1980 का दशक बॉलीवुड में एक बड़ा बदलाव और एंग्री यंग मैन के उदय का गवाह बना. इस दौर में अमिताभ बच्चन का राज था और विनोद खन्ना अपनी जबरदस्त स्क्रीन प्रेजेंस के लिए जाने जाते थे. वहीं एक ऐसा एक्टर भी था जिसने अपने अनोखे मिजाज, सख्त व्यवहार और आम लोगों से सीधे जुड़ाव से सबको हैरान कर दिया था. हम बात कर रहे हैं एवरग्रीन एक्टर मिथुन चक्रवर्ती की, जिन्होंने 1980 के दशक में बॉक्स ऑफिस के सारे पुराने समीकरण तोड़ दिए थे. 1982 में रिलीज हुई उनकी कल्ट फिल्म ‘डिस्को डांसर’ ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया था, जिसका असर न सिर्फ देश में बल्कि आने वाले कई सालों तक इंटरनेशनल लेवल पर भी महसूस किया गया.
नई दिल्ली. जब भी बॉलीवुड के इतिहास में 1970 और 1980 के दशक के स्टारडम को एनालाइज किया जाता है, तो पूरी कहानी अक्सर अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना या विनोद खन्ना के आस-पास घूमती है. लेकिन, इस कड़वी सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता कि 80 के दशक के बीच में एक समय ऐसा था जब मिथुन चक्रवर्ती ने बॉक्स ऑफिस पर रिलीज होने वाली फिल्मों की संख्या, उनके सक्सेस रेट और दर्शकों की पसंद के मामले में एक पैरेलल एम्पायर बनाया था. बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड या गॉडफादर के सपनों के शहर मुंबई में आए इस बंगाली बाबू ने साबित कर दिया कि अगर आपके पास टैलेंट, लगन और जनता की नब्ज समझने की काबिलियत है, तो आप किसी भी बनी-बनाई गद्दी को हिला सकते हैं. (तस्वीर एआई की मदद से बनाई गई है.)
वैसे तो मिथुन चक्रवर्ती ने अपने करियर की शुरुआत में ही ‘मृगल्या (1976)’ के लिए नेशनल अवॉर्ड जीतकर अपनी एक्टिंग का हुनर दिखाया था, लेकिन 1982 की फिल्म ‘डिस्को डांसर’ ने उन्हें कमर्शियल सिनेमा का सबसे बड़ा और सबसे पॉपुलर कल्ट आइकन बना दिया. बब्बर सुभाष के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म ने न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ कमाई की, जिसकी उस दौर के किसी फिल्म प्रोड्यूसर ने कल्पना भी नहीं की होगी.
बप्पी लहरी के मधुर और थिरकाने वाले संगीत और मिथुन के अनोखे डांसिंग स्टाइल ने ‘आई एम ए डिस्को डांसर’ और ‘जिमी जिमी…’ जैसे गानों को इंटरनेशनल चार्टबस्टर्स तक पहुंचाया. यह फिल्म सोवियत यूनियन (रूस), चीन और कई एशियाई और अफ्रीकी देशों में इतनी बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई कि विदेशी लोग ‘जिमी’ को भारत समझने लगे. सोवियत यूनियन में फिल्म ने लाखों टिकट बेचे, जो आज के हिसाब से कई हजार करोड़ रुपये का बिजनेस है.
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1980 के दशक में विनोद खन्ना के रिटायरमेंट और अमिताभ बच्चन के पॉलिटिक्स में आने और उसके बाद लगी चोटों ने इंडस्ट्री में एक बड़ा खालीपन पैदा कर दिया. कई एक्टर इस खाली समय का फायदा उठाने की होड़ में थे, लेकिन मिथुन चक्रवर्ती ने अपनी एक अलग और मजबूत इमेज बनाई. अमिताभ बच्चन जहां एलीट और एंग्री यंग मैन के तौर पर जाने जाते थे, वहीं मिथुन चक्रवर्ती देश के गरीबों, मजदूरों, रिक्शा चलाने वालों और मिडिल क्लास दर्शकों के मसीहा बनकर उभरे.
उनकी फिल्में जैसे ‘कसम पैदा करने वाले की’, ‘डांस डांस’, ‘कमांडो’, ‘जीते हैं शान से’ और दर्जनों दूसरी फिल्मों ने सिंगल-स्क्रीन थिएटरों को अपनी ओर खींचा. मिथुन साल में 10 से 15 फिल्में बनाने के लिए जाने जाते थे और उनकी ज्यादातर फिल्में अपनी लागत निकाल लेती थीं और डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए भारी प्रॉफिट कमाती थीं. ट्रेड पंडितों के मुताबिक, मिथुन का स्टारडम इतना जबरदस्त था कि डिस्ट्रीब्यूटर्स उनके नाम पर इंवेस्ट करने को तैयार रहते थे.
सिनेमा के इतिहास में बहुत कम फिल्में ऐसी हैं जिनका असर दो दशकों तक रहता है. ‘डिस्को डांसर’ के बाद, बॉलीवुड का डांस को देखने और पेश करने का तरीका पूरी तरह से बदल गया. मिथुन ने बॉलीवुड में ब्रेकडांसिंग की शुरुआत की. 80 और 90 के दशक में देश में शायद ही कोई ऐसा नौजवान था जिसका हेयरस्टाइल मिथुन जैसा न हो या जिसने उनके जैसे चमकीले कपड़े पहनकर डांस न सीखा हो.
इसके अलावा, मिथुन ने खुद को सिर्फ एक डांसिंग स्टार की इमेज तक सीमित रखने से मना कर दिया. उन्होंने मार्शल आर्ट्स और B-ग्रेड एक्शन फिल्मों का एक अनोखा मेल बनाया, जिससे वे एक्शन जॉनर के बेताज बादशाह बन गए. स्क्रीन पर उनकी फुर्ती और तीखे डायलॉग ने दर्शकों से तालियां और सीटियां बटोरीं.
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