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Rasheed Kidwai Article: पश्चिम बंगाल में पशुओं के सार्वजनिक वध पर सुभेंदु अधिकारी सरकार की सख्ती के बीच ईद-उज़-ज़ुहा से पहले प्रदेश के कई मुस्लिम मौलवियों और प्रतिष्ठित हस्तियों ने अपने समुदाय के बाशिंदों से गाय की कुर्बानी न देने और गोमांस न खाने की गुजारिश की है. इससे देश में गोवध पर प्रतिबंध को लेकर चर्चा एक बार फिर चल पड़ी है. ऐसे में इसके ऐतिहासिक संदर्भों को जानना भी मुनासिब रहेगा.

भारत में मुस्लिमों के एक वर्ग द्वारा स्वेच्छा से गोमांस त्यागने की पहल कोई नई बात नहीं है. आज से करीब 107 साल पहले भी ऐसा हो चुका है. 1919 में महात्मा गांधी की अगुवाई में शुरू हुए खिलाफत आंदोलन के दौरान मौलाना मोहम्मद अली, शौकत अली, हकीम अजमल खान, मियां हाजी अहमद खत्री, मियां छोटानी, मौलाना अब्दुल बारी और मौलाना हुसैन अहमद मदनी जैसे राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं ने गोवध से परहेज करने का विचार सामने रखा था.

उस दौर में एक महत्वपूर्ण अभियान ख्वाजा हसन निजामी ने चलाया था. वे एक नामी सूफी संत थे और उन्होंने 1921 में ‘तर्क-ए-गोकुशी’ (गोवध से परहेज) नामक किताब लिखी थी. चिश्तिया सिलसिले के अनुयायियों में काफी मशहूर रहे निजामी ने मुगल बादशाह अकबर के उस फरमान का जिक्र किया था, जिसमें रोजाना के उपभोग या ईद-उज़-ज़ुहा पर सामूहिक मजहबी रस्म के तौर पर गायों के कत्ल पर रोक लगाई गई थी.

इन प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरुओं और शख्सियतों ने अपने-अपने अनुयायियों से गोकुशी से दूर रहने की अपील की थी. हालांकि उन्हें अपने ही समुदाय के भीतर मौलाना अबुल आला मौदूदी जैसे कट्टरपंथी मजहबी उलेमा की सख्त खिलाफत का सामना करना पड़ा. दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी बातों को सही साबित करने के लिए कुरान और पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं के आधार पर लंबे-चौड़े फतवे भी जारी किए थे.

मुस्लिम विद्वान करते आए हैं गोवध पर प्रतिबंध की मांग…

विडंबना यह है कि जहां एक तरफ अनेक मुस्लिम विद्वान और नेता गोरक्षा को हिंदुओं का मौलिक अधिकार मानते हुए वर्षों से गोवध पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध के हिमायती रहे हैं, वहीं सरकारें इसको लेकर हिचकिचाती रही हैं. दरअसल, अनेक मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि गोरक्षा के मुद्दे का राजनीतिकरण कर इसका इस्तेमाल मुसलमानों को निशाना बनाने के हथियार की तरह किया गया है. इसीलिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद से जुड़े मौलाना महमूद मदनी इस पर एक केंद्रीय कानून बनाने की मांग करते हैं, ताकि उनके शब्दों में कहें तो, ‘इस भूत से पीछा छूट सके.’

भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद में रिसर्च फेलो रहीं डॉ. नाज़िमा परवीन ने गोवध और सांप्रदायिक दंगों पर काफी अकादमिक रिसर्च की है. संविधान सभा (1948-49) में इस विषय पर हुई बहस का जिक्र करते हुए डॉ. परवीन बताती हैं कि उस समय मुस्लिम नेता हिंदुओं के लिए गोरक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के पक्ष में थे. लेकिन बाद में गोरक्षा को राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में शामिल किया गया. उनके मुताबिक, यह हैरानी की बात है कि कांग्रेस और जनसंघ (आज की भाजपा का पूर्ववर्ती अवतार) के वे प्रतिनिधि, जो गोरक्षा कानून के समर्थक थे, भी इसे हिंदुओं का मौलिक अधिकार बनाने पर जोर नहीं दे सके. देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी केंद्रीय कानून के पक्ष में नहीं थे. वे चाहते थे कि इस बारे में फैसला करने का अधिकार राज्यों के पास रहे.

