राजधानी में एलपीजी की आपूर्ति ने प्रवासी मजदूरों की रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है। हजारों मजदूरों का पेट जिन छोटे ढाबों और होटलों के भरोसे भरता था, वह गैस की कमी के कारण बंद होने लगे हैं। इस कारण प्रवासी मजदूरों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
बढ़ते खर्च और सीमित काम के बीच कई मजदूर अपने गांव लौटने की तैयारी कर रहे हैं। राजधानी के लेबर चौक, औद्योगिक इलाकों, बाजारों और निर्माण स्थलों के आसपास सस्ते भोजन के लिए छोटे होटल और ढाबे ही मजदूरों का सहारा होते हैं। यहां 40 से 60 रुपये में भरपेट खाना मिल जाता था लेकिन पिछले कुछ दिनों से रसोई गैस सिलिंडर की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण इन होटलों की रसोई ठंडी पड़ गई है।
ढाबे बंद, मजदूरों की चिंता बढ़ी
मुनिरका, पहाड़गंज, सदर बाजार, करोल बाग, बवाना और नरेला समेत कई इलाकों में छोटे ढाबों ने अस्थायी रूप से दुकानें बंद कर दी हैं। कुछ जगहों पर सीमित खाना बनाया जा रहा है। पहाड़गंज में एक छोटे ढाबे के संचालक रमेश कुमार ने बताया कि एक दिन में दो से तीन सिलिंडर लग जाते हैं, लेकिन एक सिलिंडर मिल पा रहा है। ऐसे में पूरे दिन का खाना बनाना संभव नहीं है। बिहार के सीतामढ़ी जिले से आए मजदूर मुकेश कुमार ने बताया कि अब होटल बंद हैं तो मुश्किल हो गई है।
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से आए मजदूर राजेश यादव ने बताया कि पहले ढाबे पर 50 रुपये में खाना मिल जाता था लेकिन अब 80 से 100 रुपये में मिल रहा है। अब इतना महंगा खाना मुश्किल है। यही हाल रहे तो गांव वापस जाना पड़ेगा।
रेहड़ी-पटरी से गायब हो रहा स्ट्रीट फूड
लक्ष्मी नगर, करोल बाग, आरकेपुरम, द्वारका और शाहदरा समेत कई इलाकों में छोटे फास्ट फूड स्टॉल गैस सिलेंडर की कमी से जूझ रहे हैं। आरकेपुरम में फास्ट फूड का स्टॉल लगाने वाले दुकानदार अंकित ने बताया कि मजबूरी में दुकान बंद करनी पड़ी। गोल डाक खाना इलाके के पास चाउमीन की दुकान लगाने वाले सोनू ने बताया कि रोज लाइन में खड़े रहते हैं, लेकिन खाली हाथ लौटना पड़ता है।
मजदूर बोले…
सिलिंडर की कमी के कारण फिर लॉकडाउन के दिन याद आ गए हैं। साल 2020 में भी हम लोगों को दिल्ली छोड़ कर जाना पड़ा और आज भी यही हालात है। सरकार को जल्द गरीबों के लिए कोई सकारात्मक कदम उठाने होंगे।
-अनारकली, दिहाड़ी मजदूर
पहले पास के ढाबे पर 50 रुपये में खाना मिलता था, लेकिन गैस न होने के कारण यही खाना अब 100 रुपये में मिल रहा है। हम लोग दिहाड़ी मजदूर है। दिहाड़ी की कमाई से घर के और खर्च भी चलाने होते हैं। अगर यही हालात रहे तो गांव वापस जाना पड़ेगा।
-राजेश, प्रवासी मजदूर
दिहाड़ी रोजाना नहीं हो रही है। कालाबाजारी के जरिए 1 किलो गैस 400 से 500 रुपये में मिल रही है। हमारी इतनी दिहाड़ी भी नहीं है। अगर 2 से 3 दिन में हालात नहीं सुधरे तो हम वापस बिहार लौट जाएंगे।
-रामलाल, प्रवासी मजदूर
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