मेरठ ऐसा शहर रहा है, जिसने देश को कई बड़े शायर दिए. कुछ लोग इस शहर को अब शुष्क शहर बता देते हैं लेकिन इस शहर की फिजाओं में गीत, गजलों और शायरियों की फिज़ां तैरा करती थी. कुछ बात तो वहां की मिट्टी में है ही. बशीर बद्र 80 के दशक में देश के बड़े शायरों में शुमार हो चुके थे. मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में प्रोफेसर थे. छात्रों के बीच लोकप्रिय. देश विदेश में मुशायरों में जाकर वाहवाही लूटने वाले.
मेरठ में उनका घर और दंगे
उनका घर मेरठ में मेरे घर के पास ही था. आवास विकास की फैली हुई शास्त्रीनगर कॉलोनी. डी ब्लॉक के करीब उनका एमआईजी मकान. जहां उनका होना एक जमाने में शहर की शान और पहचान दोनों थी. 87 के दंगों में जब दंगाइयों ने उनके मकान को भी नहीं छोड़ा तो हमेशा के लिए शहर छोड़ दिया. भोपाल चले गए. आखिरी सांस तक वहीं मन लगाने की कोशिश करते रहे. हालांकि मेरठ हमेशा दिल में रहा. क्योंकि ये शहर उनकी पहचान के साथ जो चस्पां हो चुका था.
बदलते मेरठ पर उनका वो शेर
बेशक उर्दू शायरी ने अपनी सबसे प्यारी आवाज़ों में एक को खो दिया. उनकी शायरी ने मोहब्बत, तन्हाई, इंतज़ार और ज़िंदगी के गहरे ज़ख़्मों को शब्द दिए. खूुबसूरत शब्दों में पिरोई उनकी भावनाएं हमेशा पीढ़ियों के दिलों में ज़िंदा रहेंगी. अपने शहर मेरठ से रुखसत होते हुए या उससे कुछ पहले उन्होंने इस शहर के बदलते मिजाज पर एक शेर लिखा, जो बहुत ज्यादा चर्चित हुआ
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
ये मेरठ के दंगों को लेकर ही लिखा गया था. डॉ. बशीर बद्र 15 फरवरी 1936 को फैजाबाद में पैदा हुए थे. 91 साल की उम्र में उनका लंबी बीमारी के बाद भोपाल में इंतकाल हो गया. वह बेहतरीन शख्स थे. मुलायमित से व्यवहार करने वाले मृदुभाषी.. इंसानियत और भाईचारे में यकीन रखने वाले.
80 के दशक तक वो देश के जाने माने शायर के तौर पर जगह बना चुके थे लेकिन मेरठ के स्थानीय कवि सम्मेलनों और साहित्यिक प्रोग्राम्स में उनकी मौजूदगी अक्सर देखने को मिलती थी. कोई घमंड नहीं. कोई दुराव छिपाव नहीं. यकीनन तब वो मेरठ की शान कहे जाते थे.
बाद में 1999 में साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया.उनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर था. वो आम आदमी के शायर रहे. उनके बारे में ये भी कहा जा सकता है कि उन्होंने उर्दू साहित्य में शायरी और गजलों को एक नई शैली और लहजा दिया.
मेरठ दंगों को कभी नहीं भूल पाए
जब मेरठ में 1987 में दंगे हुए तो वहां वो शास्त्रीनगर में रहते थे. ये मेरठ का ऐसा दंगा था, जिसकी आग में ये शहर रह-रहकर 03 महीने झुलसता रहा. 100 से ज्यादा लोग मारे गए.
बशीर बद्र को यकीन था कि इन दंगों में वो महफूज रहेंगे लेकिन उसमें उनका घर जला दिया गया. उन्हें बचकर वहां से निकलना पड़ा. हालांकि वो फिर कभी वहां नहीं लौटे. इस घटना ने उन्हें बड़ा सदमा दिया. उन्होंने उसी मनोस्थिति में लिखा,
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में.”
हालांकि इस हादसे के उलट, दूसरी ओर इंसानी भाईचारे की मिसाल भी देखने को मिली, जब बशीर बद्र के घर और उनके परिवार को बचाने के लिए उनके पड़ोसी सामने आए.
मेरठ कॉलेज के लोकप्रिय उर्दू टीचर थे
तब वो मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग के हेड थे. वहां के लोकप्रिय शिक्षकों में थे. हालांकि बाद में ये नौकरी भी छोड़ दी. बद्र ने कई किताबें लिखीं. वह ऐसे शायर रहे जिनके शेरों का इस्तेमाल सांसद और मंत्री संसद में अपने भाषणों में सबसे ज्यादा करते रहे हैं. ये इतने सामयिक होते थे कि हर बार मौजूं लगते थे. हालांकि पिछले कुछ सालों से उनकी याददाश्त भटकने लगी थी. डिमेंशिया ने घेर लिया था. तबीयत खराब हो चुकी थी. साथ ही सक्रियता भी. कई सालों से उन्होंने किसी सार्वजनिक प्रोग्राम में शिरकत नहीं की थी.
उनके कुछ मशहूर शेर
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
—
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
—
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
—
न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
—
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
आप बहुत याद आएंगे बशीर साहब. आपका वो शाइस्तगी से मुस्कुराता चेहरा और चश्मे के पीछे से चमकती हुई आंखें… खनकती और शब्दों के साथ थिरकती आवाज. अलविदा
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