कहानी
‘विमल खन्ना’ की कहानी मुख्य रूप से विमल (सनी हिंदुजा) नाम के एक बदकिस्मत आदमी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो किस्मत के एक क्रूर खेल का शिकार हो गया है. विमल पर अपने ही भाई की बेरहमी से हत्या करने का झूठा आरोप लगाया जाता है. कानून की नजर में, वह दोषी पाया जाता है और कोर्ट ने उसे मौत की सजा सुनाई है. लेकिन, विमल हार मानने वालों में से नहीं है. अपनी बेगुनाही साबित करने और असली कातिल का पर्दाफाश करने के लिए, वह एक हिम्मत वाला कदम उठाता है और पुलिस कस्टडी से भाग जाता है. भागते हुए विमल मुंबई पहुंचता है. वह मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी और अनजान गलियों में बिल्कुल अकेला है. उसके पास न तो रहने की जगह है और न ही खाने के लिए पैसे. गुजारा करने के लिए संघर्ष करते हुए, विमल एक दिन अमृता दास (ईशा तलवार) से मिलता है, जो एक बहुत अमीर, एलीट और रहस्यमयी औरत है. अमृता लगभग 500 करोड़ रुपये के एम्पायर की अकेली मालकिन है. विमल की मुश्किलों और उसकी सादगी को देखकर, अमृता उसे एक नौकरी ऑफर करती है. वो नौकरी जो बेहद आसान है- वह अमृता के शानदार बंगले में रहेगा और उसके गंभीर रूप से बीमार पति की चौबीसों घंटे देखभाल करेगा.
कुछ खोने के लिए न होने पर विमल अपनी पहचान छिपाने के लिए नौकरी मान लेता है. लेकिन, जैसे ही वह उस आलीशान घर की चमक-दमक के पीछे कदम रखता है, उसे एहसास होता है कि अमीरों की दुनिया बाहर से जितनी शांत दिखती है, अंदर से उतनी ही खोखली और खतरनाक होती है. विमल को जल्द ही पता चलता है कि उसका कोई करीबी अमृता के बीमार पति को धीरे-धीरे मारने की साजिश रच रहा है. अब विमल के सामने दोहरी चुनौती है- एक तरफ, उसे खुद को कानून से बचाना है और दूसरी तरफ उसे उस अनजान कातिल का पर्दाफाश करना है जो एक और मर्डर की प्लानिंग कर रहा है. क्या विमल यह ‘मौत का खेल’ जीत पाएगा? यही सीरीज का मेन सस्पेंस है.
राइटिंग
इस सीरीज की सबसे बड़ी ताकत इसकी राइटिंग है. स्क्रीनप्ले और डायलॉग राइटर उदित दत्त गौड़ ने हर एपिसोड को इस तरह बुना है कि दर्शक बिना हिले-डुले रह जाते हैं. सीरीज में एक भी ‘डल मोमेंट’ नहीं है जहां दर्शकों का ध्यान भटके या कहानी बोरिंग लगे. डायलॉग शार्प, असरदार और किरदारों के मूड के हिसाब से एकदम सही हैं. खासकर जब विमल अपने अंदर की मुश्किलें बताता है या जब अमृता दास अपनी रहस्यमयी बातें शेयर करती हैं, तो डायलॉग सीन में एक अनोखी गहराई जोड़ देते हैं. सुरेंद्र मोहन पाठक के नॉवेल को उसकी भावना से समझौता किए बिना मॉडर्न वेब सीरीज फॉर्मेट में बदलना एक बहुत बड़ा काम था और उदित दत्त गौड़ ने इसे बहुत अच्छे से किया है.
एक्टिंग
कास्टिंग के मामले में यह सीरीज एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुई है. ‘इश्या’ और ‘संदीप भैया’ जैसे रोल से घर-घर में मशहूर हुए सनी हिंदुजा ने विमल खन्ना के मुश्किल किरदार में अपना दिल और जान डाल दी है. एक बेगुनाह भगोड़े का डर, उसकी आंखों में बेबसी और अपनी इज्जत बचाने का पक्का इरादा… सनी ने अपने चेहरे के एक्सप्रेशन और बेहतरीन एक्टिंग से इन सभी इमोशंस को जिंदा कर दिया है. विमल के तौर पर उनकी परफॉर्मेंस उनके करियर की सबसे अच्छी परफॉर्मेंस में गिनी जाएगी. अमृता दास का रोल बहुत चैलेंजिंग है, क्योंकि इसमें कई लेयर्स हैं. उन्होंने एक परेशान पत्नी और 500 करोड़ रुपये की दौलत की ताकतवर मालकिन, दोनों का रोल किया है. ईशा तलवार ने इस रहस्यमयी किरदार को बड़ी ग्रेस और मजबूती से निभाया है. उनकी आवाज में उतार-चढ़ाव और उनका शांत व्यवहार स्क्रीन पर एक अनोखा चार्म पैदा करता है. वहीं सोनल सिंह, अक्षय आनंद, नीलू जी और पाले जी माहिर जैसे अनुभवी एक्टर्स ने अपनी बेहतरीन परफॉर्मेंस से सीरीज की सपोर्टिंग कास्ट को मजबूत बनाया है. हर एक्टर ने मेन कहानी में अहम योगदान दिया है, जिससे पूरी सीरीज दमदार और रियल लगती है.
