अब वही ऐतिहासिक जयपुर पोलो ग्राउंड और इसके पास स्थित दिल्ली रेस कोर्स एक नए विवाद के केंद्र में हैं. लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (एलएंडडीओ) ने इन दोनों परिसरों को खाली करने के आदेश जारी किए हैं. लोक कल्याण मार्ग के आसपास स्थित लगभग 68 एकड़ की यह जमीन राजधानी के सबसे महंगे और महत्वपूर्ण इलाकों में गिनी जाती है. लंबे समय से खेल गतिविधियों का केंद्र रहे ये मैदान अब विरासत और विकास के बीच चल रही बहस का प्रतीक बन गए हैं.
पोलो की शाही परंपरा और जयपुर पोलो ग्राउंड
जयपुर पोलो ग्राउंड का नाम जयपुर रियासत के अंतिम महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय से जुड़ा हुआ है. सवाई मान सिंह द्वितीय केवल शासक ही नहीं बल्कि विश्व स्तर के प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी भी थे. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और पोलो को शाही खेल के रूप में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
जब ब्रिटेन के प्रिंस खेले पोलो
ब्रिटेन के तत्कालीन प्रिंस चार्ल्स ने 1975 में यहां एक पोलो मैच में भाग लिया था. यह उनकी भारत यात्रा का चर्चित कार्यक्रम था. उस अवसर पर बड़ी संख्या में राजनयिक, सैन्य अधिकारी और दिल्ली के गणमान्य लोग उपस्थित थे. मंसूर अली खान पटौदी ने 1995 में अपने कामराज रोड स्थित आवास में एक इंटरव्यू के दौरान इस लेखक को बताया था कि वे जब भी जयपुर पोलो ग्राउंड में किसी पोलो के मैच को देखने जाते हैं, तब उनके सामने वो सारा मंजर जीवंत हो जाता है जब उनके पिता वहां हादसे का शिकार हुए थे. वे यह सब बताते हुए बहुत भावुक हो गए थे. पटौदी सीनियर का पार्थिव शरीर दिल्ली से अंतिम संस्कार के लिए पटौदी में लेकर जाया गया था. उनका जन्म दिल्ली-6 के दरियागंज में स्थित पटौदी हाउस में ही हुआ था. आज 16 मार्च को उनका जन्म दिन भी है. आप जानते ही हैं कि मंसूर अली खान पटौदी भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे प्रभावशाली कप्तानों में से रहे हैं.
कौन खेलता पोलो
ब्रिटिश काल में दिल्ली में पोलो खेल अभिजात वर्ग की सामाजिक गतिविधियों का अहम हिस्सा था. सेना के अधिकारी, रियासतों के शासक और विदेशी राजनयिक अक्सर ऐसे आयोजनों में हिस्सा लेते थे. जयपुर पोलो ग्राउंड इस संस्कृति का प्रमुख केंद्र बन गया. यहां आयोजित होने वाले मैच केवल खेल प्रतियोगिता नहीं बल्कि सामाजिक समारोह भी माने जाते थे.
दिल्ली रेस कोर्स की औपनिवेशिक कहानी
दिल्ली रेस कोर्स की स्थापना का इतिहास भी ब्रिटिश शासन से जुड़ा हुआ है. 1911 में जब ब्रिटिश सरकार ने राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया, तब नई दिल्ली के निर्माण के साथ कई मनोरंजन और खेल स्थलों की भी योजना बनाई गई.
कब से रेस कोर्स
इसी क्रम में 1930 के दशक में यहां घुड़दौड़ के लिए रेस ट्रैक विकसित किया गया. बाद में 1940 में दिल्ली रेस क्लब की औपचारिक स्थापना हुई. क्लब ने आधुनिक रेस ट्रैक, अस्तबल और दर्शकों के लिए सुविधाएं विकसित कीं. धीरे-धीरे दिल्ली रेस कोर्स देश के प्रमुख रेसिंग केंद्रों में शामिल हो गया.
रेस कोर्स रोड से लोक कल्याण मार्ग तक
रेस कोर्स का प्रभाव इतना व्यापक था कि जिस सड़क से यहां पहुंचा जाता था, वह लंबे समय तक ‘रेस कोर्स रोड’ के नाम से जानी जाती रही. यह वही सड़क है जहां भारत के प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास स्थित है. वर्ष 2016 में केंद्र सरकार ने इस सड़क का नाम बदलकर ‘लोक कल्याण मार्ग’ कर दिया. हालांकि, दिल्ली के पुराने निवासियों के बीच यह इलाका लंबे समय तक रेस कोर्स के नाम से ही पहचाना जाता रहा.
आजादी के बाद भी बरकरार रहा महत्व
स्वतंत्रता के बाद भी दिल्ली रेस कोर्स और जयपुर पोलो ग्राउंड का महत्व कम नहीं हुआ. यहां नियमित रूप से घुड़दौड़ और पोलो प्रतियोगिताएं आयोजित होती रहीं. रेस के दिनों में हजारों दर्शक यहां पहुंचते थे और अखबारों में रेस के परिणाम प्रमुखता से प्रकाशित होते थे. दिल्ली रेस कोर्स राष्ट्रीय रेसिंग कैलेंडर का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया. कई प्रसिद्ध जॉकी और प्रशिक्षक यहां की प्रतियोगिताओं से जुड़े रहे. इन आयोजनों का सामाजिक महत्व भी था. यहां खेल के साथ-साथ दिल्ली के सामाजिक जीवन की झलक भी दिखाई देती थी. उच्च वर्ग, व्यवसायी, सैन्य अधिकारी और खेल प्रेमी अक्सर ऐसे आयोजनों में शामिल होते थे.
शहर की स्मृति से जुड़ा सवाल
करीब एक सदी से अधिक समय से मौजूद जयपुर पोलो ग्राउंड और दिल्ली रेस कोर्स केवल खेल स्थल नहीं हैं. ये दिल्ली के सामाजिक इतिहास, शहरी नियोजन और खेल संस्कृति के महत्वपूर्ण साक्षी रहे हैं. आज जब दिल्ली तेजी से फैलते महानगर में बदल रही है और भूमि का मूल्य लगातार बढ़ रहा है, तब ऐसे खुले क्षेत्रों का भविष्य नीति निर्माताओं के लिए चुनौती बन गया है. इन मैदानों के संरक्षण या विकास को लेकर जो भी निर्णय लिया जाएगा, वह केवल जमीन के उपयोग का मामला नहीं होगा, बल्कि यह दिल्ली की स्मृतियों, उसकी विरासत और उसके बदलते शहरी चरित्र से भी जुड़ा हुआ फैसला होगा.
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