2018 के कॉमन कॉज सिद्धांत पर आधारित फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता कुमार धनंजय कहते हैं कि यह फैसला वर्ष 2018 के कॉमन कॉज सिद्धांत पर आधारित है। भारत में यह पहला ऐसा मामला है, जिसमें कोर्ट ने सीधे तौर पर इच्छामृत्यु की मंजूरी दी। अदालत ने एम्स को निर्देश दिए कि हरीश के जीवन रक्षक उपकरण गरिमा के साथ हटाए जाएं और यह सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें किसी प्रकार की पीड़ा न हो। यह निर्णय भविष्य में उन परिवारों के लिए रास्ता खोलेगा, जो असाध्य बीमारी और निरंतर पीड़ा से जूझ रहे हैं। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि जीवन की गरिमा, केवल जीवन को खींचते रहने में नहीं, बल्कि सम्मानजनक विदाई में भी होती है।
रोगी के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता
अधिवक्ता डॉ. राजकुमार चौहान कहते हैं कि 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति भारतीय संवैधानिक कानून में महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ मरने के अधिकार को स्पष्ट करता है। हालांकि, यह फैसला मानवीय संवेदना और संवैधानिक मूल्यों को दर्शाता है, लेकिन यह भारत में जीवन के अंतिम चरण से जुड़े कानूनों की कमियों को भी उजागर करता है। इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने रोगी के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी।
कानून बनाने की जरूरत
अधिवक्ता देवाशीष कहते हैं कि चिंताजनक पहलू यह है कि इस विषय पर संसद ने अब तक कोई व्यापक कानून नहीं बनाया। नैतिक, सामाजिक व चिकित्सा से जुड़े जटिल प्रश्नों पर संसद में चर्चा और कानून निर्माण होना चाहिए। यह फैसला मानवीय संवेदना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है तो संसद के लिए एक स्पष्ट संकेत भी है कि इच्छामृत्यु और जीवन के अंतिम चरण से जुड़े विषय पर व्यापक और स्पष्ट कानून बनाया जाना चाहिए।
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