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India Russia Oil News: मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जंग तेज हो गई है. अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान पर ताबड़तोड़ बमबारी कर रहे हैं, हालांकि ईरान भी लगातार जवाबी हमला कर रहा है. इस जंग के बीच पूरी दुनिया को सबसे ज्यादा चिंता तेल की सप्लाई को लेकर हो रही है. वहीं भारत में भी तेल आपूर्ति को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है, क्योंकि अमेरिका के साथ हुए ट्रेड डील में रूस की जगह अमेरिका से तेल खरीदने की बात कही गई है. ईरान के साथ जारी जंग का असर होर्मुज स्ट्रेट पर पड़ने की भी आशंका है. भारत का लगभग 50 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से आता है. इसी चिंता के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर आई है. कल रात अमेरिका ने बड़ा फैसला लेते हुए भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दे दी है. यह छूट सिर्फ उन टैंकरों पर लागू होगी जो पहले से समंदर में मौजूद हैं. अब सवाल यह है कि आखिर अमेरिका ने ऐसा कदम क्यों उठाया? आखिर वह कौन-सी मजबूरी है, जिसकी वजह से अमेरिका को यह फैसला लेना पड़ा. साथ ही यह भी जानना जरूरी है कि इस समय रूसी तेल के टैंकर आखिर कहां मौजूद हैं और वे कब भारत पहुंचेंगे? आइए इन सभी सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.

न्यूज एजेंसी रॉटर्स के अनुसार दरअसल भारत ने पहले ही बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीद लिया था. कई टैंकर समंदर में हैं और वे मार्च से अप्रैल के बीच भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचने वाले हैं. अगर इन खेपों को रोक दिया जाता तो भारतीय रिफाइनरियों को तुरंत वैकल्पिक सप्लाई ढूंढनी पड़ती. इससे कीमतें और बढ़ सकती थीं. वहीं अमेरिका का यह फैसला अचानक नहीं आया. महीनों से वाशिंगटन भारत पर दबाव डाल रहा था कि रूसी तेल कम खरीदो. अब खुद ही छूट दे दी. क्यों? क्योंकि अमेरिका की मजबूरी साफ है वैश्विक ऊर्जा संकट से बचना. भारत अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि भारत आगे अमेरिकी तेल ज्यादा खरीदे.

अमेरिका ने 30 दिनों वाली छूट पर क्या कहा?

अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ऊर्जा नीति के चलते अमेरिका में तेल और गैस का उत्पादन अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है. उन्होंने बताया कि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनी रहे, इसके लिए अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दी है. यह छूट सिर्फ उन तेल खेपों के लिए है जो पहले से समुद्र में फंसी हुई हैं, इसलिए इससे रूस सरकार को बड़ा आर्थिक फायदा नहीं होगा. बेसेंट ने कहा कि भारत अमेरिका का अहम साझेदार है और उम्मीद है कि भारत आगे चलकर अमेरिकी तेल की खरीद भी बढ़ाएगा. उनका कहना है कि यह अस्थायी कदम ईरान की उन कोशिशों से पैदा हुए दबाव को कम करने के लिए उठाया गया है, जिनसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा करता है.

वैश्विक तेल बाजार पर जंग का असर

  • मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के बाद दुनिया भर में तेल सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाती है. अमेरिका ने भारत को जो 30 दिन की छूट दी है, उसका मकसद बाजार को अचानक झटके से बचाना बताया जा रहा है.
  • इस समय IOCL, BPCL, HPCL और MRPL जैसी सरकारी रिफाइनरियां ट्रेडर्स के साथ लगातार संपर्क में हैं. रिलायंस ने भी अतिरिक्त खेप की मांग की है. जानकारी के मुताबिक करीब 20 मिलियन बैरल रूसी तेल पहले ही खरीदा जा चुका है. हालांकि अब रूसी यूराल्स क्रूड कच्चे तेल पर डिस्काउंट घट गया है और कीमतें पहले से ज्यादा हो गई हैं.

अमेरिका ने भारत को 30 दिन की छूट क्यों दी?

अमेरिका का यह फैसला रणनीतिक माना जा रहा है. ईरान के साथ बढ़ते तनाव के कारण मिडिल ईस्ट में तेल सप्लाई का खतरा बढ़ गया है. भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है. अगर भारत को अचानक रूसी तेल से वंचित कर दिया जाता तो वैश्विक बाजार में भारी उथल-पुथल हो सकती थी. कीमतें तेजी से बढ़ सकती थीं. अमेरिका नहीं चाहता कि ऊर्जा संकट गहरा जाए. इसलिए यह छूट एक स्टॉपगैप व्यवस्था के तौर पर दी गई है. इससे बाजार को स्थिर रखने में मदद मिलेगी और भारत को भी तुरंत झटका नहीं लगेगा.

रूसी तेल के टैंकर अभी कहां हैं?

रूसी तेल से भरे कई टैंकर इस समय समंदर में यात्रा कर रहे हैं. इनमें से ज्यादातर टैंकर मार्च और अप्रैल के दौरान भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचेंगे. ये खेप पहले ही खरीदी जा चुकी थी और डिलीवरी प्रक्रिया में थी. इसी वजह से अमेरिका ने इन्हें अनुमति दी. भारतीय रिफाइनरियां इन खेपों पर निर्भर हैं. करीब 20 मिलियन बैरल तेल का सौदा पहले ही हो चुका है. हालांकि अब बाजार में उपलब्धता कम होने के कारण रूसी यूराल्स कच्चे तेल का डिस्काउंट भी घट गया है.

अमेरिका की असली मजबूरी क्या है?

अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता वैश्विक तेल बाजार की स्थिरता है. अगर भारत जैसे बड़े खरीदार को सप्लाई में झटका लगता तो अंतरराष्ट्रीय कीमतें तेजी से बढ़ सकती थीं. इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता. दूसरी ओर अमेरिका चाहता है कि भविष्य में भारत रूसी तेल की जगह अमेरिकी क्रूड ज्यादा खरीदे. इसलिए फिलहाल छूट देकर बाजार को स्थिर रखा गया है. लेकिन यह राहत स्थायी नहीं है और आने वाले समय में तेल की राजनीति और जटिल हो सकती है.

क्या हो सकता है आगे?

यह 30 दिन की राहत अस्थायी है. अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध लंबा चला तो तेल बाजार में अनिश्चितता बनी रहेगी. भारत को भी वैकल्पिक स्रोतों पर ज्यादा ध्यान देना पड़ सकता है. अमेरिका अब खुद बड़ा तेल उत्पादक बन चुका है और चाहता है कि भारत उसके ऊर्जा बाजार का बड़ा ग्राहक बने. आने वाले महीनों में भारत की ऊर्जा रणनीति और वैश्विक राजनीति के समीकरण काफी अहम भूमिका निभाएंगे.

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