि, फिल्म का मेन मैसेज इतना मजबूत है कि दर्शक इन छोटी-मोटी कमियों को आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं.
अंतिम फैसला
‘द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो’ बच्चों की आम एंटरटेनमेंट फिल्म नहीं है. एक्शन या रोमाटिंक जॉनर वालों को शायद ही यह फिल्म पसंद आए, क्योंकि इस फिल्म को पूरी तरह से बच्चों के लिए बनाया गया है. यह फिल्म हमें दिखाती है कि जो बुजुर्ग अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, वे हमारे समाज और हमारे बच्चों के लिए किसी जादुई सुपरहीरो से कम नहीं हैं, क्योंकि उनके पास अनुभव का खजाना और प्यार की वह ताकत है जो दुनिया की कोई भी मॉडर्न टेक्नोलॉजी हमें नहीं दे सकती. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 2.5 स्टार.
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