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बच्चों में तेजी से बढ़ रहे मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) के मामलों को देखते हुए ऑल इंडिया ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी ने इसके बचाव और प्रबंधन को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। विशेषज्ञों ने बच्चों की आंखों पर बढ़ते तनाव को कम करने के लिए नियमित नेत्र परीक्षण, स्क्रीन टाइम नियंत्रित करने और बाहरी गतिविधियों को बढ़ावा देने की सलाह दी है।

दिशा-निर्देशों में 20-20-20 नियम के महत्व पर विशेष जोर दिया गया है। इसके अनुसार बच्चों को हर 20 मिनट बाद 20 सेकेंड का ब्रेक लेना चाहिए और कम से कम 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे आंखों पर पड़ने वाला तनाव कम होता है और लंबे समय तक स्क्रीन या किताबों पर ध्यान केंद्रित करने से होने वाली समस्याओं से बचाव संभव है।

विश्व मायोपिया सप्ताह 2026 के तहत अस्पतालों में जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। सोसाइटी के अध्यक्ष और एम्स आरपी सेंटर के पूर्व प्रमुख डॉ. जीवन सिंह तितियाल ने कहा कि बचपन में होने वाला मायोपिया अब केवल कम उम्र में चश्मा लगने तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह भविष्य में आंखों के लिए गंभीर जोखिम बन सकता है। अधिक मायोपिया आंखों की संरचना को स्थायी रूप से प्रभावित कर रेटिनल डिटैचमेंट, ग्लूकोमा, मोतियाबिंद और स्थायी दृष्टि हानि जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है। चिंता की बात यह है कि कई बच्चे धुंधली दृष्टि की शिकायत नहीं करते, क्योंकि उन्हें सामान्य दृष्टि का अनुभव ही नहीं होता। ऐसे में अभिभावकों, शिक्षकों और देखभाल करने वालों को बच्चों के व्यवहार पर नजर रखनी चाहिए। 

आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा दें स्कूल

एम्स की प्रोफेसर डॉ. नम्रता शर्मा ने कहा कि अत्यधिक डिजिटल उपयोग, लंबे समय तक नजदीक से काम करना और आउटडोर गतिविधियों की कमी जैसे कारण मायोपिया के जोखिम को बढ़ा रहे हैं। वहीं वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. रोहित सक्सेना ने स्कूलों और परिवारों से बच्चों की संतुलित दिनचर्या, पर्याप्त नींद और शारीरिक गतिविधियों पर ध्यान देने की अपील की।

तेजी से बढ़ रहे मायोपिया के मामले 

विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी मायोपिया से प्रभावित हो सकती है। भारत में भी खासकर शहरी क्षेत्रों के बच्चों में इसके मामले लगातार बढ़ रहे हैं। शहरी क्षेत्रों के अध्ययनों में इसकी व्यापकता लगभग 14 फीसदी तक पहुंच गई है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले दशक में यह 4.6 फीसदी से बढ़कर 6.8 फीसदी हो गई है।

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