कौन जीतेगा ओबीसी का विश्वास
अगर 2024 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो उसके नतीजों से यह साफ हो गया कि सपा ने अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार से आगे बढ़कर गैर यादव ओबीसी में अपना दबदबा बढ़ाया है. वहीं भाजपा का अभी भी गैर यादव ओबीसी समुदाय ताकत बना हुआ है. ऐसे में 2027 का चुनाव इस बात काफी निर्भर रहेगा कि कौन सी पार्टी पिछड़े वर्ग के भीतर सबसे ज्यादा भरोसा हासिल कर पाती है.
भाजपा की ताकत है गैर यादव ओबीसी
2014 के लोकसभा चुनाव के बाद सूबे में बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी राजनीति को नई दिशा दी है. पार्टी ने मौर्य, शाक्य, सैनी, कुशवाहा, निषाद, राजभर, लोधी, कश्यप और गुर्जर जैसे समुदायों को राजनीति की दुनिया में प्रतिनिधित्व दिया है. यही वजह रही कि 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा समर्थन मिला और सरकार बनाने में सफल रही. दरअसल, सूबे में यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यादव समाज के वोटर्स सपा के ही हैं. यही कारण है कि बीजेपी ने यादवों के विकल्प के तौर पर अन्य पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ा है.
सपा को पीडीए ने दिया राजनीतिक विस्तार
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से सपा का पीडीए फॉर्मूला चर्चा में रहा है. हालांकि अब सपा केवल यादव वोट बैंकर पर निर्भर न रहकर छोटे और मध्यम आकार के ओबीसी समुदायों में पैठ बनाने की जुगत में जुट गई है. भाजपा की तरह सपा भी मौर्य, शाक्य, सैनी, कुशवाहा, निषाद और राजभर समाज से जुड़े नेताओं को अपने पाले में कर रही है. क्योंकि सपा का यह मानना है कि अगर गैर-यादव ओबीसी का एक हिस्सा भी भाजपा से नाराज होकर उसके साथ आता है तो विधानसभा चुनाव के नतीजों की तस्वीर बदल सकती है.
किन जातियों पर पार्टियों की नजर?
मौर्य, शाक्य और सैनी
पूर्वांचल और मध्य यूपी की कई सीटों पर इन जातियों का दबदबा माना जाता है. क्योंकि अधिक मतदाता संख्या होने के कारण निर्णायक माने जाते हैं. भाजपा के पास लंबे समय से इन वर्गों का समर्थन रहा है. लेकिन हाल के कुछ सालों में समाजवादी पार्टी ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश की है.
कुशवाहा वोट
पूर्वांचल और बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों में कुशवाहा समाज प्रभावशाली है. कुशवाहा समाज का झुकाव उस दल की तरफ ज्यादा होता है, जहां उनका प्रतिनिधित्व अधिक दिखता है. क्योंकि यह समाज अक्सर राजनीतिक रूप से व्यवहारिक रुख अपनाता है. यही वजह है कि सपा और भाजपा का झुकाव इनकी तरफ रहता है.
निषाद वोट
निषाद समुदाय का असर गोरखपुर, बस्ती, प्रयागराज और आसपास के क्षेत्र में देखने को मिलता है. भाजपा के साथ निषाद पार्टी का गठबंधन होने से इस समुदाय के मतदाता भाजपा के साथ नजर आता है. लेकिन इसपर सपा की भी नजर बनी हुई है.
राजभर वोट
अगर बात करें राजभर वोट की तो पूर्वांचल की सियासत में इसका खास असर है. ओम प्रकाश राजभर की राजनीतिक सक्रियता होने के कारण इस वोट बैंक की चर्चा हमेशा रहती है. फिलहाल ओपी राजभर भाजपा के साथ हैं, तो राजभर समाज भी भाजपा की तरफ है. हालांकि राजभर समाज के मतदाताओं को कभी भी पूरी तरह से किसी एक दल के साथ जुड़ते हुए नहीं देखा जा सकता.
गुर्जर समाज
ओबीसी में गुर्जर समाज राजनीतिक रूप से बहुत अहम है. गुर्जर समाज का प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई सीटों पर है. भाजपा को परंपरागत रूप से यहां बढ़ मिलती रही है. हालांकि किसान आंदोलन और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों के चलते इलाके में कुछ नए समीकरण भी बने हैं.
किन क्षेत्रों में होगा दिलचस्प मुकाबला
अगर पूर्वांचल के क्षेत्र की बात करें तो 2027 की लड़ाई में पूर्वांचल बढ़ा केंद्र बन सकता है. क्योंकि यहां राजभर, निषाद, कुशवाहा और मौर्य समुदाय बड़ी संख्या में हैं. वहीं मध्य यूपी और अवध की बात करें तो इनमें लखनऊ, सीतापुर, हरदोई, उन्नाव, बाराबंकी और आसपास के जिलों में मौर्य, शाक्य व अन्य पिछड़ी जातियों का प्रभाव है. यहां सपा भाजपा की परंपरागत बढ़त को चुनौती देने की कोशिश करेगी. इसके अलावा पश्चिमी यूपी की बात करें तो यहां गुर्जर, कश्यप, सैनी और अन्य पिछड़ी जातियों के बीच राजनीतिक कंपटीशन बढ़ सकता है. वहीं बुंदेलखंड क्षेत्र की बात करें तो यहां भी ओबीसी का दबदबा है, चाहे वह लोधी समुदाय ही क्यों न हो.
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