भारत में गोरक्षा हमेशा से एक संवेदनशील विषय रहा है. फोटो- पीटीआई

बाबर ने हुमायूं से कहा था- गोकुशी मत होने देना:

संवैधानिक कानून के मशहूर विशेषज्ञ फ़ैजान मुस्तफा का कहना है कि गो-हत्या पर फैसला लेते समय पर्यावरण और पारिस्थितिकी से जुड़े कई पहलुओं पर भी गोर करना चाहिए. वे सवाल उठाते हैं कि जो गायें दूध देना बंद कर देती हैं, उनका क्या होगा? हालांकि वे यह भी कहते हैं कि देश के अधिसंख्य मुसलमान लंबे समय से गोवध पर प्रतिबंध के पक्ष में रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘बाबर ने हुमायूं को दी गई वसीयत में लिखा था कि गोकुशी मत होने देना, क्योंकि इससे हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी.’

पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान का मानना है कि नया कानून बनाने से ज्यादा जरूरी मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करना है. वे कहते हैं, ‘यह केंद्र का विषय नहीं है. राज्यों में पहले से ही इसके खिलाफ कड़े कानून हैं और सजा का प्रावधान भी है. मौजूदा कानून काफी हैं, लेकिन वही लागू नहीं हो पा रहे.’

जब मजबूत हुई थी हिंदू-मुस्लिम एकता :

हालांकि, 1919 के दौर में मुस्लिम उलेमाओं की मुख्य चिंता गायों के कत्ल पर रोक के कानूनी पहलू को लेकर उतनी नहीं थी. उस समय यह मुद्दा राजनीति का केंद्रीय विषय बन चुका था. पी.सी. घोष ने अपनी किताब ‘द डेवलपमेंट ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस : 1892-1909’ में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन का एक कथन उद्धृत किया है. लैंसडाउन ने कहा था कि गोरक्षा आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ‘तर्क-वितर्क करने वाली एक बेकार की संस्था से बदलकर स्थानीय समाज के सबसे खतरनाक तत्वों का समर्थन प्राप्त एक असल सियासी ताकत में बदल दिया है.’

गोवध के विरोध में खिलाफत आंदोलन के नेताओं और ख्वाजा हसन निजामी की अपीलों को देश के लगभग हर हिस्से में व्यापक समर्थन मिला था. बॉम्बे के मियां हाजी अहमद खत्री और मियां छोटानी ने कई बार सैकड़ों गायों को अपने ही समुदाय के लोगों से बचाकर हिंदुओं को लौटाया था. इस पहल ने हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत किया था और इसी ने उस दौर के खिलाफत आंदोलन की सफलता की राह भी प्रशस्त की थी.

दिलचस्प बात यह है कि निजामी ने अपनी किताब ‘तर्क-ए-गोकुशी’ में मौलाना मौदूदी जैसे विरोधियों की दलीलों को भी चुनौती दी है. मौदूदी का कहना था कि अगर आज हिंदुओं की भावनाओं के मद्देनजर गायों का कत्ल रोक दिया गया तो कल यह मांग भी उठेगी कि मुसलमान अजान देना भी बंद कर दें. इसके जवाब में सूफी संत निजामी ने कहा कि भारत में मुस्लिम शासकों का राज खत्म होने के बाद भी हिंदुओं ने गोवध के अलावा मुस्लिमों की किसी भी दूसरी धार्मिक परंपरा को रोकने की कोशिश नहीं की. निजामी ने कुरान की उस आयत का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया है: ‘अल्लाह को न तुम्हारे कुर्बानी के मांस की जरूरत है और न खून की. उस तक केवल तुम्हारा ईमान और नीयत पहुंचती है.’

इस्लामिक स्टडीज के विद्वान प्रो. अख्तरुल वासी कहते हैं कि भारतीय मुसलमानों ने एक सदी से स्वेच्छा से गोमांस खाना छोड़ रखा है. बकौल वासी, ‘मानव इतिहास में शायद यह एक अनोखी मिसाल है, जब लाखों लोगों ने दूसरे समुदाय की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए स्वेच्छा से गो-हत्या त्याग दी.’

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