बॉलीवुड में स्टार किड्स का डेब्यू हमेशा से मीडिया और दर्शकों के बीच उत्सुकता का विषय रहा है. ठीक 25 साल पहले आज ही के दिन यानी 25 मई 2001 को 1970 और 1980 के दशक के मशहूर सुपरस्टार जीतेंद्र के बेटे तुषार कपूर ने सिल्वर स्क्रीन पर कदम रखा था. उनकी पहली फिल्म ‘मुझे कुछ कहना है’ ने रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया था, जिससे वह रातोंरात एक कल्ट रोमांटिक स्टार बन गए थे. हालांकि, इस ऐतिहासिक डेब्यू के बाद तुषार का करियर तेजी से नीचे गिरने लगा और उन्होंने कई फ्लॉप फिल्में दीं. हालत यहां तक पहुंच गई कि सोलो हीरो के तौर पर फेल होने के बाद तुषार को मल्टी-स्टारर फिल्मों में सपोर्टिंग रोल तक ही सीमित रहना पड़ा.
नई दिल्ली. स्टार किड्स के लिए बॉलीवुड की चमक-दमक वाली दुनिया में आना आसान है, लेकिन उस स्टारडम को बनाए रखना उतना ही मुश्किल है. जब सतीश कौशिक की डायरेक्ट की हुई फिल्म ‘मुझे कुछ कहना है’ 25 मई 2001 को थिएटर में रिलीज हुई, तो फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर से लेकर आम दर्शकों तक, सभी को लगा कि बॉलीवुड को अपना अगला बड़ा रोमांटिक सुपरस्टार मिल गया है. इस फिल्म से अपना करियर शुरू करने वाले तुषार कपूर, इंडस्ट्री के सबसे बड़े कल्ट स्टार जीतेंद्र की विरासत को आगे बढ़ाने वाले थे. फिल्म के गानों और मासूम लव स्टोरी ने थिएटर में ऐसा जादू किया कि यह ब्लॉकबस्टर बन गई. (तस्वीर बनाने में एआई की मदद ली गई है.)
2001 में रिलीज हुई ‘मुझे कुछ कहना है’ तेलुगु फिल्म ‘टोली प्रेमा’ की ऑफिशियल रीमेक थी. इस फिल्म में करीना कपूर के अपोजिट तुषार कपूर थे, जो इंडस्ट्री में अपना नाम बनाने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे. हिमेश रेशमिया के म्यूजिक ने फिल्म को एक अलग लेवल पर पहुंचा दिया. ‘मुझे कुछ कहना है…’ और ‘रब्बा मेरे रब्बा…’ जैसे गाने हर ऑटोरिक्शा, रेडियो स्टेशन और टीवी चैनल पर गूंजते थे.
फिल्म में तुषार ने एक सीधे-सादे, मासूम और भोले-भाले लड़के का रोल किया था जो अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाता. दर्शकों को तुषार की सादगी और मासूमियत बहुत पसंद आई. फिल्म ने अपने पहले हफ्ते में ही जबरदस्त कमाई की और 2001 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक बन गई. इस फिल्म के लिए तुषार को बेस्ट डेब्यू अवॉर्ड भी मिला और ऐसा लगा कि कपूर खानदान का यह चमकता सितारा लंबी दूरी का रनर साबित होगा.
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इस शानदार और ऐतिहासिक डेब्यू के बाद, तुषार कपूर को बड़े डायरेक्टर्स और बैनर्स से फिल्में ऑफर होने लगीं. लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसकी न तो तुषार ने और न ही उनके पिता जितेंद्र ने कल्पना की थी. तुषार ने ‘क्या दिल ने कहा’, ‘ये दिल’, ‘जीना सिर्फ मेरे लिए’ और ‘शर्त’ जैसी कई रोमांटिक फिल्मों में सोलो लीड रोल किया.
बदकिस्मती से इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत भी नहीं निकाल पाई. तुषार कपूर का सोलो हीरो स्टाइल, उनकी आवाज का उतार-चढ़ाव और उनका डांसिंग स्टाइल दर्शकों को पसंद नहीं आया. लगातार फ्लॉप फिल्मों ने फिल्म बनाने वालों का उन पर से भरोसा पूरी तरह खत्म कर दिया. एक समय तो ट्रेड एनालिस्ट उन्हें ‘वन फिल्म वंडर’ कहने लगे थे.
जब तुषार कपूर की सोलो हीरो के तौर पर रेप्युटेशन पूरी तरह खराब हो गई, तो उन्होंने अपने करियर को फिर से शुरू करने का एक बड़ा और प्रैक्टिकल फैसला लिया. उन्होंने अपना ईगो एक तरफ रखा और सोलो फिल्मों के बजाय मल्टी-स्टारर फिल्मों में को-स्टार या सपोर्टिंग एक्टर का रोल करना चुना. 2004 की फिल्म ‘खाकी’ में, उन्होंने अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और अजय देवगन जैसे सुपरस्टार्स के साथ एक सपोर्टिंग पुलिस ऑफिसर का रोल किया, जिसकी बहुत तारीफ हुई.
2005 की एडल्ट कॉमेडी ‘क्या कूल हैं हम’ ने उन्हें बॉक्स ऑफिस पर कुछ राहत दी, लेकिन उनका असली पुनर्जन्म 2006 में हुआ. डायरेक्टर रोहित शेट्टी ने उन्हें अपनी कल्ट कॉमेडी फिल्म ‘गोलमाल: फन अनलिमिटेड’ में ‘लकी’ नाम के एक गूंगे लड़के के रोल में कास्ट किया. बिना किसी डायलॉग के तुषार ने बस अपने चेहरे के एक्सप्रेशन और मजेदार आवाजों से दर्शकों को हंसाया, जो इस फ्रेंचाइजी की सबसे बड़ी यूएसपी बन गई.
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