डायरेक्शन
डायरेक्टर अभिनव पूरी सीरीज में रोमांच और सस्पेंस का माहौल बनाए रखने में काफी सफल रहे हैं. कहानी को दिखाने का उनका तरीका, सीन का उनका कॉम्बिनेशन और सस्पेंस को धीरे-धीरे सुलझाने का उनका हुनर तारीफ के काबिल है. वह दर्शकों को आखिर तक यह अंदाजा लगाने पर मजबूर करते हैं कि असली विलेन कौन है. हालांकि डायरेक्शन कुल मिलाकर बहुत अच्छा है, लेकिन कुछ मामलों में सुधार की गुंजाइश साफ है. कुछ सीन में, खासकर बीच के एपिसोड में कहानी की रफ्तार थोड़ी और तेज हो सकती थी. इसके अलावा, छोटे और कैमियो रोल निभाने वाले कुछ जूनियर एक्टर्स की परफॉर्मेंस थोड़ी कमजोर थी. अगर इन छोटे किरदारों की परफॉर्मेंस पर थोड़ा और ध्यान दिया जाता, तो सीरीज का ओवरऑल असर और भी बढ़ जाता.
सिनेमैटोग्राफी
सीरीज की सिनेमैटोग्राफी बहुत अच्छी है. कैमरा वर्क शानदार है, जो मुंबई की तंग, अंधेरी और भरी गलियों से लेकर मालाबार हिल के शानदार, बड़े महलों तक के माहौल को बहुत डिटेल में कैप्चर करता है. विजुअल्स कहानी के डार्क मूड को पूरी तरह से सपोर्ट करते हैं. वहीं, पीयूष दिनेश गुप्ता के प्रोडक्शन हाउस ‘नाम में क्या रखा है’ ने इस प्रोजेक्ट को बनाने में बहुत पैसा लगाया है, जो स्क्रीन पर साफ दिखता है. शानदार बंगले का सेट, इंटीरियर डिजाइन और प्रॉप्स का सिलेक्शन इतनी बेहतरीन क्वालिटी का है कि वे कहानी के ऑरा और मिस्ट्री को और बढ़ाते हैं.
कमियां
‘विमल खन्ना’ वेब सीरीज में मेन स्टोरी बहुत मजबूत और सस्पेंस से भरी होने के बावजूद, कुछ एपिसोड में मिस्ट्री की रफ्तार धीमी होने की वजह से डायरेक्शन में ढिलाई साफ दिखती है. साथ ही छोटे और साइड कैरेक्टर निभाने वाले जूनियर एक्टर्स की एक्टिंग भी मेन एक्टर्स के मुकाबले काफी औसत रही है, जिसकी वजह से उनकी डायलॉग डिलीवरी में नेचुरलनेस की कमी लगती है. इसके अलावा विमल के पुलिस कस्टडी से भागने और मुंबई जैसे बड़े मेट्रोपोलिस में छिपने के कुछ सीन में बहुत ज्यादा सिनेमैटिक लिबर्टीज ली गई हैं, जो आज के रियलिस्टिक जमाने के दर्शकों को थोड़ी इललॉजिकल और कमजोर लग सकती हैं.
अंतिम फैसला
‘विमल खन्ना’ एक सफल और यादगार वेब सीरीज है, क्योंकि यह सिर्फ सस्पेंस पर निर्भर नहीं है, बल्कि इंसानी भावनाओं, धोखे और जिंदा रहने की गहराई में भी जाती है. पीयूष दिनेश गुप्ता और साकेत चौधरी की यह बोल्ड कोशिश पूरी तरह सफल रही है, जिसने हिंदी साहित्य प्रेमियों और OTT दर्शकों, दोनों को संतुष्ट किया है. एक्टिंग की छोटी-मोटी कमियों और डायरेक्शन में थोड़ी कमी को छोड़ दें, तो यह सीरीज अमेजन एमएक्स प्लेयर पर मौजूद सबसे अच्छे सस्पेंस थ्रिलर में से एक है. अकेले सनी हिंदुजा की परफॉर्मेंस ही देखने लायक है. अगर आप थ्रिलर, सस्पेंस और बेहतरीन एक्टिंग के फैन हैं, तो ‘विमल खन्ना’ का यह खूनी एडवेंचर जरूर देखें! मेरी ओर से इस सीरीज को 5 में से 3 स्टार.
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